Oct 4, 2012

=> "मैडम" का मतलब होता है "वेश्या"


सावधान ! अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के शोषण के समय में गाली के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा का प्रयोग आजकल धड़ल्ले से किया जा रहा है, जी हां ऐसा ही एक शब्द है "मैडम" जिशे हम अक्सर अपने जान पहचान अथवा अजनवी महिलाओं को संबोधित करने हेतु कहते है, मगर क्या आपको पता है की इसका अर्थ क्या होता है ? अगर नहीं तो ध्यान से पढ़िए इस लेख को और जानिये अंग्रेजो द्वारा प्रदत्त इस गंभीर किन्तु सामान्य शब्द के बारे में......................

त्रिनाथ मिश्रा

                    मैडम शब्द का प्रयोग सामान्यतया महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से किया जाता है जिसे सुनकर अक्सर महिलाएं भी खुश होती हैं मगर एक ऐसा राज़ जिसे सुनकर आप चिंतित हो  जायेंगे वो है इसका हिंदी में निकालने वाला अर्थ !   दोस्तों आज तक आपने डिक्सनरी और स्कूलों आदि में पढ़ा होगा या सुना होगा की मैडम का हिंदी में अर्थ होता है 'महोदय' और इसका इस्तेमाल करना एक व्यक्ति के लिए सभ्यता की निशानी माना जाता है ! मगर जानकारी के अभाव में आज लगभग हर महिला इस शब्द के प्रयोग करने के साथ ही गाली सुन रही है, और अपने आप को अनजाने में अंग्रेजों के कुचक्र का शिकार बनाकार अपना मज़ाक उड़ा रही हैं !
                     लेकिन इसका सही अर्थ क्या है ये आज आप सुनकर स्तब्ध हो जायेंगे! जी, हाँ- मैडम का हिंदी में अर्थ होता है "कोठा चलाने वाली बायी" यानि वो महिला जो देह व्यापार करने वालों की मालकिन हो, उसे मैडम कहा जाता है ! अंगेजी की डिक्सनरी उठाकर देखें तो उसमे स्पस्ट अक्छारों में लिखा है मैडम का अर्थ 'a woman who runs a house of prostitution."  दोस्तों आपको यह जानकार आश्चर्य होगा की अंग्रेजी भाषा में हर दूसरा शब्द अश्लील है ऐसा अक्सर अंग्रेजी के जानकारों को कहते सुना जा सकता है  और शायद अंग्रेजों ने भारतीय नारियो को नीचा दिखाने और अत्याचार करने के लिए इश शब्द का ईजाद किया था ! तो आज से मैडम शब्द का प्रयोग करें बंद क्योंकि यह शब्द भारतीय नारीओं को गाली के अलावा कुछ नहीं है और हां महिलाओं से भी निवेदन है मैडम शब्द के असली अर्थ को जानते समझते हुए कृपया इसका इस्तेमाल ना करें और नाही अपने परिचितों करने दें ! 

