Dec 12, 2011

=> खूबसूरती क्या है

कल मैने खुदा से पूछा कि खूबसूरती क्या है?
तो वो बोले

खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है

खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए

खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए

खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे

खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो

खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ

खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ

खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ

खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए

खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ

खूबसूरत है वो सोच जिस मे पूरी दुनिया की भलाई का ख्याल हो ! 

Nov 28, 2011

=> ये इल्लू-इल्लू क्या है

एक बार गया था मीटिंग में सब कहने लगे के मिश्रा जी
ये इल्लू-इल्लू क्या है समझाओ जरा गहराई से
                                                                         मैंने कहा फिर सुनो ध्यान से-
                    जब छोरा - छोरी को देखता है
                    दिल उसका 'धक्' से बोलता है
                    साँसे आंये जब "HOT-HOT"
                    आँखों से लगे दो-चार shot
                    नैना-fight के चक्कर में
                    जब मजनू घुमे घाट-घाट
तब इल्लू-इल्लू होता है - तब इल्लू-इल्लू होता है !

Nov 26, 2011

=> दिल-will -प्यार-war बड़ा है कमाल का !

         सच कहा है किसी शायर ने के दिल-will -प्यार-war  बड़ा है कमाल का ! जी हाँ दोस्तों, हमें अपने जीवन की नौका को किनारे लगाने के लिए ये चार चीजें मायने रखती हैं -
                     1- दिल, यानी आपका अपना भगवान क्योंकि भगवान का वास दिल में होता है जो धड़कता है तो साँसे चलती हैं और रुक जाता है तो सब कुछ बंद ! 
                    2- दूसरा है WILL  यानि चाह , कुछ करने की इच्छा ! अगर आप इज्जत पाना चाहते हैं, सोहरत पाना चाहते हैं तो विल-पॉवर की बहुत ही जरुरत पड़ेगी, दुनिया की महान हस्तियाँ विल-पॉवर की वजह से ही आज बुलंदियां छू रही हैं ! 
                    3- तीसरी बात आती है प्यार की; प्यार वो शब्द है जिसके आगे नफरत की आग ठंढी पर जाती है, और यदि आपको अपने लक्ष्य से प्यार हो जाए तो समझो सफलता की आधी इबादत लिख दिया है आपने ! प्यार बड़ा ही करामाती लब्ज है क्योंकि जहां यह रहता है वहाँ उन्नत, सफलता, दूसरों का सहयोग खुद-बा-खुद मिल जाता है !
                    4- और आखरी बात है वार(war) की यानी लड़ाई की ! मेरा मतलब यह नहीं की आप लड़ाई और झगडा करें बल्कि कहने का मतलब यह है की जब सारी युक्तियाँ काम करना बंद कर दें तो लड़ाई काम आती है जैसे किया था सरदार भगत सिंह ने, जैसे किया था रामचंद्र ने, जैसे किया था पांडवों ने ! अब आप समझ गए होंगे की मई किस लड़ाई की बात कर रहा हूँ ! कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल और केवल मार-काट की भाषा समझते हैं क्योंकि वो अपनी विचारधारा के संकुचित होते हुए भी अपने आप को विशाल मानते हैं तभी तो दो लफ्जों का प्यार समझ में न आकर चार शब्द का नफरत आसानी से समझाते हैं !

Nov 24, 2011

=> हिंदी की महत्ता को जानें


हिंदी भाषा को जानने व समझने वालों की कमी व इसको सम्मान देने वालों की कमी देख कर चिंतित हैं त्रिनाथ मिश्र

                        हम हिंद देश के वाशी हैं और हिन्दुस्तान हमारी पहचान है, हिंदी भाषा हमारी राष्ट्रभाषा है और राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है ! हिंदी देश की एकता-अखंडता की कड़ी है और राष्ट्र अभिब्यक्ति का सरलतम स्त्रोत है इसी कारण देश के बड़े भू-भाग पर हिंदी बोली जाती है! जब तक हम हिंदी को नहीं जानेंगे तब तक हमें भारतीय होने पर सन्देश हैं! इसका मतलब की जीवित रहने हेतु रोटी, कपड़ा और मकान के बाद चौथी प्राथमिकता 'हिंदी' की होनी चाहिए इसी में हमारा सम्मान व् उन्नति निहित है! हिंदी खड़ी बोली के प्रणेता तथा प्रसिद्ध लेखक व कवी भारतेंदु हरिशचंद द्वारा हिंदी के परिपेक्ष्य में कही गयी निम्न पंक्तियाँ हमें अक्षरशः याद रहनी चाहिए-
    "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
     बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल"
                         भारत में भाषाओं की बहुलता हैं और सभी भाषाओँ का अपना महत्व है, लेकिन जनसंपर्क उसी भाषा में संभव है जो ज्यादा से ज्यादा लोंगो में प्रचलित हो और जब बात हो भारत जैसे विकाशशील देश की तो लोंगो को समेकित करने, वार्तालाप को सुगम बनाने तथा विकाश को गति देने के लिए अति-प्रचलित भाषा का प्रयोग किया जाना नितांत आवश्यक है और निसंदेह रूप से हिंदी ही वह भाषा है जो सभी कार्यों में सहजता प्रदान करती है!
                      आज-कल मीडिया में गाड़ियों के नंबर हिंदी में लिखे होने को लेकर हलचल है.....! यह हर्ष का विषय होते हुए भी "हिंदी-मीडिया" इसे उछाल रही है, हमें इस बात को तवज्जो देनी चाहिए की कम से कम कोई तो शुरुआत कर रहा है,  हिंदी की गंभीरता को कोई तो समझ रहा है!
                       इसके अलांवा घर पर अक्सर देखा जाता है की महिलायें अपने बच्चों से हिंदी में बात नहीं करतीं और बच्चों को अंग्रेजी की तामील देने में लगी हुई हैं........इसी चक्कर में फँश कर बच्चा न तो हिन्दुस्तानी बन पाता है और न ही अंग्रेज अपितु उसकी शैली ही बदल जाती है जो आज-कल 'हिंग्लिश' के रूप में प्रचलित है! ऐसे लोंगो ने हिंदी का सत्यानाश क्र दिया है, हमें सुधारना होगा वर्ना एक दिन हम अपने देश में ही बेगाने हो जायेंगे! हिंदी प्रणेता हरिशचंद ने कहा है की-
           "अंग्रेजी पढिके जदपि, सब गुण रहत प्रवीण
            पै निज-भाषा ज्ञान बिनु, रहत हीन के हीन"

