Nov 29, 2015

=> डीएसओ ने बनाया आरटीआई का मजाक

जन सूचना अधिकार की उड़ रही धज्जियां
  •  संयुक्त खाद्य आयुक्त ने डीएसओ को किया तलब
  •  बिना एनओसी के ही बना दिया राशनकार्ड

संवाददाता                                                                                                                    
मेरठ। कुछ विभागों के अधिकारियों ने आरटीआई (जनसूचना अधिकार अधिनियम) को मजाक बना लिया है। मांगी गई सूचना उपलव्ध कराने के बजाए विभाग में घुमाते रहना उनका शगल बन गया है। मेरठ के जिला पूर्ति अधिकारी से एक आरटीआई कार्यकर्त्ता द्वारा कुछ जरूरी सूचनाएं मांगी गईं। सूचना तो मिली नहीं लेकिन आरटीआई कार्यकर्त्ता का पत्र विभाग में ही घूमता रहा। सूचना पत्रक अंततः संयुक्त खाद्य आयुक्त के पास पहुंचा तो उन्होंने अब डीएसओ को अपने कार्यालय में तलब कर लिया है। 
RTI Act 2005
         आरटीआई कार्यकर्त्ता तथा पत्रकार त्रिनाथ मिश्र ने 28 अगस्त 2015 को जनसूचना अधिकार के तहत डीएसओ को एक पत्र भेजा जिसमें उनके विभाग से संबंधित कुछ सूचनाएं मांगी गईं। उन्होंने पत्र के तहत मांगी गई सूचनाएं उपलव्ध कराने के बजाए शिथिलता बरती। इसके बाद संयुक्त खाद्य आयुक्त के पास अपील की गई। दरअसल, डीएसओ कार्यालय ने शास्त्रीनगर सेक्टर चार के मकान संख्या 203 और 204 पर रामपूजन को राशन कार्ड जारी कर दिया जबकि मकान किसी और का है। सूचना मांगी गई कि क्या विभाग ने पूरी तरह जांच पडताल के बाद राशन कार्ड बनाया है, यदि हां, तो राशन कार्ड धारक से मकान स्वामी सिद्ध करने का प्रमाण पत्र की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराएं, क्या किसी के मकान पर कोई भी राशन कार्ड बनवा सकता है, क्या इसके लिए मकान स्वामी के अनापत्ति प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं पडती, ऐसे में यदि राशन कार्ड धारक किसी आपराधिक कार्य में संलिप्त पाया जाए तो संपत्ति स्वामी की जिम्मेदारी होगी या पूर्ति विभाग की। यदि ऐसा है तो राशन कार्ड धारक के खिलाफ किस नियम के तहत कार्रवाई की जाएगी। 
         बने राशन कार्ड के बारे में आरटीआई के तहत सूचना मांगे जाने का पत्र मिलने पर भी डीएसओ कार्यालय ने प्रकरण को गंभीरता से नहीं लिया। अमूमन होता यह है कि कार्यालय में ही बैठकर विभाग के निरीक्षक खानापूर्ति कर लेते हैं और राशन कार्ड बना देते हैं लेकिन जब कोई मामला फंसता है तो जवाब देते नहीं बनता। संयुक्त खाद्य आयुक्त ने 27 नवंबर को डीएसओ को आवेदक द्वारा मांगी गई सूचना सहित तलब किया है। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि विभाग के पास क्या सूचना है।

 जिला पूर्ति अधिकारी हुये तलब

  • आरटीआई का जवाब न देने पर संयुक्त खाद्य-आयुक्त ने किया तलब
  • 2 दिसम्बर तक का दिया समय

मेरठ। जन सूचना अधिकार का मखौल उड़ाने एवं अधिनियम के अन्तर्गत मांगी गई सूचना समय से न देने पर जिला पूर्ति अधिकारी डीएन श्रीवास्तव को संयुक्त आयुक्त खाद्य ने तलब कर लिया। उनकी तरफ से एआरओ को दो दिसम्बर तक का समय देकर सम्पूर्ण सूचना देने का आदेश दिया गया है। संयुक्त आयुक्त-खाद्य ने सख्त लहजे में कहा कि किसी भी प्रकार की अनदेखी कतई बर्दास्त नहीं की जायेगी और अगर जिला पूर्ति विभाग की अनदेखी से आरटीआई की अवहेलना हुई तो नियमानुसार फाइन भी आवेदक को दिलाया जायेगा।

