Apr 15, 2011

=> सच्चा ब्राह्मण कौन है ?


न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो।
यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो॥

भगवान बुद्ध धर्म कहते हैं कि ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से। जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है।


किं ते जाटाहि दुम्मेध! किं ते अजिनसाटिया।
अब्भन्तरं ते गहनं बाहिर परिमज्जसि॥

अरे मूर्ख! जटाओं से क्या? मृगचर्म पहनने से क्या? भीतर तो तेरा हृदय अंधकारमय है, काला है, ऊपर से क्या धोता है?


अकिंचनं अनादानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
जो अकिंचन है, किसी तरह का परिग्रह नहीं रखता, जो त्यागी है, उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।
वारि पोक्खरपत्ते व आरग्गे रिव सासपो।
यो न लिम्पति कामेसु तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
कमल के पत्ते पर जिस तरह पानी अलिप्त रहता है या आरे की नोक पर सरसों का दाना, उसी तरह जो आदमी भोगों से अलिप्त रहता है, उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।

निधाय दंडं भूतेसु तसेसु ताबरेसु च।
यो न हन्ति न घातेति तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
चर या अचर, किसी प्राणी को जो दंड नहीं देता, न किसी को मारता है, न किसी को मारने की प्रेरणा देता है उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ। सभी ब्राह्मण के गुणों के बारे में भगवान बुद्ध ने अपने उपदेशों में बहुत ही विस्तृत से बताया है। जो इस प्रकार हैं-
Lord Mahaveer  


  •  ब्राह्मण मैं उसे कहता हूँ, जो अपरिग्रही है, जिसने समस्त बंधन काटकर फेंक दिए हैं, जो भय-विमुक्त हो गया है और संग तथा आसक्ति से विरत है।


  •  जो बिना चित्त बिगाड़े, हनन और बंधन को सहन करता है, क्षमा-बल ही जिसका सेनानी है, मैं उसी को ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो अक्रोधी है, व्रती है, शीलवान है, बहुश्रुत है, संयमी और अंतिम शरीर वाला है, उसे ही मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  कमल के पत्ते पर जल और आरे की नोक पर सरसों की तरह जो विषय-भोगों में लिप्त नहीं होता, मैं उसे ही ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो चर-अचर सभी प्राणियों में प्रहार-विरत हो, जो न मारता है और न मारने की प्रेरणा ही देता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो ऐसी अकर्कश, आदरयुक्त और सत्यवाणी बोलता हो कि जिससे किसी को जरा भी पीड़ा नहीं पहुँचती हो, मैं उसे ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  बड़ी हो चाहे छोटी, मोटी हो या पतली, शुभ हो या अशुभ, जो संसार में बिना दी हुई किसी भी चीज को नहीं लेता, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जिसने यहाँ पुण्य और पाप दोनों की ही आसक्ति छोड़ दी है और जो शोकरहित, निर्मल और परिशुद्ध है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  मानुष भोगों का लाभ छोड़ दिव्य भोगों के लाभ को भी जिसने लात मार दी है, किसी लाभ-लोभ में जो आसक्त नहीं, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  राग और घृणा का जिसने त्याग कर दिया है, जिसका स्वभाव शीतल है और जो क्लेशरहित है, ऐसे सर्वलोक-विजयी वीर पुरुष को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  • जिसके पूर्व, पश्चात और मध्य में कुछ नहीं है और जो पूर्णतया परिग्रह-रहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो ध्यानी, निर्मल, स्थिर, कृतकृत्य और आस्रव (चित्तमल) से रहित है, जिसने सत्य को पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो मन, वचन और काया से कोई पाप नहीं करता अर्थात इन तीनों पर जिसका संयम है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  न जटा रखने से कोई ब्राह्मण होता है, न अमुक गोत्र से और न जन्म से ही। जिसने सत्य और धर्म का साक्षात्कार कर लिया, वही पवित्र है, वही ब्राह्मण है।


  • जो गंभीर प्रज्ञावाला है, मेधावी है, मार्ग और अमार्ग का ज्ञाता है और जिसने सत्य पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जिसने घृणा का क्षय कर दिया है, जो भली-भाँति जानकर अकथ पद का कहने वाला है और जिसने अगाध अमृत प्राप्त कर लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  • जो पूर्वजन्म को जानता है, सुगति और अगति को देखता है और जिसका पुनर्जन्म क्षीण हो गया है तथा जो अभिमान (दिव्य ज्ञान) परायण है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता।