 प्रिय देशवाशियों ! हिंदी की महत्ता को समझो, इसकी जरुरत को समझो,
कब तक उधार की बोली बोलोगे..........?
कब तक दूसरों के सहारे डोलोगे.........?
अपनी विरासत संभाली नही जाती,,,,,,,,,,,,,और हम हैं की दूसरों की सहेजने में लगे हैं........



Nov 22, 2011

=> पोर्नोग्राफ़िक संस्था के ख़िलाफ़ मुकदमा

दो बड़ी पोर्नोग्राफ़िक कंपनियों ने इंटरनेट वेबसाइटों के पतों को मंज़ूरी देने वाली संस्था आईकैन के ख़िलाफ़ मुकदमा दायर किया है क्योंकि आईकैन ने .xxx डोमेन वाली वेबसाइटो को मंज़ूरी दी है. पॉर्नोग्राफ़ी दिखाने वाली वेबसाइटों के लिए अलग इंटरनेट डोमेन .xxx को इस साल मार्च में स्वीकृति दी गई थी.
लेकिन प्लेबॉय साइटों की प्रबंधन कंपनी मैनविन लाइसेनसिंग और डिजिटल प्लेग्राउंड का कहना है कि .xxx को मंज़ूरी देना ग़लत है. आईकैन ने कहा है कि वो इस मामले पर पुर्नविचार कर रही है.
ग़ैर सरकारी संस्था आईकैन ने पहले .xxx डोमेन नाम दिए जाने पर ऐतराज़ किया था. आईसीएम कंपनी ने 2000 में इसके लिए आवेदन किया था. उस समय आईकैन का कहना था कि इंटरनेट पर व्यस्कों के लिए सामग्री पहले सी ही उपलब्ध है और अलग से .xxx डोमेन की ज़रूरत नहीं है.
लेकिन आईसीएम बार-बार इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करती रही. फिर एक स्वतंत्र पैनल ने मामले पर विचार किया और आईसीएम का समर्थन किया. फिर इस साल मार्च में तीन के मुकाबले नौ वोटों से .xxx डोमेन नाम देने के पक्ष में मतदान हुआ. आईसीएम ने कहा है कि वो 2012 में इस नाम को लॉन्च करेगी.
लेकिन प्लेबॉय वेबसाइटें चलाने वाली कंपनी मैनविन ने कहा है कि आईसीएम हर पते के लिए सालाना 60 पाउंड फ़ीस माँग रही है जो बाकी डोमेन नाम के लिए तय फ़ीस से दस गुना ज़्यादा है.
मैनविन का ये भी कहना है कि .xxx डोमेन नाम जारी करने से पहले संस्था ने कोई बोली नहीं लगवाई और न ही .xxx शुरु करने के फ़ैसले से पहले कोई आर्थिक अध्ययन करवाया. ये भी आरोप लगाया गया है कि अपनी अर्ज़ी के पक्ष में आईसीएम ने फ़र्ज़ी टिप्पणियाँ लिखवाईं.
लेकिन आईसीएम ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है !

