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Jun 27, 2014

=> कहीं ज़ुल्मो-सितम सहने के हम आदी न हो जायें

  • अशोक रावत
हमारी चेतना पर आँधियाँ हाबी न हो जायें,
कहीं ज़ुल्मो-सितम सहने के हम आदी न हो जायें।
         कहीं ऐसा न हो जाये भुला ही दें परिंदों को,
         कहीं ये पेड़ कटने के लिये राज़ी न हो जायें।
डुबो दें बीच दरिया में हमारी नाव ले जा कर,
तमाशा देखनेवाले कहीं माँझी न हो जायें।
          हमें डर है अहिंसा, प्रेम, करुणा, दोस्ती, ईमान,
         बदलते दौर में अलफ़ाज़ ये गाली न हो जायें।
कहीं ये गौडसे इतिहास का नायक न हो जाये,
कहीं मायूस इस इतिहास से गाँधी न हो जायें।

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