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Nov 24, 2011

=> हिंदी की महत्ता को जानें


हिंदी भाषा को जानने व समझने वालों की कमी व इसको सम्मान देने वालों की कमी देख कर चिंतित हैं त्रिनाथ मिश्र

                        हम हिंद देश के वाशी हैं और हिन्दुस्तान हमारी पहचान है, हिंदी भाषा हमारी राष्ट्रभाषा है और राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है ! हिंदी देश की एकता-अखंडता की कड़ी है और राष्ट्र अभिब्यक्ति का सरलतम स्त्रोत है इसी कारण देश के बड़े भू-भाग पर हिंदी बोली जाती है! जब तक हम हिंदी को नहीं जानेंगे तब तक हमें भारतीय होने पर सन्देश हैं! इसका मतलब की जीवित रहने हेतु रोटी, कपड़ा और मकान के बाद चौथी प्राथमिकता 'हिंदी' की होनी चाहिए इसी में हमारा सम्मान व् उन्नति निहित है! हिंदी खड़ी बोली के प्रणेता तथा प्रसिद्ध लेखक व कवी भारतेंदु हरिशचंद द्वारा हिंदी के परिपेक्ष्य में कही गयी निम्न पंक्तियाँ हमें अक्षरशः याद रहनी चाहिए-
    "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
     बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल"
                         भारत में भाषाओं की बहुलता हैं और सभी भाषाओँ का अपना महत्व है, लेकिन जनसंपर्क उसी भाषा में संभव है जो ज्यादा से ज्यादा लोंगो में प्रचलित हो और जब बात हो भारत जैसे विकाशशील देश की तो लोंगो को समेकित करने, वार्तालाप को सुगम बनाने तथा विकाश को गति देने के लिए अति-प्रचलित भाषा का प्रयोग किया जाना नितांत आवश्यक है और निसंदेह रूप से हिंदी ही वह भाषा है जो सभी कार्यों में सहजता प्रदान करती है!
                      आज-कल मीडिया में गाड़ियों के नंबर हिंदी में लिखे होने को लेकर हलचल है.....! यह हर्ष का विषय होते हुए भी "हिंदी-मीडिया" इसे उछाल रही है, हमें इस बात को तवज्जो देनी चाहिए की कम से कम कोई तो शुरुआत कर रहा है,  हिंदी की गंभीरता को कोई तो समझ रहा है!
                       इसके अलांवा घर पर अक्सर देखा जाता है की महिलायें अपने बच्चों से हिंदी में बात नहीं करतीं और बच्चों को अंग्रेजी की तामील देने में लगी हुई हैं........इसी चक्कर में फँश कर बच्चा न तो हिन्दुस्तानी बन पाता है और न ही अंग्रेज अपितु उसकी शैली ही बदल जाती है जो आज-कल 'हिंग्लिश' के रूप में प्रचलित है! ऐसे लोंगो ने हिंदी का सत्यानाश क्र दिया है, हमें सुधारना होगा वर्ना एक दिन हम अपने देश में ही बेगाने हो जायेंगे! हिंदी प्रणेता हरिशचंद ने कहा है की-
           "अंग्रेजी पढिके जदपि, सब गुण रहत प्रवीण
            पै निज-भाषा ज्ञान बिनु, रहत हीन के हीन"

 प्रिय देशवाशियों ! हिंदी की महत्ता को समझो, इसकी जरुरत को समझो,
कब तक उधार की बोली बोलोगे..........?
कब तक दूसरों के सहारे डोलोगे.........?
अपनी विरासत संभाली नही जाती,,,,,,,,,,,,,और हम हैं की दूसरों की सहेजने में लगे हैं........



1 comment:

Anonymous said...

good

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