  •  जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है।


  •  ब्राह्मण पर प्रहार नहीं करना चाहिए और ब्राह्मण को भी उस प्रहारक पर कोप नहीं करना चाहिए।


  •  ब्राह्मण वह है जो निष्पाप है, निर्मल है, निरभिमान है, संयत है, वेदांत-पारगत है, ब्रह्मचारी है, ब्रह्मवादी (निर्वाण-वादी) और धर्मप्राण है।


  •  जिसने सारे पाप अपने अंतःकरण से दूर कर दिए हैं, अहंकार की मलीनता जिसकी अंतरात्मा का स्पर्श भी नहीं कर सकती, जिसका ब्रह्मचर्य परिपूर्ण है, जिसे लोक के किसी भी विषय की तृष्णा नहीं है, जिसने अपनी अंतर्दृष्टि से ज्ञान का अंत देख लिया, वही अपने को यथार्थ रीति से ब्राह्मण कह सकता है।


Apr 10, 2011

=> झूठी श्रद्धा संदेह को जन्म देती है


                                                  संदेह पैदा क्यों होता है दुनिया में, संदेह पैदा होता है, झूठी श्रद्धा थोप देने के कारण। छोटा बच्चा है, तुम कहते हो मंदिर चलो। छोटा बच्चा पूछता है किस लिए? अभी मैं खेल रहा हूं, तुम कहते हो, मंदिर में और ज्यादा आनंद आएगा। और छोटे बच्चे को वह आनंद नहीं आता, तुम तो श्रद्धा सिखा रहे हो और बच्चा सोचता है, ये कैसा आनंद, यहां बड़े-बड़े बैठे है उदास, यहां दोड भी नहीं सकता, खेल भी नहीं सकता। नाच भी नहीं सकता, चीख पुकार नहीं कर सकता, यह कैसा आनंद। फिर बाप कहता है, झुको, यह भगवान की मूर्ति है। बच्चा कहता है भगवान यह तो पत्थहर की मूर्ति को कपड़े पहना रखे है। रुको अभी, तुम छोटे हो अभी तुम्हारी बात समझ में नहीं आएगी। ध्यान रखना तुम सोचते हो तुम श्रद्धा पैदा कर रहे हो, वह बच्चा‍ सर तो झुका लेगा लेकिन जानता है, कि यह पत्थेर की मूर्ति है। उसे न केवल इस मूर्ति पर संदेह आ रहा है। अब तुम पर भी संदेह आ रहा है, तुम्हारी बुद्धि पर भी संदेह आ रहा है। अब वह सोचता है ये बाप भी कुछ मूढ़ मालूम होता है। कह नहीं सकता, कहेगा, जब तुम बूढे हो जाओगे, मां-बाप पीछे परेशान होते है, वे कहते है कि क्या मामला है।
Don't look your Dark Side-OSHO
                                                 बच्चे हम पर श्रद्धा क्यों नहीं रखते, तुम्हीं ने नस्ट करवा दी श्रद्धा। तुम ने ऐसी-ऐसी बातें बच्चे पर थोपी, बच्चो का सरल ह्रदय तो टूट गया। उसके पीछे संदेह पैदा हो गया, झूठी श्रद्धा कभी संदेह से मुक्तं होती ही नहीं। संदेह की जन्म दात्री है। झूठी श्रद्धा के पीछे आता है संदेह, मुझे पहली दफा मंदिर ले जाया गया, और कहा की झुको, मैंने कहा, मुझे झुका दो, क्यों कि मुझे झुकने जैसा कुछ नजर आ नहीं रहा।
                                                   पर मैं कहता हूं, मुझे अच्छे बड़े बूढे मिले, मुझे झुकाया नहीं गया। कहा, ठीक है जब तेरा मन करे तब झुकना, उसके कारण अब भी मेरे मन मैं अब भी अपने बड़े-बूढ़ो के प्रति श्रद्धा है। ख्याल रखना, किसी पर जबर्दस्ती़ थोपना मत, थोपने का प्रतिकार है संदेह। जिसका अपने मां-बाप पर भरोसा खो गया, उसका अस्तित्व़ पर भरोसा खो गया। श्रद्धा का बीज तुम्हारी झूठे संदेह के नीचे छुप  गया।
                                                                                            --एस धम्मो सनंतनो

