Jan 7, 2010

=> पुलिस प्रशासन और न्याय की बिसंगति देती है भ्रस्टाचार का जन्म

                          आज जब प्रगतिशील भारत अपने बिभिन्न पहुलओं को मजबूत करने में जुटा है तो पूरे भारत में इसकी पहचान बन रही है, चाहे रूस के साथ परमाणु समझौता हो या कोपेनहेगन का जलवायु समझौता! मगर आबादी की नजर से दूसरा स्थान प्राप्त भारत आज अपनी पहचान बनाने के बावजूद गरीब व शक्तिहीन जान पड़ता है! यहाँ की बड़ी मछालियाँ,छोटी मछालियों को न तो बढ़ने देती है और न ही मरने ही देती है अपितु उनका खून चूस कर उन्हें तड़पता देख आनंद की अनुभूति करती हैं!
                 पृथ्वी पर उपस्थित हर आदमी शरीफ, इमानदार होता है, यहाँ की परिस्थितियां उसे चोर, निकम्मा व पथभ्रस्त बना देती हैं!यदि समय-परक उचित-न्याय की व्यवस्था ठीक तरह से काम करने लगे तो ज्यादातर आबादी गलत रास्ते पर जाने से रूक सकती है! सवाल यह है की आम आदमी हत्यारा कैसे बनता है?? तो सबसे पहले यही उत्तर आता है की न्याय नहीं मिला जिसके चलते वह ऐसा करने पर मजबूर हो गया!!!
                   आज अधिकतर लोग जुर्म सहने के बावजूद भी थान्हे पर रिपोर्ट लिखवाने से कतरातें है क्योंकि वो जानते हैं की समाज की बड़ी मछालियाँ न्याय नहीं होने देंगी! इन बड़ी मचलियों का बहुत बड़ा समूह है जो अबिरत एक दूसरे को सहायता पहुंचाते रहते है और गरीब माँ बहनों की इज्जत व मान सम्मान से खेल कर मुस्कुराते है!
आज न्याय ब्यवस्था और पुलिस प्रशासन व सरकार सभी पैसे पर बिक रहे है अंतर है तो इनके  रेट का और इशी रेट  की मार में आम आदमी पिस रहा है!

आज हर सख्श टेंशन में जी रहा है चाहे बच्चा हो, बुजुर्ग हो या युवा! जहाँ बच्चे पढाई के टेंशन में है वही युवा करियर व बुजुर्ग अपनी हालात के चलते टेंशन में है! टेंशन में होते हुए भी कोई दुनिया की दौड़  में पीछे नहीं होना चाहता! हर कोई अचानक और कम समय में दुनिया के नामचीन लोंगो में शुमार होना चाहता है! जब लोग इशी भागदौड़ में दूसरे से पीछे हो जाते हैं तो शार्टकट का सहारा लेते हैं और यही शार्टकट देता है भ्रस्टाचार रुपी राक्षश का जन्म! इसके लिए हम सभी को आगे आने की जरूरत है तभी यह कुछ कम हो सकता है!!वैसे ज्यादातर परिस्थितिओं में हम खुद ही अपनी समस्यानो के जन्मदाता है......कवि दिनकर की ये पंक्तिया हमें हमारी औकात बता देती है----
      रात यूँ  कहने लगा हमसे गगन का चाँद
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है
उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता
और फिर बेचैन हो जगता न सोता है......

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