Sep 20, 2012

=> पुनर्जन्‍म का सिद्धांत प्रेमियों ने खोजा होगा


मुल्‍ला नसरूद्दीन और लाटरी—
मैने सुना है कि मुल्‍ला नसरूदीन एक गांव की सबसे गरीब गली में दर्जी का काम करता था। इतना कमा पता था कि मुश्‍किल से कि रोटी-रोजी का काम चल जाये, बच्‍चे पल जाये। मगर एक व्‍यसन था उसे कि हर रविवार को एक रूपया जरूर सात दिन में बचा लेता था लाटरी का टिकट खरीदने के लिए। ऐसा बाहर साल तक करता रहा, न कभी लाटरी मिली, न उसने सोचा कि मिलेगी। बस यह एक आदत हो गई थी कि हर रविवार को जाकर लाटरी की एक टिकट खरीद लेने की। लेकिन एक रात आठ नौ बजे जब वह अपने काम में व्‍यस्‍त था, काट रहा था कपड़े कि दरवाजे पर ऐ कार आकर रुकी। उस गली में तो कार कभी आती नहीं थी; बड़ी गाड़ी थी। कोई उतरा....दो बड़े सम्‍मानित व्‍यक्‍तियों ने दरवाजे पर दस्‍तक दी। नसरूदीन ने दरवाजा खोला; उन्‍होंने पीठ ठोंकी नसरूदीन की और कहा कि ‘’तुम सौभाग्‍यशाली हो, लाटरी मिल गई, दस लाख रूपये की।‘’
      नसरूदीन तो होश ही खो बैठा। कैंची वहीं फेंकी,कपड़ों को लात मारी, बाहर निकला, दरवाजे पर ताला लगाकर चाबी कुएं में फेंकी। साल भर उस गांव में ऐसी कोई वेश्‍या न थी जो नसरूदीन के भवन में न आई हो; ऐसी कोई शराब न थी जो उसने न पीर हो; ऐसा कोई दुष्‍कर्म न था जो उसने न किया हो। साल भर में दस लाख रूपये उसने बर्बाद कर दिए। और साथ ही जिसका उसे कभी ख्‍याल ही नहीं था, जो जिंदगी से उसे साथ था स्‍वास्‍थ—वह भी बर्बाद हो गया। क्‍योंकि रात सोने का मौका ही न मिले—रातभर नाच गाना, शराब,साल भर बाद जब पैसा हाथ में न रहा,तब उसे ख्‍याल आया कि मैं भी कैसे नरक में जी रहा था।
      वापस लौटा; कुएं में उतर कर अपनी चाबी खोजी। दरवाजा खोला; दुकान फिर शुरू कर दी। लेकिन पुरानी आदत वश वह रविवार को एक रूपये की टिकट जरूर ख़रीदता है। दो साल बाद फिर कार आकर रुकी; कोई दरवाजे पर उतरा—वहीं लोग। उन्‍होंने आकर फिर पीठ ठोंकी और कहा, इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ,दोबार तुम्‍हें लाटरी का पुरस्‍कार मिल गया, दस लाख रूपये का। नसरूदीन ने माथा पीट लिया। उसने कहा,’’माई गाड आई टु गो दैट हैल—थ्रो दैट,आल दैट हैल अगेन; क्‍या उस नरक में फिर से मुझे गुजरना पड़ेगा।‘’
      .......गुजरना पडा होगा। क्‍योंकि दस लाख हाथ में आ जायें तो करोगे भी क्‍या। लेकिन उसे अनुभव है कि यह एक वर्ष नरक हो गया।
      धन स्‍वर्ग तो नहीं लाता, नरक के सब द्वार खुले छोड़ देता है। और जिनमें जरा भी उत्‍सुकता है। वे नरक के द्वार में प्रविष्‍ट हो जाते है।
      महावीर कहते है जो परम जीवन को जानना है तो अपनी ऊर्जा को खींच लेना होगा व्‍यर्थ की वासनाओं से। मिनीमम, जो न्‍यूनतम जीवन के लिए जरूरी है—उतना ही मांगना, उतना ही लेना,उतना ही साथ रखना, जिससे रत्‍तीभर ज्‍यादा जरूरी न हो। संग्रह मत करना।
      कल की चिंता वासना ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को करना ही पड़ेगी, क्‍योंकि वासना के लिए भविष्‍य चाहिए। ध्‍यान करना हो तो अभी हो सकता है, भोग करना हो तो कल ही हो सकता है। भोग के लिए विस्‍तार चाहिए, साधन चाहिए, समय चाहिए। किसी दूसरे को खोजना पड़ेगा। भोग अकेले नहीं हो सकता है। ध्‍यान अकेले हो सकता है।
      लेकिन बड़ी अद्भुत दुनिया है। लोग कहते है—ध्‍यान कल करेंगे, भोग अभी कर लें। भोग तो भविष्‍य में ही हो सकता है। जिसे जीवन का परम सत्‍य जाना हे, उसका कहना है समय की खोज ही वासना के कारण हुई है, वासना ही समय का फैलाव है। यह जो इतना भविष्‍य दिखलाई पड़ता है। यह हमारी वासना का फैलाव है; क्‍योंकि हमें इतने में पूरा होता नहीं दिखाई पड़ता। और कुछ लोग कहते है, और ठीक ही है....
      मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पुनर्जन्‍म का सिद्धांत प्रेमियों ने खोजा होगा; क्‍योंकि उनके लिए जीवन छोटा मालूम पड़ता है ओर वासना बड़ी मालूम पड़ती है। इतनी बड़ी वासना के लिए इतना छोटा जीवन तर्कहीन मालूम होता है। संगत नहीं मालूम होता। अगर दुनिया में कोई भी व्‍यवस्‍था है, तो जितनी वासना उतना ही जीवन चाहिए। इस लिए अनंत फैलाव है।

=> भारत बन्द का जोरदार असर


भारत बन्द का जोरदार असर
मंहगाई, एफ.डी.आई. और भ्रष्टाचार के विरोध में जल उठा मेरठ 
बीस सितम्बर को भारत बंद के आह्वान पर सभी व्यापारी, कर्मचारी, नागरिक और बिभिन्न राजनैतिक पार्टिओं सहित आम जनता ने अपने प्रतिष्ठानों को बंद करके पूरा सहयोग दिया !  मंहगाई की आगोश में समाई जनता को अब केंद्र सरकार के विरोध स्वरुप प्रदर्शन करने के शिवा आखिर और रास्ता ही क्या बचा है? तृणमूल कांग्रेस भी है विरोध में ! आर्थिक सुधार हेतु बढ़ी कीमतों को जायज बता रही केंद्र सरकार !

त्रिनाथ मिश्रा , मेरठ !

                       केंद्र सरकार की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं, सरकार के फैसलों के खिलाफ भारत बंद का चौतरफा असर देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश में जनजीवन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। रीटेल में एफडीआई, डीजल के दामों में बढ़ोतरी और सस्ते सिलेंडर के कोटे का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने मेरठ में वॉलमार्ट स्टोर के विरोध और मंहगाई को काबू करने के लिए दुकानों को बंद रखा तथा जमकर नारेबाजी और प्रदर्शन किया ! कहीं स्टेसन पर ट्रेन रोकी तो कही केंद्र सरकार का पुतला दहन किया मगर सवाल ये है की क्या सरकार इस "भारत बन्द" की पीड़ा को सुनेगी? क्या सरकार बढ़ती मंहगाई को लगाम लगाने में सफल हो पायेगी? बहरहाल इसका जबाब न तो आम जनता के पास है और ना ही विरोध कर कर रहे उन तमाम समाज के ठेकेदारों के पास है जो खुद को जनता के हितैसी मानते हैं ! इसका जबाब तो सिर्फ केंद्र सरकार के पास है जो की चुप्पी साधे हुए है और कुछ भी बोलने से कतरा रही है !
                               संयुक्त व्यापार मंडल के कार्यकर्ताओं ने बच्चा पार्क चौराहे पर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को वापस लेने के लिए केंद्र सरकार से मांग की ! व्यापारिओं की अगुआई कर रहे पिंटू राणा, सुधीरकान्त  शर्मा, चिन्मय भरद्वाज, गौरव शर्मा, जीतू नागपाल ने बीस तारीख को सुबह ग्यारह बजे बच्चा पार्क पर संयुक्त व्यापार मंडल के अन्य पदाधिकारिओं एवं कार्यकर्ताओं के  साथ एकत्र होकर 'गधे के आगे बीन बजाकर" विरोध प्रदर्शन किया तथा  सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह व केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर करते हुए मुर्दाबाद के नारे लगाए !
                               गौतलब है की यूं.पी.ए. सरकार की आर्थिक नव उदारीकरण नीतियाँ पूर्ण रूप से अमेरिकी साम्राज्यवाद के फायदे के लिए बनायी गयी हैं तथा अब ऐसा लगता है की केंद्र सरकार अब अपने विवेक और बुद्धि के बल पर चलने में नाकाम हो गयी है  और दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही मंहगाई आम जनता को जिन्दा तडपाने को मजबूर कर रही है , उपरोक्त आरोप कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के जिला सचिव सत्यपाल सिंह ने बच्चा पार्क पर अपने उद्बोधन में केंद्र सरकार को निशाना साधते हुए कहा !

