Feb 7, 2016

=> "बेटी की पुकार" मुझसे यह कह रही है कि सिकेन मेरी माँ से ये बातें कह दो जरा ......

  • 1 फरवरी की सुबह नई दिल्ली में बेटी की पुकार "तू ही रे" के तैयारियों के साथ शुरू  होती है। मन में जोश और जुनून कुछ इस कदर छाया था जैसे मानो "बेटी की पुकार" मुझसे यह कह रही है कि सिकेन मेरी माँ से ये बातें कह दो जरा। ......
  • सिकेन शेखर 
अम्मा, मेरी अम्मा नजर आता है डर ही डर तेरे घर-बार में अम्मा,
नही आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा,
नजर आता है डर ही डर तेरे घर-बार में अम्मा
यहाँ तो कोई भी रिश्ता, नही विश्वास के काबिल
सिसकती है मेरी सांसें, बहुत डरता है मेरा दिल
समझ आता नही ये क्या छुपा है प्यार में अम्मा।
नही आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा ......
मुझे तू कोख में लाई, बड़ा उपकार है तेरा
तेरी ममता, मेरी माई, बड़ा उपकार है तेरा
न शामिल कर जनम देने की ज़िद, उपकार में अम्मा।
नही आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा ........
उजाला बन के आई हूँ जहाँ से, मुझको लौटा दे
तुझे सौगंध है मेरी, यहाँ से, मुझको लौटा दे
अजन्मा ही तू रहने दे मुझे संसार में अम्मा।
नही आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा ......
मगर सबसे बड़ा सवाल यह कि यह मुकम्मल योजना दरअसल किसके लिए होगा? क्या समाज में बेटियों को जन्म लेने के बाद सरकार कभी सुरक्षा की ज़िम्मेदारियां लेगी? सच्चाई यह भी है कि जब तक एक बेटी समाज में सुरक्षित नही तब तक कौन सरकारी योजना का फायदा लेगा? जब सरकार को यह तमाम समीकरण इर्द-गिर्द नज़र आती है तो "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" को आंदोलन जैसे शब्दों से जोर देती है। एक बेटी के द्वारा कहना कितनी शर्म की बात होगी कि इस संसार में मुझे रहने और पढ़ने के लिए सरकार जो इस वक्त सत्ता में है। वह आंदोलन कर रही है। "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" के नाम पर। यह सब जानते हुए कि मैं इस संसार में सुरक्षित नहीं।
को गिनते रहे सरकार की कोई भी योजना या कानून सफल होता नही दिखता, सरकार की कोई भी पंच लाइन नेशनल क्राइम ब्यूरो की तरफ से आने वाले रिपोर्ट को चुनौती देता नही दिखता।
अपनी तमन्नाओं और ख्वाहिशों को नया रंग देने का दिन है,
मैं कर सकता हूँ और कर रहा हूँ
ये साबित करने का दिन है,
मैं जलकर भी उजाला कर दूंगा इस जहाँ में
आज अंधकार मिटाने का दिन है। (सबसे पहले इन पंक्तियों के सहारे निलिमा ठाकुर जी 'बेटी की पुकार'- "तू ही रे" के दिन को समझाती है।) आपकी खबर के मुताबिक "निवेदिता फाउंडेशन की सचिव नीलिमा ठाकुर कहती है कि इस आयोजन के ज़रिए माँ बेटी के बीच के पावन रिश्ते के मर्म को लघु नाटिका बेटी की पुकार " तू ही रे " के जरिये इस मंच से समाज के लोगो के मानसिक पटल पर उकेरने का प्रयास थी जिसमे सभी के सहयोग से कामयाबी मिली ! इस मंच से समाज में एक संदेश देने की कोशिश की गई कि माँ और बेटी दोनो ही समाज का अभिन्न अंग हैं ! माँ के बिना समाज की कल्पना जैसे नहीँ की जा सकती वैसे ही एक बेटी के बिना हम समाज में प्रेम की नींव नहीँ डाल सकते ! दोनो ही त्याग और प्रेम की जीवंत मिसाल के रूप में खुद को संजोये हुए हैं।"