Apr 5, 2011

=> पत्रकार की अड़चन

                           पत्रकार की तो और भी अड़चन है। पत्रकार तो जीता है गलत पर ही। पत्रकार का सत्‍य से कोई लेना-देना नहीं है। पत्रकार तो जीता असत्‍य पर है, क्‍योंकि असत्‍य लोगों को रुचिकर है। अख़बार में लोग सत्‍य को खोजने नहीं जाते। अफवाहें खोजते है। तुम्‍हें शायद पता हो या न हो कि स्‍वर्ग कोई अख़बार नहीं निकलता। कोई ऐसी घटना ही नहीं घटती स्‍वर्ग में जो अख़बार में छापी जा सकें। नरक में बहुत अख़बार निकलते है। क्‍योंकि नरक में तो घटनाएं घटती ही रहती है।
नरक में पत्रकार 
                                    एक बार एक पत्रकार मरा और स्‍वर्ग पहुंच गया। द्वार पर दस्‍तक दी। द्वारपाल ने द्वार खोला और पूछा कि क्‍या चाहते हो? उसने कहा, मैं पत्रकार हूं, और स्‍वर्ग में प्रवेश चाहता हूं। द्वारपाल हंसा और उसने कहा कि असंभव, तुम्‍हारे लिए ठीक जगह नरक में है, तुम्‍हारा काम वहीं पर है। तुम्‍हें यहां पर कोई रस नहीं आयेगा। तुम्‍हें रस भी वहीं पर आयेगा। तुम्‍हारा सारा व्‍यवसाय वहीं फलता है। यहां तो सिर्फ, नरक से हम पीछे ने पड़ जाये, चौबीस जगह खाली रखी है अख़बार वालों के लिए। मगर वे कब की भरी है। चौबीस अख़बार वाले हमारे यहां है।
                                      हालांकि वे भी सब बेकार है। अख़बार छपता ही नहीं। एक कोरा कागज रोज बँटता है, ऋषि-मुनि उसको पढ़ते है। ऋषि-मुनि कोरे कागज ही पढ़ सकते है। क्‍योंकि उनका मन कोरा है। उसपर कोई शब्‍द अंकित नहीं है, इस लिए वो कोरा कागज पढ़ते है। उन्‍हें शब्‍दों की जरूरत नहीं है। और फिर यहां पर कोई उत्‍तेजना नहीं है, चारों और शांति है, न ही कोई घटना घटती है। न यहां बलात्‍कार होते है, न ही घोटाले, न कहीं चोरी-चकोरी, न काला धन की खोज, न ही यहां पर साधुओं को गोरख धंधा चलता है। क्‍योंकि यहां सब संत है। कोन ध्‍यान, योग आसन सिखाने के नाम पर अपनी दुकान चलाए, एक ही दिन में उसकी दुकान पर ताल लग जायेगा। अज्ञानियों को ही अज्ञानी भटका सकते है। ज्ञानियों के यहां उनकी दाल गलनें वाली नहीं है।
                                      तुम नरक में जाओ, वहां खुब समाचार है, वहां आदमी को कुत्‍ता भी काट ले तो समाचार बन जाता है। वहां पर रोज-रोज नये तमाशे होते है। और कुछ नहीं तो धारावाहिक ही हनुमान की पूछ होते है। उन्हें ही खींचे जाओ। वहां आदमी कुत्‍ते को काट ले तो भी समाचार वहां समाचारों की कोई कमी नहीं है। नाहक यहां तू अपना सर फोड़ेगा। कुछ काम नहीं मिलेगा। फिर दो चार दिन में मेरी जान खायेगा की मुझे बहार निकल फिर, तुझे जीवन भर यहीं फँसना होगा। क्योंकि यहां पर चौबीस ही पत्रकार रह सकते है। फिर न जाने कितने सालों बाद कोई पत्रकार स्‍वर्ग आये तब तू निकल सकेगा।