सपा का राजनैतिक स्टंट
                             आम जनता और व्यापारिओं के भारत बन्द और एफ.डी.आई. के विरोध की लपटों में घी डालकर समाजवादी के कार्यकर्ताओं ने भी अपनी भागीदारी दिखाई ! सरोजिनी अग्रवाल  की अगुआई में महिलाएं तथा गुलाम मुहम्मद, रफीक अंसारी की अगुआई में युवा व पुरुष कार्यकर्ताओं ने सपा समर्थको के साथ बेगम पुल पर केंद्र सरकार का पुतला जलाकर और सरकारी बसों को रोककर अपना राजनैतिक स्टंट किया ! एफ.डी.आई. को रोजगार के क्षेत्र में सबसे बड़ा दुश्मन तथा गैस सिलेंडर और पेट्रोल, डीजल के बेतहासा बढ़ रही कीमतों को आम पब्लिक के लिए घातक बताया ! प्रदर्शन के दौरान बेगम पुल पर सपा कार्यकर्ताओं का हजूम उमड़ पडा था मगर धूप में खड़े होने की हिमाकत ज्यादातर लोंगो ने नहीं की , जिससे जाहिर होता है की सपा आम आदमियों के लिए नहीं बल्कि मीडिया में अपनी उपस्थिति दर्जा कराने के लिए और खुद को जनता का सेवक साबित करने हेतु प्रदर्शन कर रही थी! 

केंद्र सरकार बेसर्म है : बीजेपी सांसद राजेंद्र अगरवाल
                      भारत बन्द के दौरान भारतीय जनता पार्टी के सांसद राजेंद्र अगरवाल अपने कार्यकर्ताओं सहित बिभिन्न इलाकों में प्रदर्शन कर दुकानों को बन्द कराया तथा केंद्र सरकार को चोर, निकम्मी और अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार का दर्जा देते हुए सत्ता के मद में चूर होकर आम जनता का शोषक बताया और कहा की जनता इस सरकार को आने वाले चुनावी सीजन में सबक जरूर सिखाएगी क्योंकि अंतिम फैसला जनता के हांथो में ही होता है ! उन्होंने कहा की अब पानी शर के ऊपर पहुँच चुका है आम जनता अब इस सरकार को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगी और न ही भबिष्य  में इस सरकार पर अपना बिश्वास जताएगी !

पुलिस ने भी दिखाई मुस्तैदी
                          
                           भारत बन्द के सफल अभियान में पुलिस प्रशासन का भी अहम किरदार रहा ! पुतला दहन, रोड जाम और विरोध प्रदर्शन स्वरुप हो रही अनियमितताओं के बीच पुलिस ने भी कमान को बखूबी सम्भाला और किसी भी अनहोनी से बचने हेतु चप्पे-चप्पे पर गहरी पैठ बनाकर यातायात और जाम मुक्ति हेतु  विशेष व्यवस्था कर राखी थी !

'ममता' ने भी दिखाई निर्दयता, सरकार जुटी मनाने में 
                              तृणमूल कांग्रेस ने किराना (रिटेल) क्षेत्र में 51 फीसदी एफडीआई की मंजूरी देने, डीजल पांच रुपये प्रति लीटर महंगा करने और लोगों को साल में सिर्फ 6 रियायती सिलेंडर देने की समय सीमा तय करने के विरोध में अपने मंत्रियों के इस्‍तीफे का ऐलान और अब प्रधानमंत्री का इस्‍तीफा मांग कर सरकार को मुसीबत में डाल दिया है। ज्‍यादातर राज्‍य सरकारें, खास कर गैर कांग्रेस शासित राज्‍य, भी रिटेल में एफडीआई के विरोध में हैं ।केंद्र सरकार इन फैसलों को आर्थिक सुधार के लिए जरूरी मान रही है और इन पर अडिग है। वह तृणमूल को मनाने की कोशिशें भी जारी रखे हुए हैं। पर अगर ममता नहीं मानीं तो क्‍या होगा? सरकार के पास क्‍या विकल्‍प हैं?
 

