Apr 25, 2012

=> 'बीहड़' में 'विकाश'

'द दर्टी पिक्चर' भले ही सबको मनोरंजक एवं मस्ती से भरपूर लगी हो मगर इसका दूसरा पहलू जो वालीवुड की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है , को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ! वालीवुड में हर रोज़ नई लड़कियाँ काम के लिए जाती है मगर उन्हें काम के नाम पर अस्वासन मिलता है ! उनको मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है !
      "बिद्या-बालन" का बोल्ड रवैया हमें बेशक सेक्सी लगता है परन्तु सच्चाई यह है की "बिद्या" द्वारा निभाया गया रोल उन तमाम लड़कियों का है जो ग्लैमरस दुनिया में जाने की इक्षुक जरूर हैं मगर उन्हें "शोषित" होना पड़ता है और अपनी इज्जत खोकर भी "इज्जत व प्रसिद्धि" पाने की तीब्र लालसा 'द दर्टी पिक्चर' में "बिद्या" द्वारा निभाए गए रोल से ज़रा भी जुदा नही है !

      पेस-ए-खिदमत है इसी फिल्म में "कास्टिंग डाइरेक्टर" का ससक्त किरदार निभाने वाले 'विकास श्रीवास्तव' जो इसी साल आने वाली फिल्म "बीहड़" में डाकू निर्भय सिंह के मुख्य किरदार के रूप में दर्सकों से रूबरू होंगे, से हमारे संबाददाता "त्रिनाथ मिश्र" से बातचीत के कुछ अंश, जो भबिष्य के चमकने वाले सितारे से आपको भलीभांति परिचित कराएगा-


Q-       सबसे पहले आप अपने और अपने परिवार के बारे में बताइये?
Ans-   मेरा जन्म सुलतान पुर, उत्तर प्रदेश में हुआ , पिता एडवोकेट लाल जी श्रीवास्तव और माँ डॉ.
           विकासवती का अहम् किरदार रहा मुझे एक्टर बनाने की राह पर ले जाने को! मेरे पैरेंट्स मुझे हमेशा
           प्रेरित करते रहते थे की मै बेहतरीन एक्टर बन सकता हूँ...अगर मै मेहनत से काम करू, और में आज
           तक वही कर रहा हूँ.......मैंने सातवी क्लास से रंगमंच शुरु किया जो आज मेरे जीवन को एक अहम्
           मोड़ पर ले-आकर खड़ा कर दिया है !

Q-        पहला "ब्रेक-अप" कब मिला? किस फिल्म में मिला? किसने दिया?
Ans-    पहली फिल्म राजेश सेठ की "यथार्थ" थी और उसके बाद प्रकाश झा की "गंगाजल" .......बस  
            सिलसिला शुरू हो गया !

Q-       सबसे पहली फिल्म में आपका किरदार क्या था और कितनी देर का था?
Ans-   मेरी पहली फिल्म यथार्थ में मेरा रोल एक विलन का था जो हिरोइन श्रद्धा निगम के पीछे पड़ा रहता था
           .......५-६ सीन थे इस फिल्म में....!

Q-        अब तक कितनी फ़िल्में कर चुके हैं? उनके नाम और उनमें आपका क्या रोल है?
Ans-    अब तक कुल २० फिल्मे की है मैंने जिनमें  कुछ इस प्रकार हैं -
            द दर्टी पिक्चर में कास्टिंग डाइरेक्टर
            बिल्लू बार्बर में विलन 
            वंस अपान ए टाइम में  वर्गिश भाई…
            हम तुम और शबाना में मकबूल भाई …
            शैतान में इंस्पेक्टर  पाटिल …
            चिंगारी में दरोगा ….
            वांटेड में पुलिस ऑफिसर…
            फूँक 2.में बालू …
            कांट्रेक्ट में रा -  एजेंट…
            बरहाना में विलन…
            रेड  अलर्ट में नक्सलाईट…
            गंगाजल में विलन …. 
            मनी है तो हनी है में बैड मैन…
            रावन में…राईट मैन अभिषेक के साथ  
            हांटेड में पुलिस ऑफिसर…
            एक्शन रिप्ले में रमन राघवन…

Q-       आपकी नजर में आपका अब तक का सबसे अच्छा रोल कौन सा है?
Ans-   सबसे ज्यादा तारीफ़ तो 'द दर्टी पिक्चर' के लिए ही हो रही है...........कास्टिंग डाइरेक्टर के रोल में....

Q-       खाली समय में क्या करना पसंद करते हैं?
Ans-   मै पूरी दुनिया की फ़िल्में देखता हूँ...जो भी मेरी इनकम होती है उनसे मै फ़िल्में खरीदता हूँ....मेरे पास  
           लगभग ५००० वर्ल्ड क्लास मूवी होंगी...मुझे किताबें भी पसंद हैं खासकर कहानियाँ और गज़लें    
          ........'जिंदगी बहुत छोटी है और दुनिया बहुत बड़ी है ...हर समय ज्ञान ढूँढता रहता हूँ....एक ख्याल    
          आपकी जिंदगी बदल सकता है इसलिए किताबें मेरी सबसे अच्छी दोस्त है.......