मंच पर न्यूज़ एंकर अनुराधा दास के साथ एक पहला मौका था मेरे पास एंकरिंग करने की। थोड़ा डर भी लग रहा था अभी कुछ ही दिन पहले 3 फरवरी को रात में 11 बज कर 49 मिनट पर मैंने अपने फेसबुक पोस्ट के जरिये आप लोगो से कहा था कि "देश की राजधानी नई दिल्ली में पहला मौका था जब 'निवेदिता फाउंडेशन' की सचिव निलिमा ठाकुर मैम ने एक बड़ी जिम्मेदारी मुझे दी थी । 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' इसे पूरे देश में एक आंदोलन का रुप दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को हरियाणा के पानीपत में इस अभियान की शुरुआत किए थे । इन सब के बीच मुझे इसकी सुगबुगाहट 2005 से नजर आती है। कब कहाँ और कैसे? अगर आप बेटी की पुकार '' तू ही रे '' कार्यक्रम का हिस्सा नही बने हो तो आपके लिए मैं शुक्रवार को शाम के 7 बजे अपने Blog Beyond The Third Eye में इस कार्यक्रम के तमाम पहलू को समझाने की कोशिश करूँगा । उम्मीद है आप इसका हिस्सा जरूर बनेंगे और निलिमा मैम की इस आंदोलन को आगे जारी रखने में मदद करेंगे । जय हिन्द।" तो आइये आपको बताता हूँ 2005 कि वह कहानी -
अपनी योजना के बारे बताते हुए पालीवाल कहते है कि ग्राम पंचायत में पास किए गए प्रावधान के तहत हर साल एएनएम सेंटर से यह लिस्ट ली जाती है कि हमारी ग्राम पंचायत में इस साल कितनी बेटियां पैदा हुई। फिर जिस परिवार में बेटी पैदा हुई होती है,उस परिवार को बुलाया जाता है। जैसे एक साल में ग्राम पंचायत में 10 बेटियां पैदा हुई तो उन दसों परिवार के लोगो को बुलाया जाता है। उनका सम्मान करने के साथ ही उन्ही के हाथों 111 पौधे लगवाए जाते हैं। ग्राम पंचायत के लोग चंदा इकठ्ठा करते हैं। फिर बेटी के परिवार से चंदा लिया जाता है। इसके बाद हर बेटी के नाम से 30 हज़ार रूपये की फिक्स डिपाजिट करवाई जाती है। एक एफडी 18 से 21 साल के लिए होती है। इस रकम से लड़की के माता-पिता चाहें तो बेटी की शादी करें अथवा उसकी उच्च शिक्षा में खर्च करें। ग्राम पंचायत पिपलांत्री में वर्ष 2005 में शुरू हुआ यह अभियान दिनोंदिन आगे बढ़ता जा रहा है। ग्राम पंचायत में करीब चार लाख से भी ज्यादा पौधे लगाये जा चुके हैं।
क्या कहते है? "है न रोचक कहानी"
तो आप आज क्या निर्णय लेने वाले है कुछ करने कि जब घर में बिटीया जन्म लेगी।
'नेहा नाहटा' ने 'बेटी की पुकार' पर आधारित इस शो पर अपनी विचार कुछ इस तरह रखी है-
बेटे से कम नही, जज्बा मेरा
बनूंगी हौसला तेरा ,हारो नही माँ
जन्म दो,मारो नही माँ
"बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ"बस नारा नही ,एक प्रण बने
सृष्टी का संतुलन,बिगाडो नही माँ
जन्म दो, मारो नही माँ. ...... (नेहा नाहटा)
बेटी भार नहीं आभार है,बेटी कुदरत की करुण पुकार है
बेटी है तो कल है, बेटी है तो हर पल है।
बेटी नहीं तो सब गुमशुम हैं।
आओ बेटी के सम्मान में दुनिया दुनिया अलख जगाएं
बेटी बचाएं बेटे पढ़ाएं॥कुछ इसी सन्देश को लेकर मंच पर आगाज़ करने उतरी बेहद ख़ास अंदाज़ वाली और जोशीली टीवी पत्रकार, एंकर अनुराधा दास जिनका साथ दिया मेरठ स्थित इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यट के युवा लेक्चरर एवं पत्रकार सिकेन शेखर ने।