पेट्रोल और डीजल होगा अभी और महँगा
                             डीजल पर एक साथ 5 रुपए की बढ़ोतरी पर अभी विवाद थमा नहीं कि फिर पेट्रोल-डीजल के मद में इजाफा करने की तैयारी है। लंबे इंतजार के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय ने पेट्रोल पंप डीलरों को तेल बिक्री पर अगले 15 दिन में कमीशन बढ़ाने का आश्वासन दे दिया है। अगर फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया पेट्रोलियम ट्रेडर्स की बिक्री पर 5 प्रतिशत कमीशन की मांग पर तेल कंपनियां स्वीकार कर लेती हैं तो यह पेट्रोल पर प्रति लीटर 73 पैसे और डीजल पर प्रति लीटर 42 पैसे होगी। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह बढ़ोतरी ग्राहकों से वसूली जाएगी या फिर फिलहाल तेल कंपनियां ही इसे वहन करेंगी। 
                             फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया पेट्रोलियम ट्रेडर्स के महासचिव अजय बंसल ने बुधवार को बताया कि आज उनके प्रतिनिधि मंडल ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी से मुलाकात की। मंत्री ने उन्हें आश्वस्त किया कि अगले पंद्रह दिन में उन्हें पेट्रोल-डीजल पर बढ़ा हुआ कमीशन मिलने लगेगा। इसके लिए तेल कंपनियों को निर्देश दिए जा चुके हैं। बंसल ने बताया कि पेट्रोलियम मंत्रालय से हमने पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर प्रति लीटर 5 प्रतिशत का कमीशन मांगा है लेकिन तेल कंपनियां अगले पंद्रह दिन में बताएंगी कि कितना कमीशन देंगी।अगर हमारी मांग मानी जाती है तो पेट्रोल पंप डीलर को प्रति लीटर पेट्रोल पर 73 पैसे और डीजल पर प्रति लीटर 42 पैसे का कमीशन हासिल होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय के एक अधिकारी ने इस संबंध में कहा कि फिलहाल यह तय नहीं किया गया है कि यह भार ग्राहक पर डाला जाएगा या फिर तेल कंपनियां ही इसे वहन करेंगी। कंपनियां अगले 15 दिन में इस पर अपनी रपट देंगी। उसके आधार पर फैसला किया जाएगा। इस अधिकारी ने कहा, ‘ऐसे में जब सरकार दाम बढ़ोतरी पर अडिग है तो यह संभव है कि यह बढ़ोतरी ग्राहकों के ऊपर डाल दी जाए। हालांकि अंतिम फैसला तेल कंपनियों की रपट के बाद ही होगा।’

Aug 24, 2012

=> इस शहर में धड़ल्ले से हो रही है पत्नियों की अदला-बदली


                       शादी होने के बाद एक महिला से उनका पति यही कामना करता है कि उनकी पत्नी सदा पतिव्रता का धर्म निभाएगी। मगर जब एक पति ही अपनी पत्नी को अपने दोस्त के साथ संबंध बनाने की कहे तो उक्त महिला क्या करे।
                      वह भी इसलिए कि उक्त युवती के पति ने शादी से पहले अपने दोस्त की पत्नी के साथ संबंध बनाए थे। जिले में पिछले तीन महीने में इस तरह के तीन सनसनीखेज मामले आए हैं। खास बात यह है कि ये तीनों मामले हाईप्रोफाइल की बजाय मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं।

आगे आएं पीड़ित
महिला प्रोटेक्शन अधिकारी हरबंस कौर ने कहा कि इस तरह के मामले हमने हाईप्रोफाइल परिवारों के बारे में तो सुने थे, लेकिन उनकी ओर से भी कभी शिकायत नहीं आई। मगर ये तीनों युवतियां तो मध्यमवर्गीय परिवारों से संबंधित हैं। आखिर लोग अपनी पत्नियों और उनकी भावनाओं की कद्र क्यों नहीं कर रहे यह बात समझ से परे है। इसके लिए पीड़ित महिलाओं को समय रहते सही जगह पर शिकायत करनी होगी।
वहीं पीड़ित महिलाओं का कहना है कि वे नहीं चाहती कि उनकी समस्या लोगों के सामने जाएं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो समाज में इस तरह की प्रवृत्ति कम होने की बजाय और बढ़ेगी। इसलिए इन पर अंकुश लगाने के लिए पीड़ितों को खुद आगे आना होगा।

किस्सा नंबर 1
शादी के तुरंत बाद डाला दबाव
                    राजू की शादी एक साल पहले ही हुई है। वह अपनी पत्नी संजना से कह रहा है कि तुम्हें उसके दोस्त राजन के साथ शारीरिक संबंध बनाने होंगे। संजना ने मना किया तो उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। संजना को न चाहते हुए भी गैर मर्द के साथ हम बिस्तर होना पड़ा। वहीं उसका पति अपने दोस्त की पत्नी से हम बिस्तर हो रहा था। आखिर उसने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का केस दर्ज करा दिया। 

किस्सा नंबर 2 
आखिर अदालत में उगल दिया सच
                     सतवंती की शादी को चार साल हो गए। शादी के दो साल बाद पति ने दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह उनके दोस्त के साथ शारीरिक संबंध बनाए। विरोध पर उसे पीटा गया। उनका मामला भी अदालत पहुंचा। वहां उसने पति की करतूत पर जुबान खोल दी। उसने बताया कि उसके पति ने दोस्त की मर्जी से उसकी पत्नी के साथ इस शर्त पर संबंध बनाए कि वह उसे भी पेश करेगा। 

=> आपका पासवर्ड तो नहीं हुआ हैक, जानने के लिए यहां करें लॉग इन


                         आज के दौर में ढेर सारे काम ऑनलाइन किए जाने लगे हैं। इस फेर में ढेरों यूजर नेम समेत पासवर्ड बनाने पड़ते हैं। इन्हें न सिर्फ याद रखना चुनौती है, बल्कि किसी आपात स्थिति में परिवार तक इनकी पहुंच हो, यह सुनिश्चित करना भी काफी मुश्किल है। लेकिन इसका रास्ता दिखाया है एक कंपनी क्वेस्टली ने। 
                         वसीयत की तरह अपने सारे पासवर्ड परिवार के सुपुर्द करने के लिए आपको वेबसाइटwww.passmywill.com पर लॉग इन करना होगा। यहां आप ऑनलाइन वित्तीय लेनदेन से लेकर अन्य महत्वपूर्ण साइट्स के सारे पासवर्ड रख सकेंगे। ताकि आपके न होने पर परिवार के सदस्यों तक उनकी पहुंच हो सके। इस सेवा के लिए कंपनी आपसे निर्धारित शुल्क लेगी। 