Q-        अपने जन्मभूमि के बारे में क्या कहना चाहेंगे और वहाँ की सबसे अच्छी चीज क्या है आपकी
            नजरों में?
Ans-    'जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी...' मेरी जन्मभूमि सुल्तानपुर स्वर्ग तो नही लेकिन उससे
            कम भी नहीं है ....सच्चे लोग...मिट्टी की खुसबू....इमली का खट्टापन....आम का मिठास....शहर में
            कन्धा देने के लिए भी लोग नहीं मिलते....मगर गाँव मै आग लग जाने पर पूरा गाँव एकत्र होकर उसे
            बुझाने का प्रयास करता है...! गाँव की याद दिला दिया आपने मुझे........वो कल्चर, अपनापन, वो भाई
            -चारा ......!


Q-        क्या आप आधुनिक फिल्मो के "Content" and "Presentation" से सहमत है? क्यों?
Ans-     आज का सिनेमा आज की कहानियाँ कह रहा है ...काफी डाइरेक्टर कहानियों पर ध्यान नही दे रहे
            हैं......सुधर जायेंगे....यहाँ हर फ्राईडे तकदीर बदलती है दोस्त.....कुछ लोग कमाल कर रहे हैं...प्रस्तुति
            तो अदभुत है ...मनोरंजक है...!


Q-        भविष्य की योजनाओं के बारे में बताइये?
Ans-     मैं दुनिया के सबसे बेहतरीन एक्टर्स मै अपना नाम सबसे ऊपर देखना चाहता हूँ ! एक सपना है खुली
            आँखों से देख रहा हूँ...अपने ख़्वाबों को ताबीर देने की कोशिशें कर रहा हूँ........बस....!

Q-         युवा पढ़ी के लिए क्या सन्देश देंगें?
Ans-     वो करो जो आपका दिल कहता है.....एक जिंदगी मिली है खुलकर जिओ...!

Q-          फिल्मो में काम करने की प्रेरणा किससे मिली?
Ans-      हालीवुड एक्टर "मार्लोन ब्रांडो" मेरी प्रेरणा है.....!

Q-          लाइफ का "Turning-Point" क्या रहा?
Ans-      अभी तक मिला नही.......हा..हा..हा..हा..

Q-           आपकी आगामी फिल्में कौन सी है? और उनमें किन-किन रूपों में दिखेंगे आप दर्शको को?
Ans-       मेरी सबसे बड़ी फिल्म "बीहड़" 2012  मै आ रही है...इसमे मेरा मुख्य किरदार है...डाकू निर्भय
               सिंह गुर्जर के जिंदगी पर आधारित है यह फिल्म .....! आमिर खान के फिल्म मै विलन हूँ....! विक्रम
               भट्ट की अगली फिल्म डैंजरस-इश्क मै करिश्मा कपूर के साथ पुलिस आफिसर हूँ........!

Q-           आपके जीवन का सबसे खुसहाल समय क्या है?
Ans-       जब-जब पापा कहते हैं "गुड वर्क विकास"

Q-           अगर आपको फिल्म बनाना पड़े तो किस बिषय पर आधारित फिल्म बनाने को प्राथमिकता देंगे
               आप?
Ans-       आम आदमी की जिंदगी और उनकी समस्याओं पर आधारित फिल्मे बनाना चाहूँगा...!

Q-           फिल्मो में आने का मकसद क्या है?
Ans-        एक चेहरा जिसे पूरी दुनिया पहचाने....प्यार करे...!  "I am the best let me the prove"


                             आपका बहुत-बहुत धन्यबाद विकाश श्रीवास्तव जी, के आपने हमें अपने बारे में इतना कुछ बताया, हम आशा करते हैं की आने वाले दिनों में  आप लोगों की धडकनों का राज़ बन सको.......आपको इश्वर बहुत-बहुत आशीष प्रदान करे  ! आपके चाहने वालों की तरफ से आपको नमस्कार !




                                                                                                      - त्रिनाथ मिश्रा
                                                                                                     09889651678 

