Sep 29, 2010

=> चैन-ए-अमन

क्या फर्क पड़ता अगर मस्जिद बना होता?


क्या असर होता अगर मन्दिर बना होता?

      'श्री राम' न रहते मन्दिर मेँ,

      न 'खुदा' रहता है मस्जिद मेँ।

जहाँ बने हजारोँ मन्दिर हैँ एक और न बनता क्या होता?

      वो मूर्ति-महल कुछ खास नही,

      जिन्हेँ इन्सान बनाया करता है।

     तूँ देख महल 'जगवाले' का जो,

      इन्सान बनाया करता है।

क्या फर्क पड़ जाता अगर 'खाली-जगह' होता?

अन्तर न कुछ होता मगर चैन-ए-अमन होता॥

Sep 1, 2010

=> न्याय चले धीमा रफ्तार।

धीमी गति व धीमी चाल,न्याय चले धीमा रफ्तार।

जिनपे है पैसा अपरम्पार
न्याय करे उनकी जयकार
हम ठहरे जनरल आदमी
हमारी क्या औकात
न्याय-व्यवस्था धीरे-धीरे
मेरे पहुँच से दूर हि जात,

धीमी गति व धीमी चाल,न्याय चले धीमा रफ्तार।

'मुकदमा ठोक दूँगा,शान से लड़ूँगा
और कट जायेगी इसकी जिन्दगी पूरी'
लेकिन वे यह नही जानते कि
मौत किसी से रिस्ता नही निभाता
एक दिन ये सबको ले जाता
जान-समझ कर सब करते हैँ ये अपराध

धीमी गति व धीमी चाल,न्याय चले धीमा रफ्तार।

केस साल्व होने मेँ लगता बीस साल
और जज का आता फरमान
'त्रिनाथ' मुकदमा जीते हैँ और ईन्हे मिलेगा
ओर बिपछ्छी तीन महीने ज़ेल खटेगा
मगर उसे खुश करने की वे चाल चले हैँ
ज़ेल के बदले जुर्माना लेने को खड़े हैँ
मीडिया के सामने बिपछ्छी हँस पड़े हैँ
दाँत फाड़ के उसी 'न्याय' से कह रहे हैँ
मैँ तो अपने दर से ऊपर उठ आया हूँ
कल हि चुनाव लड़ने का टिकट पाया हूँ
ये सब सुनकर आप हो रहे हैँ हैरान

धीमी गति व धीमी चाल,न्याय चले धीमा रफ्तार।

न्याय नहि करता ये गौर
डग भरुँ मै थोड़ा तेज और
जल्दी से गलत सही देखूँ
बुझदिल व कायर दानव का
पल भर मेँ सपना तोड़ूँ
कुछ करने से पहले इन्सान
सोचे कम से कम एक हि बार

धीमी गति व धीमी चाल,न्याय चले धीमा रफ्तार।