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=> स्मार्ट बनें अधिकारीः आयुक्त

  • स्मार्ट सिटी फैक्टर
  •  आधुनिक तकनीक एवं सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग करें अधिकारी

संवाददाता                                                                                                   
मेरठ/गाजियाबाद। गाजियाबाद को स्मार्ट सिटी में परिवर्तित करने के लिये आयुक्त सभागार में मंडलायुक्त आलोक सिन्हा की अध्यक्षता में बैठक आयोजित की गयी। आयुक्त आलोक सिन्हा ने अधिकारियों से कहा कि वह स्वंय स्मार्ट बने, स्मार्ट विचार रखें और प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के लिये व्यापक दृष्टिकोण सदैव रखें और सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग करें। 
स्मार्ट सिटी पर अधिकारियों को
दिशा-निर्देश देते मंडलायुक्त।
         बैठक में आयुक्त आलोक सिन्हा ने निर्देशित किया कि गाजियाबाद व मेरठ को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये मार्किंग पैरामीटर ठीक होना चाहिए तथा विजन एवं लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने बताया कि सिटी प्रोफाइल के अन्तर्गत लिविंग ऑफ पब्लिक इन्फ्रास्ट्रख्र स्पष्ट होना चाहिए। आयुक्त ने निर्देशित किया कि सम्बंधित जनपदों में वेन्डिग जोन भी बनाया जाये। आयुक्त ने कहा कि ट्रांसपोर्ट विद्युत, सफाई व्यवस्था, ठोस अपस्षि्ट प्रबधन आदि विषयों को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट सबमिट की जाये। 
         बैठक में नगर आयुक्त गाजियाबाद अब्दुल समद ने बताया कि स्मार्ट सिटी बनाने के लिये रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तिथि 15 दिसम्बर निर्धारित कर दी गयी तथा डाटा अपलोड कर दिया गया है जिस पर लोगो की प्रतिक्रिया आ रही है। उन्होनें बताया कि गाजियाबाद बहुत ही विकासशील शहर है  और उसके स्मार्ट सिटी बनने की सम्भांवना अधिक है। उन्होंने बताया कि एनसीआर डिपार्टमेंट बोर्ड गाजियाबाद के औद्योगिक क्षेत्र को अलग से विकसित किया जा रहा तथा हम शहर का सर्वांगीण विकास करेंगे। 
         इस अवसर पर अपर आयुक्त गया प्रसाद, मुख्य नगर नियोजक ए0के0 बोस, मेरठ विकास प्राधिकरण के सचिव कुमार विनीत, अधीक्षण अभियन्ता सहित अन्य अधिकारीगण उपस्थित रहे।

=> हाईस्कूल और इंटरमीडएट की परीक्षा तिथि घोषित



  •  18 फरवरी से शुरू होंगी परीक्षा

संवाददाता
लखनऊ। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) की हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट की परीक्षाएं 18 फरवरी से शुरू होंगी। यूपी बोर्ड सचिव शैल यादव ने बताया कि परीक्षाएं लगभग डेढ़ महीने तक चलेंगी।
18 फरवरी से शुरू होने पर हाईस्कूल के सीमित विषयों की परीक्षाएं लगभग 10 दिन में पूरी हो जाएंगी। इस बार होली मार्च के अंतिम पखवाड़े 23-24 मार्च को पड़ेगी। इससे परीक्षार्थियों को छुट्टी के दौरान परेशान नहीं होना पड़ेगा। परीक्षा इससे पहले पूरी कर ली जाएगी। इंटरमीडिएट में गिनती के विषयों की परीक्षा ही होली बाद करानी पड़ सकती है। 2015 में बोर्ड परीक्षा 19 फरवरी से शुरू हुई थी। डिबार विद्यालयों को परीक्षा केंद्र बनाने पर रोक के बाद भी अधिकारी मनमाने तरीके से ब्लैक लिस्टेड विद्यालयों को केन्द्र बनाने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे में बिना नकल के परीक्षा कराने का संकल्प पूरा होने में संदेह बना है।

=> जिला पूर्ति अधिकारी हुये तलब


  • आरटीआई का जवाब न देने पर संयुक्त खाद्य-आयुक्त ने किया तलब
  • 2 दिसम्बर तक का दिया समय