हैक तो नहीं पासवर्ड
                 कैसे पता चलेगा कि आपका पासवर्ड किसी साजिश का शिकार हुआ है? इसके लिएwww.shouldichangemypassword.comपर जाना होगा। इसमें ई-मेल डालना होगा। इसके बाद साइट हैकरों द्वारा सार्वजनिक की गई जानकारियों के डाटा बैंक को खंगालेगी। अगर ई-मेल अकाउंट के साथ कोई छेड़-छाड़ की गई है, तो वह आपको जानकारी देने के साथ पासवर्ड सुरक्षित बनाने के टिप्स भी देगी।

सुरक्षित पासवर्ड
                    यह पता लगाने का एक जरिया माइक्रोसॉफ्ट पासवर्ड चैकर (http://goo.gl/BB0zC)है। साइट पर दिए गए बॉक्स में आपको अपना पासवर्ड टाइप करना होगा। इसके बाद पता चल जाएगा कि पासवर्ड कमजोर, सुरक्षित या अति सुरक्षित है। अगर साइट पासवर्ड कमजोर बताए, तो उसे मजबूत बना लें।

बनाएं सेफ पासवर्ड
                     ई-सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो अब पास‘फ्रेज’ का जमाना है। इससे हैकरों को पासवर्ड चुराने में दिक्कत आती है। यानी एक ऐसा वाक्य चुनें जिसे आप याद रख सकें। इसे और जटिल बनाने के लिए शुरुआती कुछ अक्षर बड़े और बाद के छोटे कर लें। साथ में नंबरों का भी प्रयोग करें।

कैसे याद रखेंगे

                      इस तरह बने बेतुके पास‘फ्रेज’ को याद रखना खासा मुश्किल होगा। ऐसे में मददगार बनेगा पासवर्ड मैनेजर। इसके लिए लॉग इन करें www.lastpass.comजो एक फ्री सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने की सुविधा देता है। यह सॉफ्टवेयर आपके सिस्टम और वेब ब्राउजर के साथ मिल कर काम करेगा। शुरुआत में आपको लास्टपास वेबसाइट पर अपने ई-मेल से एक अकांउट खोलना होगा और एक मास्टर पासवर्ड देना होगा। लॉग इन के बाद अपने अकाउंट में सारे पासवर्ड डाल दें। इसके बाद आप जब भी संबंधित साइट खोलेंगे, तो पासवर्ड अपने आप ही दर्ज हो जाएगा। 
                       इस सुविधा का एक रोचक पहलू यह भी है कि यह जरूरत पड़ने पर पासवर्ड को और सुरक्षित बना कर उसे स्टोर कर लेगा। यही नहीं, सारे पासवर्ड आपके पीसी तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि आप कहीं से भी इस सुविधा का फायदा उठा सकेंगे। यह साफ्टवेयर इंटरनेट एक्सप्लोरर समेत फायरफॉक्स, क्रोम जैसे ब्राउजर्स और विंडोज 7, सिंबियन, ब्लैकबेरी जैसे ओएस प्लेटफॉर्म पर भी चलेगा। इसके अलावा रोबोफॉर्म(www.roboform.com)भी यही सुविधा देता है, लेकिन यहां आपको इसके लिए कुछ शुल्क देना होगा।

पासवर्ड वॉल्ट
 अगर आपको विभिन्न पासवर्ड याद रखने में दिक्कत आती है, तो आपके लिए पासवर्ड वॉल्ट के रूप में भी एक विकल्प है। मान लीजिए आप विंडोज 7 पर काम करते हैं, तो आप इसके क्रेडेंशियल मैनेजर की सुविधा लें। इस पर आप विभिन्न साइट्स के यूजर नेम और पासवर्ड सुरक्षित रख सकते हैं। ये पासवर्ड के लिए वॉल्ट की तरह काम करता है। विंडोज 7 पर इस तक पहुंचने के लिए आपको सिर्फ क्रेडेंशियल मैनेजर टाइप भर करना होगा। मोजिला फायरफॉक्स पर भी मास्टर पासवर्ड वॉल्ट उपलब्ध हैं। इसके अलावा पासवर्ड सेफ(http://passwordsafe.sourceforge.net) और कीपास (www.keepass.info)भी यह सुविधा देता है।

Aug 21, 2012

=> मंदी के दौर में ग्रामीण क्षेत्रों की ओर करें रुख

                          महंगाई के कारण लोगों ने खरीदारी का विचार त्याग दिया है या उचित समय का इंतजार कर रहे हैं। इससे खासकर शहरों में उत्पादों की बिक्री प्रभावित हुई है। वास्तव में इस समस्या का समाधान हमारे देश के ग्रामीण इलाकों या शहरों में तब्दील होते कस्बों या गांवों में निहित है। इनकी संख्या देशभर में 5000 के लगभग है। यहां के लोग बड़े शहरों में खरीदारी के लिए आते हैं। इसे देखते हुए पैराशूट ब्रांड तेल बनाने वाली मैरिको लिमिटेड की सीईओ सौगता गुप्ता की बात विचारणीय हो जाती है। उनका मानना है कि उभरते शहरों की आबादी खर्च करने को तैयार है, लेकिन एफएमसीजी उत्पाद बनाने वाली कंपनियां उन तक पहुंच नहीं पा रही हैं। इसे समझते हुए ही कंपनी ने खास रणनीति बनाई है।

