Nov 28, 2011

=> ये इल्लू-इल्लू क्या है

एक बार गया था मीटिंग में सब कहने लगे के मिश्रा जी
ये इल्लू-इल्लू क्या है समझाओ जरा गहराई से
                                                                         मैंने कहा फिर सुनो ध्यान से-
                    जब छोरा - छोरी को देखता है
                    दिल उसका 'धक्' से बोलता है
                    साँसे आंये जब "HOT-HOT"
                    आँखों से लगे दो-चार shot
                    नैना-fight के चक्कर में
                    जब मजनू घुमे घाट-घाट
तब इल्लू-इल्लू होता है - तब इल्लू-इल्लू होता है !

Nov 26, 2011

=> दिल-will -प्यार-war बड़ा है कमाल का !

         सच कहा है किसी शायर ने के दिल-will -प्यार-war  बड़ा है कमाल का ! जी हाँ दोस्तों, हमें अपने जीवन की नौका को किनारे लगाने के लिए ये चार चीजें मायने रखती हैं -
                     1- दिल, यानी आपका अपना भगवान क्योंकि भगवान का वास दिल में होता है जो धड़कता है तो साँसे चलती हैं और रुक जाता है तो सब कुछ बंद ! 
                    2- दूसरा है WILL  यानि चाह , कुछ करने की इच्छा ! अगर आप इज्जत पाना चाहते हैं, सोहरत पाना चाहते हैं तो विल-पॉवर की बहुत ही जरुरत पड़ेगी, दुनिया की महान हस्तियाँ विल-पॉवर की वजह से ही आज बुलंदियां छू रही हैं ! 
                    3- तीसरी बात आती है प्यार की; प्यार वो शब्द है जिसके आगे नफरत की आग ठंढी पर जाती है, और यदि आपको अपने लक्ष्य से प्यार हो जाए तो समझो सफलता की आधी इबादत लिख दिया है आपने ! प्यार बड़ा ही करामाती लब्ज है क्योंकि जहां यह रहता है वहाँ उन्नत, सफलता, दूसरों का सहयोग खुद-बा-खुद मिल जाता है !
                    4- और आखरी बात है वार(war) की यानी लड़ाई की ! मेरा मतलब यह नहीं की आप लड़ाई और झगडा करें बल्कि कहने का मतलब यह है की जब सारी युक्तियाँ काम करना बंद कर दें तो लड़ाई काम आती है जैसे किया था सरदार भगत सिंह ने, जैसे किया था रामचंद्र ने, जैसे किया था पांडवों ने ! अब आप समझ गए होंगे की मई किस लड़ाई की बात कर रहा हूँ ! कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल और केवल मार-काट की भाषा समझते हैं क्योंकि वो अपनी विचारधारा के संकुचित होते हुए भी अपने आप को विशाल मानते हैं तभी तो दो लफ्जों का प्यार समझ में न आकर चार शब्द का नफरत आसानी से समझाते हैं !

Nov 24, 2011

=> हिंदी की महत्ता को जानें


हिंदी भाषा को जानने व समझने वालों की कमी व इसको सम्मान देने वालों की कमी देख कर चिंतित हैं त्रिनाथ मिश्र