बेटी की पुकार "तू ही रे " के विषय पर आधारित माँ बेटी के रिश्ते पर आधारित इस अलग तरह के शो का आयोजन निवेदिता फाउंडेशन और इलीट इंडिया फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से माँ बेटी के सम्मान में
आयोजित किया जिसमे मुख्यत इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया की माँ और बेटी के बिना किसी भी समाज की कल्पना बेमानी होगी । जैसे माँ अपने त्याग की बदौलत घर परिवार ,समाज और देश के लिए अपना अर्वस्व कुर्बान कर देती है वहीँ बेटियां भी प्यार और त्याग की मिसाल के तौर पर जानी जाती हैं । लेकिन आज के इस कार्यक्रम का केंद्र वो माँ और बेटियां रही जिन्होंने कदम से कदम मिला कर एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ा और इस मंच से एक दूसरे से ये वायदा लिया की हर कदम पर एक दूसरे की संगी साथी के रूप में सदैव खड़ी मिलेंगी ।
लेकिन कुछ ऐसी बेटियां जो समाज में आने से पहले ही मार दी जाती हैं । जिन्हे पैदा होने से पूर्व ही या तो गर्भ में खत्म कर दिया जाता है या फिर पैदा होने के बाद दरकिनार कर दिया जाता है । ऐसी बेटियों के लिए यह शो आज मील का पत्थर साबित होगा क्योकि यह अकेला इस प्रकार का शो माना जा रहा है जिसमे कुछ अलग प्रकार से अजन्मी बेटियों के अंतर्मन की व्यथा को समाज में रखा । जिसमे पदार्पण ग्रुप के कलाकारों ने पेश किये नाटक से यही विषय उठाया की जन्म से पूर्व अगर बेटियों की ह्त्या यूँ ही जारी रही तो एक दिन ना बेटी होगी न बहु,ना बहन होगी न भाभी ,ना बीवी होगी और ना माँ । औरत के समाज से विलुप्त होने की कल्पना मात्र से दिल दिमाग सिहर उठता है तो आप कल्पना कीजिये जिन लोगो ने इस नाट्य रूपांतरन को शो में न आकर मिस किया उन्हें कितना अफ़सोस हो रहा होगा ।
शो की शुरुआत एक बेहद ममर्स्पर्शी गीत बेटी की पुकार से परदे पर हुई । शुरआत से ही दर्शको में उत्साह और शो के प्रति ललक साफ़ देखी जा सकती थी । बेटी की माँ की कोख से वो मर्मस्पर्शी अपील को सुनकर दर्शको में सन्नाटा पसर गया । विशेष अतिथि , जज और दर्शको में से कई लोगों को आँशु पोंछते साफ देखा जा सकता था ।
" बेटी ये कोख से बोल रही माँ कर दे तू मुझपे ये उपकार । मत मार मुझे जीवन दे दे मुझको भी देखन दे ये संसार " जी हाँ इसी अंतर्मन को झकझोर देने वाले गीत ने माहोल को बेहद ग़मगीन बना दिया ।
ऐसे में शो में गीत संगीत के दो महारथी इंडियन आइडियल के पूर्व प्रतियोगी सुमित चौहान और कोयल जैसी आवाज़ वाली प्रिया दास ने अपने गीतों से माहोल में हल्कापन बनाये रखा । सुमित चौहान के गीत "आपके हसीन रुख पर आज नया जो नूर है " को जहाँ तालियों की गड़गडाहट मिली वहीँ प्रिया की खूबसूरत प्रस्तुति " बातें तू ये कभी ना भूलना, तेरी खातिर कोई जी रहा" ने दर्शको में मस्ती का माहोल बना दिया ।
वहीँ कार्यक्रम की मुख्यधारा शो में प्रतियोगी के रूप भाग ले रही माँ बेटियों के इर्दगिर्द ही घूमती रही । पहले बेटियों का देशी विदेशी परिधानों में रेम्प पर कैटवाक लिए आना कहीं से भी किसी अंतर्राष्ट्रीय ब्यूटी कॉन्टेस्ट की ब्यूटी क्वीन से ये खूबसूरत बेटियां कम नहीं लग थी । शो के कॉन्सेप्ट में चार चाँद उस वक्त लग गए जब माँ बेटियां बाहों में बाहें डाले रेम्प पर उतरी। मानो पूरा परी लोक मुक्तधारा ऑडिटोरियम के मंच पर उतर आया !