                          भारत के ग्रामीण इलाकों के अलावा दुनिया के कुछ ऐसे देश भी हैं, जो उचित उत्पादों पर पैसा खर्चने के लिए तैयार हैं। सब-सहारा देश, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीकी महाद्वीप इत्यादि कुछ ऐसे केंद्र हैं, जहां लोग मध्य कीमतों के कंज्यूमर उत्पादों की राह देख रहे हैं। अब जरा एक नजर डालिए त्वरित सेवा देने वाले रेस्त्रां व्यवसाय पर। इनके लिए छोटे का मतलब ही बड़ा है। इसी सिद्धांत पर वे व्यवसाय में छाई मंदी को छांटने का प्रयास कर रहे हैं। इन्होंने समोसों को ऐसा आकार दिया, जो पांच रुपए के लिहाज से मुफीद हो। इसी तरह पिज्जा, कचौरी, सैंडविच, बर्गर को भी दस रुपए के खांचे में फिट करने वाला आकार दिया गया। भले ही इनका आकार छोटा हो, लेकिन लोगों की तेज भूख शांत करने में यह अब भी सफल हैं। इसी तर्ज पर पूरी थाली के सत्तर रुपए कीमत वाले लघु संस्करण की बिक्री में सत्तर फीसदी का इजाफा देखा गया है।

                            डोमिनोज और मैक्डोनल्ड भी खाद्य उत्पादों के लघु संस्करण पेश कर रहे हैं, जो लोगों की जेब में समा सकें। यद्यपि इन शृंखलाओं में खाने को शेयर करने की प्रवृत्ति कम हुई है, लेकिन वैयक्तिक तौर पर खरीदारों की संख्या बढ़ी है। इसकी वजह यह है कि इन्होंने तुरंत खाने की इच्छा रखने वालों के लिए कम कीमत में उत्पाद पेश किए हैं। भारत में मैक्डोनल्ड के 257 रेस्त्रां में से दस फीसदी हाईवे पर स्थित हैं। कंपनी के प्रबंधकों ने अपने ब्रांड को इन जगहों पर नए सिरे से स्थापित करने की रणनीति बनाई है। हाईवे पर ग्रामीण इलाकों में रहने वाली आबादी की शिरकत बढ़ी है। अब इन हाईवे आउटलेट से कंपनी को बीस फीसदी तक आय हो रही है।

                            डोमिनोज और मैक्डोनल्ड सरीखे ब्रांड के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी छवि को बदलना है। अभी तक इसके खाद्य उत्पादों को कुलीन तबके से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन अब यह ब्रांड इन्हें आमजन तक पहुंचाना चाहते हैं। गौरतलब है कि 87 फीसदी भारतीय सड़क मार्ग से यात्रा करते हंै। ऐसे में इन जैसे ब्रांड के लिए जरूरी हो गया है कि वे त्वरित खाद्य पदार्थ देने वाले उत्पाद के तौर पर सड़क किनारे अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएं। इससे ही मध्य वर्ग कहीं आसानी के साथ इनसे जुड़ाव स्थापित कर पाएगा। इसी रणनीति पर देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे वैश्विक ब्रांड भी अमल कर रहे हैं। कॉफी वल्र्ड, पिज्जा कॉर्नर, क्रीम एंड फज ने इस रणनीति पर अमल करते हुए ही अपनी बिक्री में 15 फीसदी का इजाफा किया है। यानी आकार में छोटा और कीमत में सर्वसुलभ उत्पाद लोगों तक तेजी से पहुंच बना रहा है। 

Jul 30, 2012

=> विज्ञान की 7 महान खोजें जिन्होंने बदल दी दुनिया...




                            दुनिया के कण-कण के पीछे मौजूद हिग्स बोसॉन या गॉड पार्टिकल की बुधवार को जिनेवा में पुष्टि हुई। इससे भौतिकी का वह ‘शून्य’ मिल गया, जिससे सृष्टि की गिनती पूरी होती है। आइये.. जानें विज्ञान की उन सात महान खोजों को जिन्होंने हमारी दुनिया बदल दी.. 

वैक्सीनेशन:

                             17वीं सदी में यूरोप में हर साल चेचक से चार लाख लोगों की मौत होती थी। ऐसे में 1796 में ब्रिटिश वैज्ञानिक एडवर्ड जेनर ने पहली बार वैक्सीनेशन शब्द का इस्तेमाल किया। इसमें बीमारी को दूर करने के लिए बीमारी का ही इस्तेमाल किया गया। वायरस को शरीर में इंजेक्ट किया। ताकि शरीर में उससे लड़ने की ताकत विकसित हो सके। 

आज इस्तेमाल : सैकड़ों बीमारियों से बचा रहा है वैक्सीन।

इलेक्ट्रॉन आया, जिससे बनी बिजली 

1838 में पता चला था कि सब-एटॉमिक पार्टिकल इलेक्ट्रॉन का अस्तित्व है। लेकिन उसे साबित करने में 60 साल लग गए थे। इसके बाद ही बिजली का अविष्कार हो सका। टीवी और सीडी की तकनीक से लेकर कैंसर रोगियों के लिए रेडियोथेरेपी भी इसी की बदौलत सामने आई। 

आज इस्तेमाल: बिजली के बिना आज जिंदगी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। 

जीनोम सिक्वेंस मैपिंग
इंसानी शरीर के प्रत्येक जींस की मैपिंग की गई। 1990 में इंटरनेशनल ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट शुरू हुआ। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और चीन के वैज्ञानिक शामिल हुए। 2003 में जीनोम मैपिंग पूरी हो गई। 2009 में भारतीय वैज्ञानिकों ने देश में पहली बार जीनोम मैपिंग पूरी की। नई दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी ने दो साल की तैयारी के बाद 45 दिन में काम पूरा किया। 