                        हम हिंद देश के वाशी हैं और हिन्दुस्तान हमारी पहचान है, हिंदी भाषा हमारी राष्ट्रभाषा है और राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है ! हिंदी देश की एकता-अखंडता की कड़ी है और राष्ट्र अभिब्यक्ति का सरलतम स्त्रोत है इसी कारण देश के बड़े भू-भाग पर हिंदी बोली जाती है! जब तक हम हिंदी को नहीं जानेंगे तब तक हमें भारतीय होने पर सन्देश हैं! इसका मतलब की जीवित रहने हेतु रोटी, कपड़ा और मकान के बाद चौथी प्राथमिकता 'हिंदी' की होनी चाहिए इसी में हमारा सम्मान व् उन्नति निहित है! हिंदी खड़ी बोली के प्रणेता तथा प्रसिद्ध लेखक व कवी भारतेंदु हरिशचंद द्वारा हिंदी के परिपेक्ष्य में कही गयी निम्न पंक्तियाँ हमें अक्षरशः याद रहनी चाहिए-
    "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
     बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल"
                         भारत में भाषाओं की बहुलता हैं और सभी भाषाओँ का अपना महत्व है, लेकिन जनसंपर्क उसी भाषा में संभव है जो ज्यादा से ज्यादा लोंगो में प्रचलित हो और जब बात हो भारत जैसे विकाशशील देश की तो लोंगो को समेकित करने, वार्तालाप को सुगम बनाने तथा विकाश को गति देने के लिए अति-प्रचलित भाषा का प्रयोग किया जाना नितांत आवश्यक है और निसंदेह रूप से हिंदी ही वह भाषा है जो सभी कार्यों में सहजता प्रदान करती है!
                      आज-कल मीडिया में गाड़ियों के नंबर हिंदी में लिखे होने को लेकर हलचल है.....! यह हर्ष का विषय होते हुए भी "हिंदी-मीडिया" इसे उछाल रही है, हमें इस बात को तवज्जो देनी चाहिए की कम से कम कोई तो शुरुआत कर रहा है,  हिंदी की गंभीरता को कोई तो समझ रहा है!
                       इसके अलांवा घर पर अक्सर देखा जाता है की महिलायें अपने बच्चों से हिंदी में बात नहीं करतीं और बच्चों को अंग्रेजी की तामील देने में लगी हुई हैं........इसी चक्कर में फँश कर बच्चा न तो हिन्दुस्तानी बन पाता है और न ही अंग्रेज अपितु उसकी शैली ही बदल जाती है जो आज-कल 'हिंग्लिश' के रूप में प्रचलित है! ऐसे लोंगो ने हिंदी का सत्यानाश क्र दिया है, हमें सुधारना होगा वर्ना एक दिन हम अपने देश में ही बेगाने हो जायेंगे! हिंदी प्रणेता हरिशचंद ने कहा है की-
           "अंग्रेजी पढिके जदपि, सब गुण रहत प्रवीण
            पै निज-भाषा ज्ञान बिनु, रहत हीन के हीन"

 प्रिय देशवाशियों ! हिंदी की महत्ता को समझो, इसकी जरुरत को समझो,
कब तक उधार की बोली बोलोगे..........?
कब तक दूसरों के सहारे डोलोगे.........?
अपनी विरासत संभाली नही जाती,,,,,,,,,,,,,और हम हैं की दूसरों की सहेजने में लगे हैं........



Nov 22, 2011

=> पोर्नोग्राफ़िक संस्था के ख़िलाफ़ मुकदमा

दो बड़ी पोर्नोग्राफ़िक कंपनियों ने इंटरनेट वेबसाइटों के पतों को मंज़ूरी देने वाली संस्था आईकैन के ख़िलाफ़ मुकदमा दायर किया है क्योंकि आईकैन ने .xxx डोमेन वाली वेबसाइटो को मंज़ूरी दी है. पॉर्नोग्राफ़ी दिखाने वाली वेबसाइटों के लिए अलग इंटरनेट डोमेन .xxx को इस साल मार्च में स्वीकृति दी गई थी.
लेकिन प्लेबॉय साइटों की प्रबंधन कंपनी मैनविन लाइसेनसिंग और डिजिटल प्लेग्राउंड का कहना है कि .xxx को मंज़ूरी देना ग़लत है. आईकैन ने कहा है कि वो इस मामले पर पुर्नविचार कर रही है.
ग़ैर सरकारी संस्था आईकैन ने पहले .xxx डोमेन नाम दिए जाने पर ऐतराज़ किया था. आईसीएम कंपनी ने 2000 में इसके लिए आवेदन किया था. उस समय आईकैन का कहना था कि इंटरनेट पर व्यस्कों के लिए सामग्री पहले सी ही उपलब्ध है और अलग से .xxx डोमेन की ज़रूरत नहीं है.
लेकिन आईसीएम बार-बार इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करती रही. फिर एक स्वतंत्र पैनल ने मामले पर विचार किया और आईसीएम का समर्थन किया. फिर इस साल मार्च में तीन के मुकाबले नौ वोटों से .xxx डोमेन नाम देने के पक्ष में मतदान हुआ. आईसीएम ने कहा है कि वो 2012 में इस नाम को लॉन्च करेगी.
लेकिन प्लेबॉय वेबसाइटें चलाने वाली कंपनी मैनविन ने कहा है कि आईसीएम हर पते के लिए सालाना 60 पाउंड फ़ीस माँग रही है जो बाकी डोमेन नाम के लिए तय फ़ीस से दस गुना ज़्यादा है.
मैनविन का ये भी कहना है कि .xxx डोमेन नाम जारी करने से पहले संस्था ने कोई बोली नहीं लगवाई और न ही .xxx शुरु करने के फ़ैसले से पहले कोई आर्थिक अध्ययन करवाया. ये भी आरोप लगाया गया है कि अपनी अर्ज़ी के पक्ष में आईसीएम ने फ़र्ज़ी टिप्पणियाँ लिखवाईं.
लेकिन आईसीएम ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है !