मेरठ। जन सूचना अधिकार का मखौल उड़ाने एवं अधिनियम के अन्तर्गत मांगी गई सूचना समय से न देने पर जिला पूर्ति अधिकारी डीएन श्रीवास्तव को संयुक्त आयुक्त खाद्य ने तलब कर लिया। उनकी तरफ से एआरओ को दो दिसम्बर तक का समय देकर सम्पूर्ण सूचना देने का आदेश दिया गया है। संयुक्त आयुक्त-खाद्य ने सख्त लहजे में कहा कि किसी भी प्रकार की अनदेखी कतई बर्दास्त नहीं की जायेगी और अगर जिला पूर्ति विभाग की अनदेखी से आरटीआई की अवहेलना हुई तो नियमानुसार फाइन भी आवेदक को दिलाया जायेगा।
वेबसाइट बंदः मोबाइल द्वारा राशन कार्ड के लिये रजिस्ट्रेशन करने वाली वेबसाइट भी आजकल बंद चल रही है। इसके बंद रहने का समय २४ नवंबर को दोपहर १२ बजे तक ही था।

=> नए सियासी समीकरणों की आहट

बिहार में महागठबंधन सरकार के सत्तारूढ़ होते ही सामाजिक राजनीति की एक नई आधारशिला भी रख दी गई। इसका कारण महागठबंधन सरकार में नीतीश कुमार की जदयू और लालू यादव की राजद के साथ कांग्रेस का साझेदार होना है। यह साझेदारी सामाजिक समीकरणों की एक नई तस्वीर पेश कर रही है। नीतीश ने इसके पहले भी साझा सरकार चलाई, लेकिन ये सरकार पिछली साझा सरकारों से कई मायनों में भिन्न् है। एक समय नीतीश और लालू अलग सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ अलग सोच और भिन्न् तौर-तरीकों वाली राजनीति का नेतृत्व करते थे। 
         दोनों के मिलन ने बिहार के राजनीतिक व सामाजिक परिदृश्य को बदलने का काम किया। नीतीश 17 साल तक भाजपा के सहयोगी रहे। उन्होंने लगभग नौ वर्षों तक उसके साथ गठबंधन सरकार भी चलाई। वह 2005 में भाजपा के सहयोग से ही लालू की बिहार में मजबूत राजनीतिक पकड़ को खत्म करने में सफल रहे थे। तब उन्होंने राजद के कुशासन को मुख्य मुद्दा बनाया। लालू के 15 साल के शासन में बिहार विकास की दौड़ में पिछड़ता जा रहा था। नीतीश ने लोगों को भरोसा दिलाया कि वह बिहार की तकदीर बदल देंगे। उनकी बातों पर बिहार की जनता ने इस हद तक भरोसा किया कि दो बार भाजपा-जदयू गठबंधन को सत्ता सौंपी। नीतीश ने 2013 के अंत में जब नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर भाजपा से नाता तोड़ा था तो शायद उन्होंने भी यह नहीं सोचा होगा कि अपनी राजनीतिक नैया पार लगाने के लिए उन्हें अपने चिर-प्रतिद्वंद्वी लालू का सहारा लेना होगा, लेकिन बिहार के जनादेश ने यह साबित कर दिया कि नीतीश के फैसले को जनता ने स्वीकार कर लिया। बिहार के इन चुनावों पर नीतीश की तरह लालू का भी राजनीतिक अस्तित्व दांव पर था। लगातार चुनाव हारकर राजनीतिक रूप से हाशिए पर पहुंच गए लालू के लिए कुशासन और जंगलराज की अपनी छवि से अकेले दम पर उबर पाना लगभग असंभव था। 
         अगर राजद जदयू और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव में न उतरता तो संभवत: लालू को एक और करारी हार का सामना करना पड़ता। बिहार में जो महागठबंधन बना, उसके पीछे तीनों घटक दलों जदयू, राजद व कांग्रेस की अपनी-अपनी सियासी मजबूरी थी, लेकिन इसकी कल्पना शायद इन दलों को भी नहीं रही होगी कि उनका यह प्रयोग इतना सफल रहेगा। नीतीश की महागठबंधन सरकार में उम्मीद के मुताबिक लालू प्रसाद के दोनों बेटों को कोई राजनीतिक अनुभव न होने के बावजूद प्रमुख मंत्रालय मिले हैं। दोनों को तीन-तीन मंत्रालय मिले हैं। छोटे बेटे को तीन मंत्रालयों के साथ उपमुख्यमंत्री पद भी मिला है। इससे यह साबित हो जाता है कि नई सरकार में राजद, विशेषकर लालू के परिवार का खासा प्रभाव है। नीतीश के मंत्रिमंडल पर निगाह डालने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि मंत्रियों के चयन में लालू प्रभावी रहे, क्योंकि वित्त मंत्रालय भी राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी को मिला है। साझा सरकारों में शामिल दलों को समझौते करने ही पड़ते हैं। यह साफ है कि नीतीश को भी समझौते करने पड़े हैं। इस सबके बावजूद उनकी सरकार व्यापक सामाजिक जनाधार से लैस दिखती है। महागठबंधन सरकार अलग-अलग सामाजिक घटकों के मिलन का परिचायक है। महागठबंधन सरकार का नेतृत्व संभालने के पहले तक नीतीश की राजनीति यादवों के वर्चस्व वाली राजद की सामाजिक न्याय और नजरिए वाली राजनीति से अलग किस्म की रही। उन्होंने पिछड़ी जातियों के साथ-साथ अति पिछड़ी जातियों को भी अपनी राजनीति के केंद्र में रखा और उस जनाधार का भी नेतृत्व किया जिसका प्रतिनिधित्व भाजपा विकास के नारे के साथ करती थी। 
         
विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से विकास के अपने मूल मुद्दे से हटकर जो राजनीति की गई, उससे महागठबंधन को स्वत: ही समाज के ज्यादा बड़े वर्ग का साथ मिल गया। अलग-अलग और यहां तक कि एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी तबके भी एक साथ इसलिए आ मिले, क्योंकि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की जो जरूरत जताई उसे लालू-नीतीश अच्छे से भुनाने अर्थात अपने-अपने लोगों को यह संदेश देने में सफल रहे कि आरक्षण बचाने के लिए एकजुट होने की जरूरत है। नतीजा यह हुआ कि राजद के यादव मतदाताओं के साथ पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, महादलित व मुस्लिम मतदाता मिल गए और महागठबंधन को निर्णायक जनादेश प्राप्त हुआ। अब महागठबंधन सरकार के लिए राजनीतिक और साथ ही सामाजिक रूप से अलग-अलग खेमों में रहे इन जातीय समूहों को एकजुट बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं, क्योंकि जो अलग-अलग समूह एक साथ आ मिले, उनमें कई पारंपरिक तौर पर एक-दूसरे के विरोधी भी रहे हैं।

=> ‘ऊंची पढ़ाई और अंधी कमाई’ की औकात


  • A Talk with Jain Sadwi         

महापर्व पर बहस छिड़ गई कि मांस विक्री की पाबंदी नहीं होनी चाहिये। टीवी चैनलों पर राष्ट्रीय चैनलों में लगातार खबरें चलने कि, ‘रोजी-राटी का सवाल है’ और ‘कोर्ट का फैसला बाध्य नहीं’ एवं ‘जैन समाज को अलग से बढ़ावा नहीं देना चाहिये’ आदि आदि नाना प्रकार के तर्क दिये गये। एनसीपी ने महाराष्ट्र में तो छोटे-छोटे बेजुबान जीवों को लेकर क्रूरमापूर्व प्रदर्शन भी किया। क्या ये सब महज वोटों के लिये है? क्या अब राष्ट्रीयता का कोई महत्त्व नहीं है?

         राष्ट्र का निर्माण किस बात पर निर्भर करता है? धर्म, संस्कृति और यहां के रहने वालों लोगों से। भारत के धर्म एवं संस्कृत, सभ्यता में यह बात शामिल है कि मांस बेचकर रोजी-रोटी कमाया जाये। इस प्रकार देखा जाये तो चोरी को जुल्म नहीं कह सकते क्योंकि वह हिंसा से छोटा पाप है। और यह भी सत्य है कि वह चोरों की रोजी-रोटी है। जितने तरह के हिंसात्मक कार्य हैं चाहे वह नक्सलवाद हो, आतंकवाद हो सभी कार्यों में लोग रोजी-रोटी से जुटे हैं तो क्या उन्हें ऐसा करने की संवैधानिक छूट दी जानी चाहिये?