यौन उत्पीणन



                   Aajakla BaaOitkvaad [tnaa baZ, gayaa hO ik hr pirvaar kI caah haotI hO ik vao tmaama BaaOitk sauK sauivaQaaAaoM ko saaqa jaIvana vyatIt kroM. saaqa hI Aaja kI iSaixat maihlaa Gar baOz kr caaOka caUlha kao inayait maana kr nahIM baOz patI. Aaja ko daOr maoM maihlaaeM Apnao vyai@t%va ko ivakasa ko saaqa saaqa pirvaar kao Aaiqa-k $p sao saudRZ, banaanao ko ilayao naaOkrI yaa vyavasaaya krnao lagaI hOM. eosao maoM samaaja maoM naaOkrISauda yaa svavayavasaayaI maihlaaAaoM ka p`itSat hr vaga- kI maihlaaAaoM maoM baZ,a hI hO. saaqa hI baZ,I hOM Apnao ivakasa ko ilayao puÉYa sao p`itWMinWta kI Baavanaa BaI. [sako saaqa saaqa maihlaaAaoM ko saaqa kayaa-laya yaa kaya-xao~ maoM CoD,CaD‚ yaaOna ]%pID,na yaa SaaoYaNa kI GaTnaaAaoM maoM BaI baZतरी हुई है 
                   saup`Ima kaoT- nao yaaOna ]%pID,na kao pirBaaiYat krto hue yah kha hO ik  " yaaOna AaQaairt yaa inaQaa-irt vyavahar caaho p`%yaxa hao yaa Ap`%yaxa ]%pID,na ko Antga-t Aata hO. jaOsao – 
  1. SaarIirk sampk- yaa [sako inaima