Apr 13, 2012

=> या तो शून्य या फिर शौ फ़ीसदी

            अगर आपके पास किसी कार्य को करने के लिए ज्यादा लोग नहीं है तो घबड़ाने की कोई बात नही है ! ज्यादा लोग यानि ज्याद विनाश ? स्पेशिंग जितनी ज्यादा होगी उतना ही अच्छा होगा आपके लिए , उतना ही खिल कर / खुल कर काम कर पायेंगे आप! भीरू लोगों की आवश्यकता नही है, कायर लोगो की  आवश्यकता  नही है क्योंकि वो हमारे लिए ही घातक होंगे ? दूसरी बात हमें ऐसे लोगो की भी  आवश्यकता नही है जो खुद को साहसी और बलवान मानते है ? हमें उन ब्यक्तियों से संपर्क रखना चाहिए जो बागी हैं , दिलेर हैं जिनके रगों में संकट से उलझकर फतह पाने का तीक्ष्ण अनुभव है , जो वास्तविक तौर पर निर्भीक हैं ?
            हमें बीती तस्बीर दिखाने वालों की भी आवश्यकता नहीं है , हमें भविष्य वक्ताओं की भी जरूरत नहीं है? हमें सिर्फ वर्तमान उपभोक्ताओं की जरूरत है , जो Prasent  में जीते हैं जो सोच को कार्य रूप देते हैं ? जरा गहराई से समझें इसे  -    कृष्ण पक्ष की अर्ध-रात्रि का समय है गाँव का एक व्यक्ति घर से बाहर निकलता है और अचानक उसे कुछ दिखाई पड़ता है जिससे वो चीखने लगता है, पल भर में सैकड़ों की भीड़ जमा हो गयी लोग समझते है की ये तो शेर है जो गाँव की तरफ ही आ रहा है ............
           भीड़ का कुछ हिस्सा जो खुद को बलवान मानता था, रौब में बोला चलो इसे मार देते हैं ..........
           भीड़ का कुछ हिस्सा जो भीरु और डरपोक है वो कहता है की जान बचाओ यहाँ से भाग निकालो...........
           लेकिन समस्या का हल न तो शेर मारने से होगा और न ही भागने से ?
तो आप सोच रहे होंगे की क्या करना चाहिए ? क्या कोई भीच का रास्ता है ?
           अरे नहीं नहीं ...........मुझे बीच के रस्ते यानी शोर्टकट से सख्त नफरत है ? मै या तो शून्य यानि जीरो या फिर शौ फ़ीसदी यानि 100 % पर यकीन करता हूँ .......या तो भाग जाओ तब बचोगे या फिर जूझ जाओ तब जीतोगे...........
            सही मायने में हम सब ये सोच कर गलतफहमी में हैं ........
            हमें सिर्फ धैर्य रखना होगा ...Patienc only  मन में फौलादी इरादा और आत्मा में साहस और धैर्य रखकर उसे परखना होगा... उसकी तरफ जाना होगा ... उसे समझाना होगा ......
           भीड़ का कुछ हिस्सा इसी प्रकृति की थी जिसने सिर्फ धैर्य रखा ...दिल को मजबूत बनाकर .....और पाया की अरे ये तो शेर नहीं खेत में फसल की रखवाली के खड़ा किया किया गया एक "पुतला" है ?
           मामला साफ़ हो गया ..........कायरों अब न तो तुम्हे भागने की जरूरत है और न ही बलवानों को इससे भिड़ने की जरूरत है ...........
           आप की राय क्या है? हमें जरूर बताएं...............

                                                                                                   e-mail me at- tnraj007@gmail.com 

Apr 7, 2012

=> पहले 'खुद' तब "खुदा"

                                     भय से ही लोग मंदिर में जाते हैं , की कहीं हमारे साथ गड़बड़ न हो जाये !   हे भगवान, मुझे और मेरे परिवार वालों को दुखों से बचाना, कष्टों से उबरना तथा सुख की बारिश करना..........है न बुद्धूपन .......अरे यह तो किसी अजनवी से रूपये माँगने के जैसा है!  पहले  ईश्वर  को जानो- पहचानो, ज़रा मेल-जोल करो ठीक से समझो ...तब तो वह तुम्हे "लिफ्ट" देगा ! हमने 'उसे' पहचाना नहीं और चल दिए सुख माँगने, चल दिए भक्त बनने....कोई फायदा नहीं है ऐसे फरियाद से .......नहीं सुनेगा 'वो' तुम्हे इस तरह........
                                       सवाल है की पाया कैसे जय ईश्वर को? पाना है तो खोना पड़ेगा ! समय देना पड़ेगा , और हा पोंगा पंडित, ढोंगी बाबा और झूठे मौलानाओं से तौबा करना पड़ेगा ! पत्थर के सामने न झुककर, मजार के सामने मत्था न टेक कर हमें  'खुद'  के सामने झुकना पड़ेगा ! पहले 'खुद' तब "खुदा" ! अल्लाह, भगवान, ईश्वर, खुदा ने हमें जिस मिट्टी से बनाया है उसकी कीमत समझनी होगी......मगर हम तो इतने अभिमानी हैं की खुद मिट्टी से मूर्तियों का निर्माण करते हैं और खुद उसके सामने घंटों बैठ कर ये फरियाद करते हैं की - हे भगवान मेरे दुखों को दूर कर दे ! खुदा भी हँसता होगा हमारी नासमझी पर , की कैसे मुर्ख हैं ये सारे मनुष्य? एक शेर याद आ रहा है -

                                   किसकी कीमत समझूं ऐ खुदा तेरे इस जहां में 
                             "तू" मिट्टी से इंसान बनता हैं और वो मिट्टी से "तुझे"