यौन उत्पीणन



                   Aajakla BaaOitkvaad [tnaa baZ, gayaa hO ik hr pirvaar kI caah haotI hO ik vao tmaama BaaOitk sauK sauivaQaaAaoM ko saaqa jaIvana vyatIt kroM. saaqa hI Aaja kI iSaixat maihlaa Gar baOz kr caaOka caUlha kao inayait maana kr nahIM baOz patI. Aaja ko daOr maoM maihlaaeM Apnao vyai@t%va ko ivakasa ko saaqa saaqa pirvaar kao Aaiqa-k $p sao saudRZ, banaanao ko ilayao naaOkrI yaa vyavasaaya krnao lagaI hOM. eosao maoM samaaja maoM naaOkrISauda yaa svavayavasaayaI maihlaaAaoM ka p`itSat hr vaga- kI maihlaaAaoM maoM baZ,a hI hO. saaqa hI baZ,I hOM Apnao ivakasa ko ilayao puÉYa sao p`itWMinWta kI Baavanaa BaI. [sako saaqa saaqa maihlaaAaoM ko saaqa kayaa-laya yaa kaya-xao~ maoM CoD,CaD‚ yaaOna ]%pID,na yaa SaaoYaNa kI GaTnaaAaoM maoM BaI baZतरी हुई है 
                   saup`Ima kaoT- nao yaaOna ]%pID,na kao pirBaaiYat krto hue yah kha hO ik  " yaaOna AaQaairt yaa inaQaa-irt vyavahar caaho p`%yaxa hao yaa Ap`%yaxa ]%pID,na ko Antga-t Aata hO. jaOsao – 
  1. SaarIirk sampk- yaa [sako inaima