Nov 17, 2011

=> एक छोटे से मजाक से महाभारत पैदा हुआ



      एक छोटे से मजाक से महाभारत पैदा हुआ। एक छोटे से व्‍यंग से द्रौपदी के कारण जो दुर्योधन के मन में तीर की तरह चूभ गया और द्रौपदी नग्‍न की गई। नग्‍न कि गई; हुई नहीं—यह दूसरी बात है। करने वाले ने कोई कोर-कसर न छोड़ी थी। करने वालों ने सारी ताकत लगा दी थी। लेकिन फल आया नहीं, किए हुए के अनुकूल नहीं आया फल—यह दूसरी बात हे।
      असल में, जो द्रौपदी को नग्न करना चाहते थे, उन्‍होंने क्‍या रख छोड़ा था। उनकी तरफ से कोई कोर  न थी। लेकिन हम सभी कर्म करने वालों को, अज्ञात भी बीच में उतर आता है। इसका कभी कोई पता नहीं है। वह जो कृष्‍ण की कथा है, वह अज्ञात के उतरने की कथा है। अज्ञात के हाथ है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ते।
      हम ही नहीं है इस पृथ्‍वी पर। मैं अकेला नहीं हूं। मेरी अकेली आकांक्षा नहीं हे। अनंत आकांक्षा है। और अंनत की भी आंकाक्षा है। और उन सब के गणित पर अंतत: तय होता है कि क्‍या हुआ। अकेला दुर्योधन ही नहीं है नग्‍न करने में, द्रौपदी भी तो है जो नग्‍न की जा रही है। द्रौपदी की भी तो चेतना है, द्रौपदी का भी तो अस्‍तित्‍व है। और अन्‍याय होगा यह कि द्रौपदी वस्‍तु की तरह प्रयोग की जाए। उसके पास भी चेतना है और व्‍यक्‍ति है; उसके पास भी संकल्‍प है। साधारण स्‍त्री नहीं है द्रौपदी।
      सच तो यह है कि द्रौपदी के मुकाबले की स्‍त्री पूरे विश्‍व के इतिहास में दूसरी नहीं है। कठिन लगेगी बात। क्‍योंकि याद आती है सीता की, याद आती सावित्री की याद आती है सुलोचना की और बहुत यादें है। फिर भी मैं कहता हुं, द्रौपदी का कोई मुकाबला ही नहीं है। द्रौपदी बहुत ही अद्वितीय है। उसमें सीता की मिठास तो है ही, उसमें क्लियोपैट्रा का नमक भी है। उसमें क्लियोपैट्रा का सौंदर्य तो है ही, उस में गार्गी का तर्क भी है। असल में पूरे महाभारत की धुरी द्रौपदी है। यह सारा युद्ध उसके आस पास हुआ है।
      लेकिन चूंकि पुरूष कथाएं लिखते हे। इसलिए कथाओं में पुरूष-पात्र बहुत उभरकर दिखाई पड़ते है। असल में दुनिया की कोई महा कथा स्‍त्री की धुरी के बिना नहीं चलती है। सब महा कथाएं स्‍त्री की धुरी पर घटित होती है। वह बड़ी रामायण सीती की धुरी पर घटित हुई है। राम और रावण तो ट्राएंगल के दो छोर है, धुरी तो सीता है।
      ये कौरव और पांडव और यह सारा महाभारत और यह सारा युद्ध द्रौपदी की धुरी पर घटा हे। उस युग की और सारे युगों की सुंदर तम स्‍त्री है वह। नहीं आश्‍चर्य नहीं है कि दुर्योधन ने भी उसे चाहा हो। असल में उस युग में कौन पुरूष होगा जिसने उसे न चाहा हो। उसका अस्‍तित्‍व, उसके प्रति चाह पैदा करने वाला था। दुर्योधन ने भी उसे चाहा हे और वह चली गई अर्जुन के पास।
      और वह भी बड़े मजे की बात है कि द्रौपदी को पाँच भाइयों में बांटना पडा। कहानी बड़ी सरल हे। उतनी सरल घटना नहीं हो सकती। कहानी तो इतनी ही सरल है कि अर्जुन ने आकर बाहर से कहा कि मां देखो, हम क्‍या ले आए है। और मां ने कहा, जो भी ले आए हो वह पांचों भाई बांट लो। लेकिन इतनी सरल घटना हो नहीं सकती। क्‍योंकि जब बाद में मां को भी तो पता चला होगा। कि यह मामला वस्‍तु का नहीं, स्‍त्री का हे। यह कैसे बाटी जा सकती है। तो कौन सी कठिनाई थी कि कुंती कह देती कि भूल हुई। मुझे क्‍या पता था कि तूम पत्‍नी ले आए हो।
      लेकिन मैं जानता हूं कि जो संघर्ष दुर्योधन और अर्जुन के बीच होता, वह संघर्ष पाँच भाइयों के बीच भी हो सकता था। द्रौपदी ऐसी थी, वे पाँच भी कट-मर सकते थे उसके लिए। उसे बांट देना ही सुगमंतम राजनीति थी। वह घर भी कट सकता था। वह महायुद्ध जो पीछे कौरवों-पांडवों में हुआ, वह पांडवों-पांडवों में भी हो सकता था।
      इसलिए कहानी मेरे लिए इतनी सरल नहीं है। कहानी बहुत प्रतीकात्‍मक है और गहरी है। वह यह खबर देती है कि स्‍त्री वह ऐसा थी। कि पाँच भाई भी लड़ सकते थे। इतनी गुणी थी। साधारण नहीं थी। असाधारण थी। उसको नग्‍न करना आसान बात नहीं थी। आग से खेलना था। तो अकेला दुर्योधन नहीं है कि नग्‍न कर ले। द्रौपदी भी है।
      और ध्‍यान रहे, बहुत बातें है इसमें, जो खयाल में ले लेने जैसी है। जब तक कोई स्‍त्री स्‍वय नग्‍न न होना चाहे, तक इस जगत में कोई पुरूष किसी स्‍त्री को नग्‍न नहीं कर सकता है, नहीं कर पाता है। वस्‍त्र उतार भी ले, तो भी नग्‍न नहीं कर सकता है। नग्‍न होना बड़ी घटना है वस्‍त्र उतरने से निर्वस्‍त्र होने से नग्‍न होना बहुत भिन्न‍ घटना है। निर्वस्‍त्र करना बहुत कठिन बात नहीं है, कोई भी कर सकता है, लेकिन नग्‍न करना बहुत दूसरी बात है। नग्‍न तो कोई स्‍त्री तभी होती है, जब वह किसी के प्रति खुलती है स्‍वयं। अन्‍यथा नहीं होती; वह ढंकी ही रह जाती है। उसके वस्‍त्र छीने जा सकते है। लेकिन वस्‍त्र छीनना स्‍त्री को नग्‍न करना नहीं है।
      और बात यह भी है कि द्रौपदी जैसी स्‍त्री को नहीं पा सकता दुयोर्धन। उसके व्‍यंग्‍य तीखे पड़  गए उसके मन पर। बड़ा हारा हुआ है। हारे हुए व्‍यक्‍ति–जैसे कि क्रोध में आए हुई बिल्लियों खंभे नोचने लगती है। वैसा करने लगते है। और स्‍त्री के सामने जब भी पुरूष हारता है—और इससे बड़ी हार पुरूष को कभी नहीं होती। पुरूष से लड़ ले, हार जीत होती है। लेकिन पुरूष जब स्‍त्री से हारता है। किसी भी क्षण में तो इससे बड़ी हार नहीं होती है।      
      तो दुर्योधन उस दिन उसे नग्‍न करने का जितना आयोजन करके बैठा है, वह सारा आयोजन भी हारे हुए पुरूष मन का है। और उस तरफ जो स्‍त्री खड़ी है हंसने वाली,वह कोई साधारण स्‍त्री नहीं है। उसका भी अपना संकल्‍प है अपना विल है। उसकी भी अपनी सामर्थ्‍य है; उसकी भी अपनी श्रद्धा है; उसका भी अपना होना है। उसकी उस श्रद्धा में वह जो कथा है,वह कथा तो काव्‍य है कि कृष्‍ण उसकी साड़ी को बढ़ाए चले जाते है। लेकिन मतलब सिर्फ इतना है कि जिसके पास अपना संकल्‍प है, उसे परमात्‍मा का सारा संकल्‍प तत्‍काल उपलब्‍ध हाँ जाता है। तो अगर परमात्‍मा के हाथ उसे मिल जाते हे, तो कोई आश्‍चर्य नहीं।
      तो मैंने कहा,और मैं फिर कहता हूं, द्रौपदी नग्‍न की गई, लेकिन हुई नहीं। नग्‍न करना बहुत आसान है, उसका हो जाना बहुत और बात है। बीच में अज्ञात विधि आ गई, बीच में अज्ञात कारण आ गए। दुर्योधन ने जो चाहा, वह हुआ नहीं। कर्म का अधिकार था, फल का अधिकार नहीं था।
      यह द्रौपदी बहुत अनूठी है। यह पूरा युद्ध हो गया। भीष्‍म पड़े है शय्या पर—बाणों की शय्या पर—और कृष्‍ण कहते है पांडवों को कि पूछ लो धर्म का राज, और वह द्रौपदी हंसती है। उसकी हंसी पूरे महाभारत पर छाई हे। वह हंसती है कि इनसे पूछते है धर्म का रहस्‍य, जब में नग्‍न की जा रही थी, तब ये सिर झुकाए बैठे थे। उसका व्‍यंग गहरा है। वह स्‍त्री बहुत असाधारण हे।
      काश, हिंदुस्‍तान की स्‍त्रियों ने सीता को आदर्श न बना कर द्रौपदी को आदर्श बनाया होता तो हिंदुस्‍तान की स्‍त्री की शान और होती।
      लेकिन नही, द्रौपदी खो गई है। उसका कोई पता नहीं है। खो गई। एक तो पाँच पति यों की पत्‍नी है। इसलिए मन को पीड़ा होती है।  लेकिन एक पति की पत्‍नी होना भी कितना मुश्‍किल है, उसका पता नहीं है। और जो पाँच पति यों को निभा सकती हे, वह साधारण स्‍त्री नहीं है। असाधारण है, सुपर ह्मन हे। सीता भी अतिमानवीय है लेकिन टू ह्मन के अर्थों में। और द्रौपदी भी अतिमानवीय है, लेकिन सुपर ह्यूमन  के अर्थों में।
      पूरे भारत के इतिहास में द्रौपदी को सिर्फ एक आदमी न ही प्रशंसा दी है। और एक ऐसे आदमी ने जो बिलकुल अनपेक्षित है। पूरे भारत के इतिहास में डाक्‍टर राम मनोहर लोहिया को छोड़कर किसी आदमी ने द्रौपदी को सम्‍मान नहीं दिया है। हैरानी की बात है मेरा तो लोहिया से प्रेम इस बात से हो गया कि पाँच हजार साल के इतिहास में एक आदमी, जो द्रौपदी को सीता के ऊपर रखने को तैयार है।