                                        यहां पर तू बेकार समय खराब कर रहा है। तू नरक में जा वहां पर तेरा मन भी लगा रहेगा और कुछ काम धंधा भी तुम मिल जायेगा। नरक चले जाओ। वहां रोज-रोज नये अख़बार निकलते है, सुबह का संस्‍करण भी निकलता है, दोपहर का संस्‍करण भी, सांझा का भी संस्‍करण, देर रात्रि का भी। खबरें वहां पर इतनी ज्‍यादा है। घटनाओं पर घटनाएं घटती रहती है। स्‍वर्ग में कोई घटना थोड़े ही घटती है।
महावीर बैठे अपने वृक्ष के नीचे, बुद्ध बैठे है अपने वृक्ष के नीचे, मीरा नाच रही है, कबीर जी कपड़ा बुने जा रहे है अपनी खड्डी पर और खंजड़ी बजा रहो है, रवि दास जी अपना चमड़ा रंग रहे है, नानक जी बाला मर्दाना के साथ पद गये जा रहे। सारा स्‍वर्ग आनंद से सरा बोर है। यहां पर कोई घटना नहीं घटती, सब अपने आनंद में डूबे है। यहां पर कुछ नहीं होता। यहां सब ठहर गया है।
                                    लेकिन अख़बार वाला भी इतनी जल्‍दी से हार मानने वाला नहीं था। वह जब तक पूरी खोज बीन न कर ले उसे तसल्ली नहीं होने वाली। यूं तो नेताओं के घर से भी बहार निकाल दिया जाता था। पर जब तक पूरी तसल्ली नहीं हो जाती तब तक गेट पर अड़ा रहता था। इतनी जल्‍दी हटने वाला वो नहीं था। उसने द्वार पाल को अपनी चिकनी चुपड़ी बातें में फंसा कर चौबीस घंटे के अवसर के द्वार पाल को राज़ी कर लिया। कि अगर मैं किसी अख़बार वाले को स्‍वर्ग से बहार जाने के लिए किसी अख़बार वाले को तैयार कर लूं तो मुझे जगह मिल जायेगी।
द्वार पाल ने कहा, तुम्‍हारी मर्जी अगर कोई राज़ी हो जाए, तो तेरा भाग्‍य, मैं तुझे अपने रिसक पर चौबीस घंटे का मौका दिये देता हूं। तू भीतर चला जा।
और अख़बार वाले ने, जो वह जिंदगी भर करता रहा था, वहीं काम किया। उसने जो मिला उसी से कहा कि अरे सुना तुमने, नरक में एक बहुत बड़े अख़बार के निकलने की आयोजना चल रही है। प्रधान संपादक, उप प्रधान संपादक, संपादक, सब जगह खाली है। बडी तनख़ाह, कारें, बगले, सब का इंतजाम है। सांझ होते-होते उसने चौबीसों अख़बार वालों को मिल कर यह खबर पहुंचा दि। चौबीस घंटे पूरे होने पर वह द्वार पर पहुंचा। द्वारपाल ने कहा कि गजब कर दिया भाई तुमने, एक नहीं चौबीस ही चले गए, अब तुम मजे से रहो।
उसने कहा पर मैंने चौबीस घंटे रह कर देख लिया, यहां तो मैं पागल हो जाऊँगा, ये लोग बड़े ही साहसी थे जो इतने दिन से रह रहे थे। मैं भी जाना चाहता हूं।
द्वारपाल ने पूछा अब तो आपका रास्‍ता साफ हो गया अब आप क्‍यों जाना चाहते है? उसने कहां कोन जाने बात सच ही हो।
                                झूठ में एक गुण है। चाहे तुम ही उसे शुरू करो, लेकिन अगर दूसरे उस पर विश्‍वास करने लगें तो एक न एक दिन तुम भी उस पर विश्‍वास कर लोगे। जब दूसरों को तुम विश्‍वास करते देखोगें, उसकी आंखों में आस्‍था जगती देखोगें, तुम्‍हें भी शक होने लगेगा; कौन जने हो न हो बात सच ही हो। मैंने तो झूठ की तरह कही थी, लेकिन हो सकता है, संयोगवशात मैं जिसे झूठ समझ रहा था वह सत्‍य ही रहा हो। मेरे समझने में भूल हो गई होगी। क्‍योंकि चौबीस आदमी कैसे धोखा खा सकेत है? उसने कहा कि नहीं भाई,अब मैं रूकने वाला नहीं हूं। पहले तो मुझे नरक जाने ही दो। स्‍वर्ग तो आपका एक दिन देख ही लिया, एकदम रूखा है।
स्‍वर्ग में अख़बार नहीं निकलता, क्‍योंकि घटना नहीं घटती,शांत, ध्‍यानस्‍थ,निर्विकल्‍प समाधि में बैठे हों लोग तो क्‍या है वहां घटना?
अख़बार तो जीता है उपद्रव पर। जितना उपद्रव हो उतना अख़बार जीता हे। जहां उपद्रव नहीं है वहां भी अख़बार वाला उपद्रव खोज लेता है, जहां बिलकुल खोज नहीं पाता वहां ईजाद कर लेता है।