Nov 17, 2011

=> एक छोटे से मजाक से महाभारत पैदा हुआ



      एक छोटे से मजाक से महाभारत पैदा हुआ। एक छोटे से व्‍यंग से द्रौपदी के कारण जो दुर्योधन के मन में तीर की तरह चूभ गया और द्रौपदी नग्‍न की गई। नग्‍न कि गई; हुई नहीं—यह दूसरी बात है। करने वाले ने कोई कोर-कसर न छोड़ी थी। करने वालों ने सारी ताकत लगा दी थी। लेकिन फल आया नहीं, किए हुए के अनुकूल नहीं आया फल—यह दूसरी बात हे।
      असल में, जो द्रौपदी को नग्न करना चाहते थे, उन्‍होंने क्‍या रख छोड़ा था। उनकी तरफ से कोई कोर  न थी। लेकिन हम सभी कर्म करने वालों को, अज्ञात भी बीच में उतर आता है। इसका कभी कोई पता नहीं है। वह जो कृष्‍ण की कथा है, वह अज्ञात के उतरने की कथा है। अज्ञात के हाथ है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ते।
      हम ही नहीं है इस पृथ्‍वी पर। मैं अकेला नहीं हूं। मेरी अकेली आकांक्षा नहीं हे। अनंत आकांक्षा है। और अंनत की भी आंकाक्षा है। और उन सब के गणित पर अंतत: तय होता है कि क्‍या हुआ। अकेला दुर्योधन ही नहीं है नग्‍न करने में, द्रौपदी भी तो है जो नग्‍न की जा रही है। द्रौपदी की भी तो चेतना है, द्रौपदी का भी तो अस्‍तित्‍व है। और अन्‍याय होगा यह कि द्रौपदी वस्‍तु की तरह प्रयोग की जाए। उसके पास भी चेतना है और व्‍यक्‍ति है; उसके पास भी संकल्‍प है। साधारण स्‍त्री नहीं है द्रौपदी।
      सच तो यह है कि द्रौपदी के मुकाबले की स्‍त्री पूरे विश्‍व के इतिहास में दूसरी नहीं है। कठिन लगेगी बात। क्‍योंकि याद आती है सीता की, याद आती सावित्री की याद आती है सुलोचना की और बहुत यादें है। फिर भी मैं कहता हुं, द्रौपदी का कोई मुकाबला ही नहीं है। द्रौपदी बहुत ही अद्वितीय है। उसमें सीता की मिठास तो है ही, उसमें क्लियोपैट्रा का नमक भी है। उसमें क्लियोपैट्रा का सौंदर्य तो है ही, उस में गार्गी का तर्क भी है। असल में पूरे महाभारत की धुरी द्रौपदी है। यह सारा युद्ध उसके आस पास हुआ है।
      लेकिन चूंकि पुरूष कथाएं लिखते हे। इसलिए कथाओं में पुरूष-पात्र बहुत उभरकर दिखाई पड़ते है। असल में दुनिया की कोई महा कथा स्‍त्री की धुरी के बिना नहीं चलती है। सब महा कथाएं स्‍त्री की धुरी पर घटित होती है। वह बड़ी रामायण सीती की धुरी पर घटित हुई है। राम और रावण तो ट्राएंगल के दो छोर है, धुरी तो सीता है।
      ये कौरव और पांडव और यह सारा महाभारत और यह सारा युद्ध द्रौपदी की धुरी पर घटा हे। उस युग की और सारे युगों की सुंदर तम स्‍त्री है वह। नहीं आश्‍चर्य नहीं है कि दुर्योधन ने भी उसे चाहा हो। असल में उस युग में कौन पुरूष होगा जिसने उसे न चाहा हो। उसका अस्‍तित्‍व, उसके प्रति चाह पैदा करने वाला था। दुर्योधन ने भी उसे चाहा हे और वह चली गई अर्जुन के पास।
      और वह भी बड़े मजे की बात है कि द्रौपदी को पाँच भाइयों में बांटना पडा। कहानी बड़ी सरल हे। उतनी सरल घटना नहीं हो सकती। कहानी तो इतनी ही सरल है कि अर्जुन ने आकर बाहर से कहा कि मां देखो, हम क्‍या ले आए है। और मां ने कहा, जो भी ले आए हो वह पांचों भाई बांट लो। लेकिन इतनी सरल घटना हो नहीं सकती। क्‍योंकि जब बाद में मां को भी तो पता चला होगा। कि यह मामला वस्‍तु का नहीं, स्‍त्री का हे। यह कैसे बाटी जा सकती है। तो कौन सी कठिनाई थी कि कुंती कह देती कि भूल हुई। मुझे क्‍या पता था कि तूम पत्‍नी ले आए हो।
      लेकिन मैं जानता हूं कि जो संघर्ष दुर्योधन और अर्जुन के बीच होता, वह संघर्ष पाँच भाइयों के बीच भी हो सकता था। द्रौपदी ऐसी थी, वे पाँच भी कट-मर सकते थे उसके लिए। उसे बांट देना ही सुगमंतम राजनीति थी। वह घर भी कट सकता था। वह महायुद्ध जो पीछे कौरवों-पांडवों में हुआ, वह पांडवों-पांडवों में भी हो सकता था।
      इसलिए कहानी मेरे लिए इतनी सरल नहीं है। कहानी बहुत प्रतीकात्‍मक है और गहरी है। वह यह खबर देती है कि स्‍त्री वह ऐसा थी। कि पाँच भाई भी लड़ सकते थे। इतनी गुणी थी। साधारण नहीं थी। असाधारण थी। उसको नग्‍न करना आसान बात नहीं थी। आग से खेलना था। तो अकेला दुर्योधन नहीं है कि नग्‍न कर ले। द्रौपदी भी है।