ओशो--गीता—दर्शन  भाग-1, अध्‍याय-1(प्रवचन-14)

Oct 11, 2011

=> तुम जीता किये हमसे मै हरदम ही हारा

 गजल सम्राट जगजीत सिंह के निधन से पूरा देश स्तब्ध !....................आखिरी जाम में क्या बात थी ऐसी साकी,  हो गया पीके जो खामोश वो खामोश रहा
                            
          ग़ज़ल गायकी के 'सरताज' और 'आवाज़ के जादूगर' जगजीत सिंह आखिर अपनी ही साँसों से हार गए, उन्ही के साथ ही सम्मोहित कर देने वाली आवाज़ का भी सदा-सदा के लिए विलय हो गया! ग़ज़ल को नया आयाम देने वाले जगजीत २३ सितम्बर को 'ब्रेन हम्ब्रेज' होने की वजह से मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती थे! डाक्टर्स की तरकीब और चाहने वालों की दुआंए भी उस वक़्त निस्तेज हो गयी जब खुदा ने उन्हें "हारा-हुआ" घोषित कर दिया इस तरह अपनी मखमली आवाज़ से जग को जीत लेने वाले जगजीत स्वयं से हार गए! सत्तर वर्ष की आयु में वक़्त ने उन्हें, इकलौते बेटे 'विवेक' की मौत से लेकर सौतेली बेटी 'मोनिका' के आत्महत्या तक का मंजर दिखाया, परन्तु 'ब्रेन हैम्ब्रेज' का  झटका ऐसा था जिसने हम सभी चाहने वालों से उन्हें "झपट" लिया और 10 -अक्टूबर की सुबह उनके पत्नी "चित्रा सिंह" को भी तनहा बना दिया! हाय रे समय - "जिसको हम गुनगुना नही सकते, तुमने ऐसा गीत क्यों गाया"! मगर कर भी क्या सकते हैं जो शास्वत सत्य है उसे स्वीकार ही करना पड़ेगा यही जीवन का मर्म है-
"एक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला"








Jul 29, 2011

=> सावन आया रे.......