माँ बेटियों ने जज पैनल में मौजूद महिला वकील भावना बजाज, फैशन डिजायनर अर्चना तोमर ,डीआईडी सुपर मॉम की पूर्व प्रतियोगी और नृत्यांगना शिप्रा शर्मा और छू ले आसमान एनजीओ मुरादाबाद से आई वर्षा चौहान के सवालो का जवाब देकर जजो का ही नहीं सभी दर्शको का दिल जीत लिया । जिसकी गवाही ऑडिटोरियम में तालियों की गड़गडाहट दे रही थी । हर माँ ने अपनी बेटी के महत्व का बखान कर जज पैनल और दर्शको का दिल जीत लिया । वहीँ बेटियों ने अपने चिरपरिचित अंदाज में माँ पर मंच से ही खूब प्यार लुटाया जिसके लिए बेटियां जानी जाती हैं ।
जज भावना बजाज, अर्चना तोमर , शिप्रा शर्मा और वर्षा चौहान ने सर्वसम्मति से सभी माँ बेटियों को बराबर अंक देकर सभी को विजेता घोषित किया । पैनल के मुताबिक़ आज ऐसे माहोल में कोई माँ बेटी दूसरी माँ बेटी से कमतर नहीं आंकी जाए । क्योकि हर माँ बेटी आज इस मंच से एक दूसरे के लिए ही नहीं समाज के लिए यह सन्देश छोड़ कर जा रहीं हैं की बेटी को जन्म दें बेटी को मारें नहीं ।
लेखिका और समाजसेविका पूनम मटिया अपनी खूबसूरत बेटी तरंग ,नेहा नाहटा बेटी नेत्रा ,रश्मि सचदेवा अपनी परी बिटिया आस्था , नीतू नागर अपनी बेटी नन्ही परी , फरीदाबाद की सामाजिक कार्यकर्ता गीता अपनी बिटिया विधी और मेकओवर आर्टिस्ट संध्या मदान अपनी फूल सी कली चार्वी संग मंच पर समाज के लिए सवाल छोड़ गई की जब हम माँ बेटियां माँ बेटी के पावन रिश्ते को साथक बना सकती हैं तो माँ बाप दादा दादी क्यों न रिश्ते को समझते हुए अपनी अजन्मी बेटी की पुकार सुने ?
इससे पहले विशिष्ट अतिथियों जिनमे वरिष्ठ वकील, संत और सामाजिक विचारक श्री राजबीर सिंह ढाका और श्री राजीव गर्ग के कर कमलो दवारा दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम की औचारिक शुरुवात हुई जिसके उपरान्त बेटी की पुकार पर आधारित एक लघु नाटिका शो का मंचन बेहद अहम हिस्सा रहा ।
निवेदिता फाउंडेशन और इलीट इंडिया फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस शो में देश के कोने कोने से लोग सहयोग करने इस मंच पर एक साथ मौजदू दिखे जिनमे पेजथ्री सेलिब्रेटी सलोनी सिंह ,डिवाइन प्रोडक्टन कम्पनी से गोपाल पंडित, दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकाश विभाग में सहायक निदेशक मनोज चंद्रा, हरियाणवी फिल्म एक्टर वीर दहिया, नोएडा के समाज सेवक योगेश शर्मा, नमिता राकेश ,ब्लेसिंग इंडिया फॉउन्डेशन की फाउंडर सुमन रेखा कपूर , ने इस प्रयास को खूब सराहा ।
निवेदिता फाउंडेशन की सचिव नीलिमा ठाकुर कहती है कि इस आयोजन के ज़रिए माँ बेटी के बीच के पावन रिश्ते के मर्म को लघु नाटिका बेटी की पुकार " तू ही रे " के जरिये इस मंच से समाज के लोगो के मानसिक पटल पर उकेरने का प्रयास थी जिसमे सभी के सहयोग से कामयाबी मिली ! इस मंच से समाज में एक संदेश देने की कोशिश की गई कि माँ और बेटी दोनो ही समाज का अभिन्न अंग हैं ! माँ के बिना समाज की कल्पना जैसे नहीँ की जा सकती वैसे ही एक बेटी के बिना हम समाज में प्रेम की नींव नहीँ डाल सकते ! दोनो ही त्याग और प्रेम की जीवंत मिसाल के रूप में खुद को संजोये हुए हैं !