         महानुभाव जब किसी का कत्ल कर दिया जाये तो वह कभी दुआ नहीं देता, वह कभी खुश नहीं होता, उसकी आत्मा छटपटायेगी, आह निकलेगी। यदि निर्बलों को दबाकर, मारकर खाओगे तो उनके आत्मा से निकलने वाली आह से तुम आहत होगे।
         ‘हाय लीजिये दुःखिया की, तो फाट कलेजा जाये’ अपनी करनी भुगतनी पड़ेगी। निबंलों को मत सताओ। बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, डेंगू आदि सब इसी का उदाहरण है। जब भी हिंसा का शंखनाद होगा तो धरती कांप उठेगी, प्रलय की सुनामी आयेगी। वोटों की राजनीति ने बनारस में मूर्ति विसर्जन करने को आमादा साधु-संतो पर लाठी चार्ज करवा दिया। कत्लखानों एवं फैक्टि्रयों का मैला और गंदगी गंगा में लगातार प्रवाहित हो रही है इस ओर किसी ने तनिक भी ध्यान नहीं दिया।
         सोचना आपको है ‘ऊंची पढ़ाई और अंधी कमाई’ से क्या राष्ट्र का विकास होगा? धर्म-संस्कार विहीन पढ़ाई और छल-कपट की कमाई से समाज में विषैली गंध जन्म लेगी जिसकी बदबू से पूरे समाज के जीवों कों दो-चार होना पड़ेगा। मेरा मानना है कि दया-करूणा और उपकारों के धार्मिक संस्कार अवश्य पढ़ना होगा तभी राष्ट्र का स्वस्थ्य विकास होगा। राष्ट्र का विकास होगा अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह और शील से। ‘झूठ और कत्ल पर आधारित रोजी रोटी’ और राजनीतिक रोटी खाकर कभी भी राष्ट्र का विकास नहीं होगा।
         अदालतों के फैसलों का विरोध करना हम सभी के हित की बात नहीं है फिर भी एक बात जरूर कौंधती है कि क्या आज के अधिवक्तागण इतने धर्मज्ञ हैं कि वे अदालत के सम्मुख किसी भी धर्म का पक्ष मजबूती से रख सकें। क्या उन्हें भगवान राम, महावीर व ऋषि-मुनियों का मर्म मालूम है जो वे इतनी कुशलता से जज के सम्मुख पक्ष रखने में कामयाब होते हैं? या फिर अदालत में बैठे न्यायाधीश महोदय धर्म के सिद्धातों के पीछे का सत्य समझकर निर्णय दे पाने में सक्षम होंगे?
         सीधी सी बात है कि, ‘एक साधू भूखा-प्यासा रहकर, सर्दी गर्मी का एहसास कर के भी खुश रहता है जबकि एक चोर सब सुखों को भोगकर भी डरा सहमा सा रहता है।’ आखिर क्यों? हत्या किसी भी जीव की हो हत्या तो हत्या है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि ‘गुड आतंकवाद- बैड आतंकवाद’ इसका क्या मतलब है आतंकी तो आतंकी हैं बस, निजका काम है मानवों की हत्या करना, देश को तबाह करना है। इसमें गुड और बैड की बात कहां है? शिव-सेना रूपी संगठन का कहना है कि जैन समाज को इतना बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है? जब तक जैन समाज है, दिगम्बरत्व और दिगम्बर है तक तक ही मानवता है। जब तक इस धरा पर संघ सहित यथाजात रूप (जैसे जन्में उसी रूप)  में साधु विचरण करते रहेंगे तब तक प्रेम, अहिंसा, मानवता, करूणा, दया, का अलाव जलता रहेगा अन्यथा ‘हिंसा-तांडव’ देखने को तैयार रहें। अपनी विरासत को नष्ट करने के लिये मानव-मानव का खून पियेगा। कहीं आज के सिंहों के सिंहासन पर गीदड़ तो विराजमान नहीं हो गये हैं। अमर तो कोई नहीं है मगर हम अपने कर्मों से पूरे देश ही नहीं अपितु पूरे विश्व को एक स्वस्थ्य और सुलभ मार्ग दिखा सकते हैं जिसके बल पर मानवा का कल्याण हो सकेगा?