Teej utsav manaati Bharatiya Naari
                          भारत में त्योंहारों की परम्परा बहुत अनोखी और मनोरंजक तरीके से आगे बढ़ती हुई संपूर्ण विश्व में अपनी पैठ मजबूत करती जा रही है! यहाँ मनाये जाने वाले पर्वों में सभी का महत्वपूर्ण स्थान हैं मगर सावन का मौसम आते ही भारतीय परंपरा अपना पंख फर्फराते हुए हरे-भरे सावन की फुहारों का आनंद लेनें लगते है ! जी हाँ, सावन का त्यौहार आता है रंगीन खुमार और खुशियों की सौगात लेकर और इसी माह में एक अत्यंत खुशनुमा त्यौहार आता है तीज का, जो होता है विवाहित जोड़ों के लिए और उन सखिओं के लिए जिन्हें अपने लिए वर की तलाश है, यह समय होता उन दम्पत्तियो के लिए जो एक-दूसरे के साथ फेरे लेकर जीवन के सुख-दुःख बाटने व साथ निभाने की कसमें  उठा चुके हैं!
                              "झूलों के त्यौहार" के नाम से जाना जाने वाला यह मौषम विवाहित जोड़ों के मन में कशमकश पैदा कर उन्हें मजबूर करती हैं अपने प्रिय के प्रति प्रेम जाहिर करने को ! इस मौसम में जहाँ गीत-संगीत एवं पारंपरिक कजरी व तीज सॉन्ग की मधुर आवाज व कोयल की कूकती गूँज कानो में मिठाश घोलती हैं वहीँ "आल्हा" की तर्ज हमारे रोंगटों को वीर रश से भर देता है और क़ातिल हवाओं की मंद-मंद मुस्कान हमारे रिश्तों एवं परम्पराओं के बीच सामंजश्य स्थापित कर दिलों को रिझाने की कोशिश करती हैं !
                              सावन के मौसम में झूला झूलने का अपना अलग ही मज़ा है, सभी सहेलियां सज-धज कर, हरे-भरे सावन की उमंग में सरावोर हो, पारंपरिक गीतों की तान छेड़ते हुए, झूलों पर सवार हो खुशियाँ मनाती हैं, मगर जिनके प्रियतम उनसे दूर हैं उनकी बिरह-बेदना मानो बढ़ सी जाती हैं और वो अपने साजन की याद में खो जाती हैं लेकिन ठीक उसी समय हवा का एक झोंका आता है और उनके दुपट्टे को धक्का देते हुए छेड़ता है तो वहीँ पर हलकी-हलकी बारिश की फुहार उस दर्द को कम करने की कोशिश करती हैं और अचानक सभी सखियाँ एक-दूसरे के हांथो पर लगे मेहंदी के रंग को देखकर उनके प्यार के नाप-तौल में लग जाती हैं इसी बीच कब शाम हो जाती हैं पता ही नहीं चलता ! 
                                पत्नियां इस दिन सोलह श्रृंगार कर के अपने हुश्न की नुमाइश में अपने दिल के टुकड़े यानी प्यारे साजन का इंतजार करती हैं और उनकी लम्बी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं ! 


    तीन तरह की होती है तीज-
पति-पत्नी के डोर के शुरूआती रिश्तों का त्यौहार तीज तीन तरह का होता है-


१- हरियाली तीज-
               इस तीज पर सभी विवाहित जोड़ों पर हरे रंग की      प्रधानता होती है, यह सावन माह के शुक्लपक्ष में मनाई जाती है जिसमे महिलायें चन्द्रमा की पूजा करती हैं !
२-कजरी तीज-   
               इस तीज का आनंद बादलों की काली घटा का आनंद उठाते हुए सावन महीने के कृष्ण पक्ष तृतीय के दिन मनाई जाती है, जिसमे महिलायें कजरी गीत गाती हैं एवं नीम वृक्ष की पूजा करतीं हैं !
३- हरतालिका तीज-
              यह तीज भादव प्रथम पक्ष तृतीय को मनाई जाती है, महिलायें निर्जला व्रत के साथ पति की लम्बी उम्र के लिए पार्वती माता की पूजा करती हैं !








Jun 2, 2011

=> प्रेम का जादुई अहसास


प्रेम कई तरह से आपको छूता है, स्पर्श करता है.
आपकी साँसों को महका देता है।
और यह सब इतने महीन और नायाब तरीकों से होता है
कि कई बार आप उसे समझ नहीं पाते।
यह एक तरह का जादू है।
यह कभी भी, कहीं भी फूट पड़ता है, खिल उठता है, महक उठता है।
इसी जादुई अहसास से जब प्रेमी अपनी आँखों से जो कुछ भी देखता है
उसे वह प्रेममय जान पड़ता है।
कभी-कभी कोई बहुत ही सादी सी बात दिल को छू जाती है।
और मामला यदि प्रेम कविता को हो तो इसमें सादी सी बात कुछ गहरे असर करती है।
दिल में गहरे उतरकर देर तक गूँजती रहती है।
उस गूँज से आप कुछ खोए-खोए से रहते हैं।
जैसे बहुत ही गहरी और हरे रंग में खिली
किसी घाटी में छोटे छोटे पीले फूलों के बीच आप सब कुछ भुलाए बैठे हों।
.........
एक कवी की कुछ पंक्तियाँ पेस कर रहा हूँ-
.........

एक ऐसी भी घड़ी आती है
जिस्म से रूह बिछुड़ जाती है

अब यहाँ कैसे रोशनी होती
ना कोई दीया, ना बाती है

हो लिखी जिनके मुकद्दर में खिजां
कोई रितु उन्हें ना भाती है

ना कोई रूत ना भाये है मौसम
चांदनी रात दिल दुखाती है

एक अर्से से खुद में खोए हो
याद किसकी तुम्हें सताती है

=> अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार

बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर
खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू
गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना !

    

          - काका हाथरस्सी का हास्य काव्य

May 27, 2011

=> अरे मै तो स्मोकर बन गया...........