वहीं इलीट इंडिया फाउंडेशन के फाउंडर नरेश मदान कहते हैं कि "तू ही रे" एक ऐसी सोच को लेकर पैदा हुआ जिसमे औरत के विभिन्न रूपो को समाज मे रखा जाए | इस प्रयास की शुरआत माँ और बेटी के रिश्ते से बेहतर नही हो सकती थी | भ्रूण हत्या ,बालिका वधु ,दहेज हत्या,ऑनर किलिंग और बलात्कार जैसी जघन्य अपराधों ने जहाँ माँ बेटी दोनो के लिए असहाय हालात पैदा कर दिए ! इन्हीं हालातों को बदलने का संदेश देने की कोशिश में "तू ही रे" को मंच पर उतारा गया ! इलिट इंडिया फाउंडेशन के फाउंडर नरेश मदान और निवेदिता फाउंडेशन की चीफ नीलिमा ठाकुर ने अपनी टीम के सभी सदस्यों को धन्यवाद दिया ।
आलोक श्रीवास्तव के द्वारा लिखा गीत की इन पंक्तियों से दरअसल बेटी की एहसास और आवाज को समझा जा सकता है। मगर आज जिस तस्वीर को, एहसास को और आवाज को सुनना चाहते है वह इसके ठीक विपरीत है क्योंकि जब एक तरफ एक बेटी कोख में रह कर अपनी माँ से सब कुछ कह रही है कि जिस घर में समाज में, संसार में तुम मुझे जन्म दे कर ला रही हो वहां डर लगता है मुझे। इस बुरे संसार में नहीं आना मुझे क्योंकि यहाँ तो कोई भी रिश्ता नही विश्वास के काबिल। माँ सिसकती है मेरी सांसे बहुत डरता है मेरा दिल। तो सरकार के समक्ष एक ऐसी चुनौती दिखती है जिसे हम और आप एक दो शब्दों में ही समझ सकते है। आइये जरा समझते है -
केंद्र सरकार आज बेटी को पढ़ाने के लिए मुकम्मल योजना बनाई है। योजना, योजना एक-दो बार लगातार जोर से बोली जाए तो बेटी के मुद्दे, बेटी से सम्बंधित मसले सब छिप जाते है। इस 67 वर्ष के गणतंत्र में हम और आप एक राज्य को संपूर्ण साक्षर राज्य के तौर पर देख रहे है तो दूसरी ओर सरकार बेटी को पढ़ाने के लिए सरकार मुकम्मल योजना बनाती दिखती है और तीसरी तस्वीर बेटी की है जो अपनी माँ से जन्म लेने के पहले कोख में कह रही है कि मुझे आना नही इतने बुरे संसार में अम्मा।.... तस्वीर साफ है।
भारत देश के विभिन्न प्रदेशों में महिला जन्म दर की स्थिति देखें तो चौकाने वाली है। सबसे ख़राब हालत हरियाणा की है। इसी संकट से निबटने के लिए "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" अभियान, आंदोलन या इसे मुकम्मल योजना कहे जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को हरियाणा के पानीपत से की। इन सब के बीच महिलाओं की सुरक्षा के मामले में देश की हालात बिलकुल नही बदला। देश की राजधानी नई दिल्ली की बात करें या क्यों न एक एक कर के राज्यों में हो रहे महिलाओं के खिलाफ अपराध की गिनतियों 