      और ध्‍यान रहे, बहुत बातें है इसमें, जो खयाल में ले लेने जैसी है। जब तक कोई स्‍त्री स्‍वय नग्‍न न होना चाहे, तक इस जगत में कोई पुरूष किसी स्‍त्री को नग्‍न नहीं कर सकता है, नहीं कर पाता है। वस्‍त्र उतार भी ले, तो भी नग्‍न नहीं कर सकता है। नग्‍न होना बड़ी घटना है वस्‍त्र उतरने से निर्वस्‍त्र होने से नग्‍न होना बहुत भिन्न‍ घटना है। निर्वस्‍त्र करना बहुत कठिन बात नहीं है, कोई भी कर सकता है, लेकिन नग्‍न करना बहुत दूसरी बात है। नग्‍न तो कोई स्‍त्री तभी होती है, जब वह किसी के प्रति खुलती है स्‍वयं। अन्‍यथा नहीं होती; वह ढंकी ही रह जाती है। उसके वस्‍त्र छीने जा सकते है। लेकिन वस्‍त्र छीनना स्‍त्री को नग्‍न करना नहीं है।
      और बात यह भी है कि द्रौपदी जैसी स्‍त्री को नहीं पा सकता दुयोर्धन। उसके व्‍यंग्‍य तीखे पड़  गए उसके मन पर। बड़ा हारा हुआ है। हारे हुए व्‍यक्‍ति–जैसे कि क्रोध में आए हुई बिल्लियों खंभे नोचने लगती है। वैसा करने लगते है। और स्‍त्री के सामने जब भी पुरूष हारता है—और इससे बड़ी हार पुरूष को कभी नहीं होती। पुरूष से लड़ ले, हार जीत होती है। लेकिन पुरूष जब स्‍त्री से हारता है। किसी भी क्षण में तो इससे बड़ी हार नहीं होती है।      
      तो दुर्योधन उस दिन उसे नग्‍न करने का जितना आयोजन करके बैठा है, वह सारा आयोजन भी हारे हुए पुरूष मन का है। और उस तरफ जो स्‍त्री खड़ी है हंसने वाली,वह कोई साधारण स्‍त्री नहीं है। उसका भी अपना संकल्‍प है अपना विल है। उसकी भी अपनी सामर्थ्‍य है; उसकी भी अपनी श्रद्धा है; उसका भी अपना होना है। उसकी उस श्रद्धा में वह जो कथा है,वह कथा तो काव्‍य है कि कृष्‍ण उसकी साड़ी को बढ़ाए चले जाते है। लेकिन मतलब सिर्फ इतना है कि जिसके पास अपना संकल्‍प है, उसे परमात्‍मा का सारा संकल्‍प तत्‍काल उपलब्‍ध हाँ जाता है। तो अगर परमात्‍मा के हाथ उसे मिल जाते हे, तो कोई आश्‍चर्य नहीं।
      तो मैंने कहा,और मैं फिर कहता हूं, द्रौपदी नग्‍न की गई, लेकिन हुई नहीं। नग्‍न करना बहुत आसान है, उसका हो जाना बहुत और बात है। बीच में अज्ञात विधि आ गई, बीच में अज्ञात कारण आ गए। दुर्योधन ने जो चाहा, वह हुआ नहीं। कर्म का अधिकार था, फल का अधिकार नहीं था।
      यह द्रौपदी बहुत अनूठी है। यह पूरा युद्ध हो गया। भीष्‍म पड़े है शय्या पर—बाणों की शय्या पर—और कृष्‍ण कहते है पांडवों को कि पूछ लो धर्म का राज, और वह द्रौपदी हंसती है। उसकी हंसी पूरे महाभारत पर छाई हे। वह हंसती है कि इनसे पूछते है धर्म का रहस्‍य, जब में नग्‍न की जा रही थी, तब ये सिर झुकाए बैठे थे। उसका व्‍यंग गहरा है। वह स्‍त्री बहुत असाधारण हे।
      काश, हिंदुस्‍तान की स्‍त्रियों ने सीता को आदर्श न बना कर द्रौपदी को आदर्श बनाया होता तो हिंदुस्‍तान की स्‍त्री की शान और होती।
      लेकिन नही, द्रौपदी खो गई है। उसका कोई पता नहीं है। खो गई। एक तो पाँच पति यों की पत्‍नी है। इसलिए मन को पीड़ा होती है।  लेकिन एक पति की पत्‍नी होना भी कितना मुश्‍किल है, उसका पता नहीं है। और जो पाँच पति यों को निभा सकती हे, वह साधारण स्‍त्री नहीं है। असाधारण है, सुपर ह्मन हे। सीता भी अतिमानवीय है लेकिन टू ह्मन के अर्थों में। और द्रौपदी भी अतिमानवीय है, लेकिन सुपर ह्यूमन  के अर्थों में।
      पूरे भारत के इतिहास में द्रौपदी को सिर्फ एक आदमी न ही प्रशंसा दी है। और एक ऐसे आदमी ने जो बिलकुल अनपेक्षित है। पूरे भारत के इतिहास में डाक्‍टर राम मनोहर लोहिया को छोड़कर किसी आदमी ने द्रौपदी को सम्‍मान नहीं दिया है। हैरानी की बात है मेरा तो लोहिया से प्रेम इस बात से हो गया कि पाँच हजार साल के इतिहास में एक आदमी, जो द्रौपदी को सीता के ऊपर रखने को तैयार है।


ओशो--गीता—दर्शन  भाग-1, अध्‍याय-1(प्रवचन-14)