सबकोई हमसे पूछता है की तुम कैसे स्मोकर बन गए????





तो मै कहता हूँ की मै ऐसा नहीं था मै तो ऐसा था--------




जब तक की मैंने उस लड़की को नहीं देखा था!!!!!



मै उससे हमेसा उसकी तारीफ किया करता था !!!जैसे की तुम बहुत सुन्दर हूँ,तुम बहुत स्मार्ट हो..........



मैंने उससे बहुत सारे  वादे किये ...........


मैंने उसके लिए valentine day को  कीमती उपहार भी भेट किया...






हमारी खुशिओं का ठिकाना न रहा जब उसने मुझे अपना दोस्त मान लिया>>>>>>>>>>>





मै उससे सारी रात बातें किया करता था यहाँ तक की ऑफिस में भी .........





जब भी मै अपने गर्ल फ्रेंड  के साथ घूमने जाया करता था तो वो मुझे कुछ इस  तरह से देखा करती थी......



ठीक उसी समय मै उसे कुछ इश अंदाज में उत्तर दिया करता था......


और मेरी गर्लफ्रेंड मुझे फूलों का गुलदस्ता दे कर चली जाया करती थी......

और उसके बाद मुझे समझ में नहीं आता था की मै क्या करूँ? कहा जाऊं ?????


तभी मुझे इसका हल मिल गया ...........!!!!!!



और तभी से मैंने स्मोकिंग और ड्रिंकिंग शुरू कर दी!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!  !!!!!!!!!!!!!!!!.............

May 14, 2011

=> What Is Happiness?




Happiness is:- 
                            1. Falling in love. 
2. Laughing so hard your face hurts. 
3. A hot shower. 
4. No lines at the supermarket. 
5. A special glance. 
6. Getting mail. 
7. Taking a drive on a pretty road. 
8. Hearing your favourite song on the radio. 
9. Lying in bed listening to the rain outside. 
10. Hot towels fresh out of the dryer. 
11. Chocolate milkshake ... (or vanilla ... or strawberry!) 
12. A bubble bath. 
13. Giggling. 
14. A good conversation. 
15. The beach
16. Finding a 20-pound note in your coat from last winter. 
17. Laughing at yourself.
18. Eye contact with a hot member of the opposite sex.
19. Midnight phone calls that last for hours. 
20. Running through sprinklers. 
21. Laughing for absolutely no reason at all. 
22. Having someone tell you that you're beautiful/good looking. 
23. Laughing at an inside joke. 
24. Friends. 
25. Accidentally overhearing someone say something nice about you. 
26. Waking up and realizing you still have a few hours left to sleep. 
27. Your first kiss (either the very first or with a new partner). 
28. Making new friends or spending time with old ones. 
29. Playing with a new puppy. 
30. Having someone play with your hair. 
31. Sweet dreams. 
32. Hot chocolate. 
33. Road trips with friends. 
34. Swinging on swings. 
35. Making eye contact with a cute stranger.
36. Making chocolate chip cookies (and eating them...!).
37. Having your friends send you homemade cookies.
38. Holding hands with someone you care about.
39. Running into an old friend and realizing that some things (good or bad) never change.
40. Watching the expression on someone's face as they open a much-desired present from you.
41. Watching the sunrise.
42. Getting out of bed every morning and being grateful for another beautiful day.
43. Knowing that somebody misses you.
44. Getting a hug from someone you care about deeply.
45. Knowing you've done the right thing, no matter what other people think.
 

=> Yesterday is dead

Each morning when I open my eyes I say to myself: I, not events, have the power to make me happy or unhappy today. I can choose which it shall be. Yesterday is dead, tomorrow hasn't arrived yet. I have just one day, today, and I'm going to be happy in it. 

May 10, 2011

=> वासना के प्रति निंदा छोड़ दो !!!


मैं कोई स्‍वेच्‍छाचारी समाज की शिक्षा नहीं दे रहा हूँ। 
मैं निश्चित ही चाहता कि तुम मुक्‍त हो ही तब सकोगे,
जब तुम वासना के प्रति सारा दुर्भाव छोड़ दो,
सारी निंदा छोड़ दो।
तुम वासना से मैत्री साधो।
क्‍योंकि वासना तुम्‍हारी है, तुम वासना हो।
दुर्भाव साधोगे, तो भीतर एक कलह शुरू हो जाएगी,
शांति निर्मित नहीं होगी।
लड़ों मत, लड़ोगे तो खंड़-खंड़ हो जाओगे,
दो टुकड़ो में बंट जाओगे।
और आदमी दो टुकड़ो में बंट गया है।
वह आदमी परमात्‍मा को कभी न जान पाएगा।
परमात्‍मा को वही जान पाता है जो एक हो गया है।

                                    -OSHO

Apr 15, 2011

=> सच्चा ब्राह्मण कौन है ?


न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो।
यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो॥

भगवान बुद्ध धर्म कहते हैं कि ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से। जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है।


किं ते जाटाहि दुम्मेध! किं ते अजिनसाटिया।
अब्भन्तरं ते गहनं बाहिर परिमज्जसि॥

अरे मूर्ख! जटाओं से क्या? मृगचर्म पहनने से क्या? भीतर तो तेरा हृदय अंधकारमय है, काला है, ऊपर से क्या धोता है?