भारत देश में महज़ 29 मिनट में एक महिला के साथ रेप किया जाता है। इन सब के बाद भारत महान देश के श्रेणी में चुन लिया जाता है। भारत के पुरुष अगर 29 मिनट में क्राइम रिकॉर्ड को बरक़रार रखना चाहते है तो हम किस तरह की विकसित देश बनाने की कल्पना कर रहे है। मकसद समझना बेहद जरुरी है क्योंकि बात बेटी बचाने की हो रही है और साथ ही बेटी पढ़ाने की। इस वक्त देश की स्थिति महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर है और इन सब के बीच "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसे मसले पर कोई भी शुरुआत करना बेहद जटिल है और इन जटिल मुद्दों को जड़ से सफाया करने की कोशिश एनजीओ 'निवेदिता फाउंडेशन' की सचिव निलिमा ठाकुर कर रही है।
आइये समझते है निलिमा ठाकुर की नज़रिया से बीते दिन नईं दिल्ली में आयोजित हुए 'बेटी की पुकार'- "तू ही रे" कार्यकर्म को -
आज कोरे आसमान पे एक पैगाम लिखने का दिन है 
और कोई साथ दे तो भला और न दे तो भला 
निलिमा अपने संबोधन में कहती है "माहौल और देश की बात करें तो जागरूकता की जरूरत हर जगह पड़ती है और आज विश्व जिस दौर से गुजर रहा है। वहां सिर्फ बेटी बचाओ की बात नही बेटी बचाओ के साथ मानवता की बात है। क्या पेरिस, क्या भारत, क्या पाकिस्तान, सिरिया, इजराइल या ऑस्ट्रेलिया एक आतंकवाद की दहशत गर्दी से हर मुल्क की आवाम संकट में है। रोज न जाने कितने बेगुनाह बेमौत मर रहे है। हमें इस पर विचार करनी चाहिए कि हम एक अच्छा इंसान कैसे बने? वह कहती है हिन्दू मुस्लिम ईसाई नही विचार और होशपूर्ण धार्मिक आदमी बनना है। क्योंकि जिसमें सोच है, जिसेमें होश है वो कभी किसी के दुःख का कारण नही बन सकता।
राजस्थान में उदय पुर से करीब 70 किलोमीटर दूर राजसमंद जिले में करीब साढ़े आठ हज़ार आबादी वाली पिपलांत्री ग्राम पंचयात स्थित है। निर्मल, आदर्श एवं जाग्रत ग्राम पंचायत का पुरस्कार हासिल करने वाले पिपलांत्री में "बेटी बचाओ" के पीछे की कहानी बड़ी रोचक है। इसकी शुरुआत तत्कालीन सरपंच श्यामसुन्दर पालीवाल ने अपनी बेटी की याद में की। वह बताते हैं कि उनकी दो बेटियों में एक की मौत हो गई। बेटी का उन्हें गहरा आघात लगा। फिर उन्होंने तय किया कि क्यों न जिस तरह से वह बेटी को पालते हैं उसी तरह से पौधे लगाये और उसका पालन पोषण करें। पहले साल उन्होंने अकेले 111 पौधे लगाये। आज वह सभी पेड़ बन चुके है। इसके बाद तय किया गया ग्राम पंचायत में जिसके भी बेटी पैदा होगी वह पेड़ लगाएगा। अपने घर के पास लगे पेड़ को दिखाते हुए कहती हैं कि देखो, "उस नीम के पेड़ को डलिया इस कदर सिर हिला रही हैं, जैसी उनकी बेटी खिलखिला रही है।" 
आपकी खबर के फेसबुक साइट से मिली खबर के मुताबिक "तू ही रे" शो की प्रतियोगी और कवयित्री 
करियर दो,दहेज़ नही माँ.....जन्म दो,मारो नही माँ..
आपकी खबर के संपादक सागर शर्मा ने कुछ इस तरह 'बेटी की पुकार' "तू ही रे" कार्यकर्म को अपने शब्दों में लिखा था।
माँ बेटी को समर्पित स्टेज शो "तू ही रे " का धमाकेदार समापन ।

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