आज इस्तेमाल: बीमारी की वजह, दवा का असर समझने में फायदेमंद। खास जीन से होने वाले नुकसान का पूर्व आकलन संभव।

पेनिसिलिन
स्कॉटिश वैज्ञानिक एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने 1921 में पहले एंटी-बायोटिक की खोज की। इंफ्लूएंजा वायरस पर शोध के दौरान पाया कि स्टेफीलोकोकस कल्चर प्लेट पर फंगस उगी हुई है। जांच में पता चला कि उसके आसपास का क्षेत्र बैक्टीरिया मुक्त है। 

आज इस्तेमाल: पेनिसिलिन कई मिश्रणों के साथ कई दवाओं में हैं। 

पहला सैटेलाइट
स्पूतनिक-1 पहला कृत्रिम उपग्रह था, जिसे रूस ने 4 अक्टूबर 1957 को लॉन्च किया। इससे स्पेस एज की शुरुआत हुई। अब इस दौड़ में अमेरिका, ब्रिटेन और चीन के साथ ही भारत भी शामिल हैं। रूस के यूरी गगारिन 12 अप्रैल 1961 को वोस्तोक यान के जरिए अंतरिक्ष में पहुंचे तो अमेरिकी नागरिक नील आर्मस्ट्रांग ने 20 जुलाई 1969 को चंद्रमा पर पहुंचने वाले पहले मानव बने। 

अब इस्तेमाल: मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी। पृथ्वी के वातावरण से समानता रखने वाले ग्रहों को खोजा जा रह है। 

स्टेम सेल थैरेपी
शरीर की कोशिकाएं ही बना लेंगी नए अंग। आइसोलेटिंग एम्ब्रायोनिक स्टेम सेल्स ऑफ ह्यूमन्स एंड प्रीमेट्स पर अमेरिकी वैज्ञानिक जेम्स थॉमसन ने पेटेंट लिया है। अब तक आंख, दिल, मस्तिष्क सहित कई अंगों की कोशिकाएं बनाई जा चुकी है। इलाज फिलहाल महंगा, लेकिन भविष्य में तकनीक सस्ती होने की उम्मीद। 

अब इस्तेमाल: क्लोनिंग के जरिए संभावनाओं को टटोला जा रहा है। कैंसर सहित कई जाबीमारियों से इलाज में मदद ली जा रही है। स्टेम सेल थैरेपी चिकित्सा के क्षेत्र में खासी मददगार साबित हो रही है। 

परमाणु बम
परमाणु बम बना तो विनाश के लिए था, लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल बेहतरी के लिए हो रहा है। 1940 में अमेरिका में यूरेनियम को रिफाइन कर एटम बम बनाने की तकनीक पर काम शुरू हुआ। इसे मैनहट्टन प्रोजेक्ट के रूप में जाना जाता है। 1945 में अमेरिका ने जापान के दो शहरों-हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए। हजारों लोग मारे गए। करोड़ों अब भी प्रभावित हैं। 

अब इस्तेमाल : परमाणु ऊर्जा अस्तित्व में आई। परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के मजबूत विकल्प के रूप में सामने आया। 

Jul 29, 2012

=> "किस" से सेहत सुधारें

                               नज़रें मिलती हैं, दिल धड़कता है और प्यार हो जाता है। यूं तो प्रेमियों के पास अपने प्यार को जताने के कई तरीके हैं, लेकिन सबसे दिलकश है किस। एक-दूसरे को किस करने का अहसास प्रेमियों को जोड़े रखता है। प्यार जताने का ये सबसे पुराना अहसास है। 
 
                              बीते 6 जुलाई को वर्ल्ड किसिंग डे मनाया गया। ये इंगलैंड से शुरू हुआ और फिर सारी दुनिया ने इसे अपना लिया। लेकिन किसिंग की शुरूआत कहीं न कहीं भारत से जुड़ती है। इसका ज़िक्र 3500 साल पुराने वेदों में मिलता है।
 
                              किस अगर आपको सुकून देता है, आपको प्यार का अहसास कराता है तो इसके कुछ शारीरिक फायदे भी हैं जो आपको स्वस्थ रखते हैं। फोटोफीचर में एक नज़र किसिंग से आपकी सेहत पर होने वाले फ़ायदों पर। 
स्वस्थ और मज़बूत दांतों के लिए ज़रूरी है किस। किस करने के दरम्यान मुंह में स्लाइवा ज़्यादा बनता है। इस स्लाइवा से दांतो को नुकसान पहुंचाने वाले बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं। किस करना कोई भारी कसरत तो नहीं कि इससे आप छरहरे हो जाएगें, लेकिन किस के दौरान एक मिनिट में आपकी 2 से 6 कैलोरी तक बर्न होती हैं। मानें या न मानें, ये एक छोटी-सी डाइट है। 

                                किसिंग को सिर्फ प्रेमियों और उनके सेक्सुअल प्लेज़र से ज़ोड़ कर नहीं देखा जा सकता। एक मां का अपने नवजात बच्चे को चूमना बच्चे को राहत देता है। एक जापानी शोध में पता चला है किसिंग से त्वचा संबधी एलर्जी में भी फायदा होता है। ये बात तो तय है कि दो लोगों के किस करने से उनके शरीर के बैक्टीरिया भी एक्सचेंज होते हैं। जब प्रेग्नेंट महिलाएं किसी को किस करती हैं तो उसके शरीर में किसी ख़तरनाक बैक्टीरिया के पहुंचने का खतरा होता है। लेकिन, रिर्सचरों ने माना हैं कि गर्भधारण करने के पहले किस से जो वायरस उनके शरीर में पहुंचते हैं, वे उनके शरीर को प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। इससे प्रेग्नेंसी के दौरान कोई बैक्टीरिया भ्रूण तक नहीं पहुंच पाता है। 