अकिंचनं अनादानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
जो अकिंचन है, किसी तरह का परिग्रह नहीं रखता, जो त्यागी है, उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।
वारि पोक्खरपत्ते व आरग्गे रिव सासपो।
यो न लिम्पति कामेसु तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
कमल के पत्ते पर जिस तरह पानी अलिप्त रहता है या आरे की नोक पर सरसों का दाना, उसी तरह जो आदमी भोगों से अलिप्त रहता है, उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।

निधाय दंडं भूतेसु तसेसु ताबरेसु च।
यो न हन्ति न घातेति तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
चर या अचर, किसी प्राणी को जो दंड नहीं देता, न किसी को मारता है, न किसी को मारने की प्रेरणा देता है उसी को मैं ब्राह्मण कहता हूँ। सभी ब्राह्मण के गुणों के बारे में भगवान बुद्ध ने अपने उपदेशों में बहुत ही विस्तृत से बताया है। जो इस प्रकार हैं-
Lord Mahaveer  


  •  ब्राह्मण मैं उसे कहता हूँ, जो अपरिग्रही है, जिसने समस्त बंधन काटकर फेंक दिए हैं, जो भय-विमुक्त हो गया है और संग तथा आसक्ति से विरत है।


  •  जो बिना चित्त बिगाड़े, हनन और बंधन को सहन करता है, क्षमा-बल ही जिसका सेनानी है, मैं उसी को ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो अक्रोधी है, व्रती है, शीलवान है, बहुश्रुत है, संयमी और अंतिम शरीर वाला है, उसे ही मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  कमल के पत्ते पर जल और आरे की नोक पर सरसों की तरह जो विषय-भोगों में लिप्त नहीं होता, मैं उसे ही ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो चर-अचर सभी प्राणियों में प्रहार-विरत हो, जो न मारता है और न मारने की प्रेरणा ही देता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो ऐसी अकर्कश, आदरयुक्त और सत्यवाणी बोलता हो कि जिससे किसी को जरा भी पीड़ा नहीं पहुँचती हो, मैं उसे ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  बड़ी हो चाहे छोटी, मोटी हो या पतली, शुभ हो या अशुभ, जो संसार में बिना दी हुई किसी भी चीज को नहीं लेता, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जिसने यहाँ पुण्य और पाप दोनों की ही आसक्ति छोड़ दी है और जो शोकरहित, निर्मल और परिशुद्ध है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  मानुष भोगों का लाभ छोड़ दिव्य भोगों के लाभ को भी जिसने लात मार दी है, किसी लाभ-लोभ में जो आसक्त नहीं, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  राग और घृणा का जिसने त्याग कर दिया है, जिसका स्वभाव शीतल है और जो क्लेशरहित है, ऐसे सर्वलोक-विजयी वीर पुरुष को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  • जिसके पूर्व, पश्चात और मध्य में कुछ नहीं है और जो पूर्णतया परिग्रह-रहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो ध्यानी, निर्मल, स्थिर, कृतकृत्य और आस्रव (चित्तमल) से रहित है, जिसने सत्य को पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जो मन, वचन और काया से कोई पाप नहीं करता अर्थात इन तीनों पर जिसका संयम है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  न जटा रखने से कोई ब्राह्मण होता है, न अमुक गोत्र से और न जन्म से ही। जिसने सत्य और धर्म का साक्षात्कार कर लिया, वही पवित्र है, वही ब्राह्मण है।


  • जो गंभीर प्रज्ञावाला है, मेधावी है, मार्ग और अमार्ग का ज्ञाता है और जिसने सत्य पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  •  जिसने घृणा का क्षय कर दिया है, जो भली-भाँति जानकर अकथ पद का कहने वाला है और जिसने अगाध अमृत प्राप्त कर लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।


  • जो पूर्वजन्म को जानता है, सुगति और अगति को देखता है और जिसका पुनर्जन्म क्षीण हो गया है तथा जो अभिमान (दिव्य ज्ञान) परायण है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता।


  •  जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है।


  •  ब्राह्मण पर प्रहार नहीं करना चाहिए और ब्राह्मण को भी उस प्रहारक पर कोप नहीं करना चाहिए।


  •  ब्राह्मण वह है जो निष्पाप है, निर्मल है, निरभिमान है, संयत है, वेदांत-पारगत है, ब्रह्मचारी है, ब्रह्मवादी (निर्वाण-वादी) और धर्मप्राण है।


  •  जिसने सारे पाप अपने अंतःकरण से दूर कर दिए हैं, अहंकार की मलीनता जिसकी अंतरात्मा का स्पर्श भी नहीं कर सकती, जिसका ब्रह्मचर्य परिपूर्ण है, जिसे लोक के किसी भी विषय की तृष्णा नहीं है, जिसने अपनी अंतर्दृष्टि से ज्ञान का अंत देख लिया, वही अपने को यथार्थ रीति से ब्राह्मण कह सकता है।