                                  आपके दिल को भी जवां रखती है किसिंग। किस करने से एड्रालाइन नाम का रसायन बनता है जो आपके दिल तक ख़ून पहुंचाता है। दिन में शारीरिक कसरत जैसे साइकिलिंग या एरोबिक्स के दौरान दिल पर पड़ने वाले प्रभाव एक किस के बराबर ही है। किसिंग से कम होता है स्ट्रेस। किसिंग एक स्ट्रेस बस्टर है। दिन में एक अच्छा किस आपके तनाव और निगेटिव एनर्जी को काफी हद तक कम करता है। दरअसल, किस करने से तनाव के लिए ज़िम्मेदार हार्मोन कोर्टिसोल के उत्सर्जन में कमी आती है, इससे आप अपने आपको तरो-ताज़ा महसूस करते हैं।

Jul 24, 2012

=> Khulasa News

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May 15, 2012

=> अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष महासम्मेलन का आयोजन

सम्मेलन में प० राजेश कुमार शर्मा
को ज्योतिषशास्त्री की मानद
उपाधि से मंच पर अलंकृत
 किया गया !
                          गाजियाबाद में राम जी जनसेवा संस्थान (रजि०) के द्वारा दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष महासम्मेलन का आयोजन दिनांक 12 व  13 मई 2012  को किया गया जिसमें देश के जाने माने ज्योतिषाचार्यों के साथ साथ विदेशों से भी ज्योतिषाचार्यों ने भाग लिया ! सम्मेलन में भ्रष्टाचार, भ्रूण हत्या, एवं तलाक जैसे प्रश्नों पर चर्चा हुई ! तलाक पर ज्योतिषाचार्यों  को सलाह दि गई कि गुणों के मिलान के साथ साथ कुन्डली के पंचम स्थान जो सन्तान का तथा सप्तम स्थान जो भोग का व्यापार का एवं भाग्य स्थान पर भी विचार किया जाना चाहिये ! सम्मेलन का संचालन प० सतेन्द्र भारद्वाज जी द्वारा किया गया लगभग 250 ज्योतिषाचार्यों ने भाग लिया जिसमें प्रमुख बखशीश सिंह बाबा- लूधियाना, अक्षय कुमार मोगा वाले, श्री मति नूर चौधरी, श्री मति संजू, प० राजेश कुमार शर्मा-मेरठ, ने भाग लिया! सम्मेलन में प० राजेश कुमार शर्मा को ज्योतिषशास्त्री की मानद उपाधि से मंच पर  अलंकृत  किया गया ! प० राजेश कुमार शर्मा का कहना है कि 17 मई 2012 को गुरू वृहस्पति वृषभ राशि मे प्रवेश करेंगे वृहस्पति प्रथम पंचम नवम व दशम भावों का कारक ग्रह है इन चार भावों में स्थित वृहस्पति मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष यह चार प्रकार के पुरूषार्थ प्रदान करता है !

Apr 25, 2012

=> 'बीहड़' में 'विकाश'

'द दर्टी पिक्चर' भले ही सबको मनोरंजक एवं मस्ती से भरपूर लगी हो मगर इसका दूसरा पहलू जो वालीवुड की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है , को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ! वालीवुड में हर रोज़ नई लड़कियाँ काम के लिए जाती है मगर उन्हें काम के नाम पर अस्वासन मिलता है ! उनको मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है !
      "बिद्या-बालन" का बोल्ड रवैया हमें बेशक सेक्सी लगता है परन्तु सच्चाई यह है की "बिद्या" द्वारा निभाया गया रोल उन तमाम लड़कियों का है जो ग्लैमरस दुनिया में जाने की इक्षुक जरूर हैं मगर उन्हें "शोषित" होना पड़ता है और अपनी इज्जत खोकर भी "इज्जत व प्रसिद्धि" पाने की तीब्र लालसा 'द दर्टी पिक्चर' में "बिद्या" द्वारा निभाए गए रोल से ज़रा भी जुदा नही है !

      पेस-ए-खिदमत है इसी फिल्म में "कास्टिंग डाइरेक्टर" का ससक्त किरदार निभाने वाले 'विकास श्रीवास्तव' जो इसी साल आने वाली फिल्म "बीहड़" में डाकू निर्भय सिंह के मुख्य किरदार के रूप में दर्सकों से रूबरू होंगे, से हमारे संबाददाता "त्रिनाथ मिश्र" से बातचीत के कुछ अंश, जो भबिष्य के चमकने वाले सितारे से आपको भलीभांति परिचित कराएगा-


Q-       सबसे पहले आप अपने और अपने परिवार के बारे में बताइये?
Ans-   मेरा जन्म सुलतान पुर, उत्तर प्रदेश में हुआ , पिता एडवोकेट लाल जी श्रीवास्तव और माँ डॉ.
           विकासवती का अहम् किरदार रहा मुझे एक्टर बनाने की राह पर ले जाने को! मेरे पैरेंट्स मुझे हमेशा
           प्रेरित करते रहते थे की मै बेहतरीन एक्टर बन सकता हूँ...अगर मै मेहनत से काम करू, और में आज
           तक वही कर रहा हूँ.......मैंने सातवी क्लास से रंगमंच शुरु किया जो आज मेरे जीवन को एक अहम्
           मोड़ पर ले-आकर खड़ा कर दिया है !

Q-        पहला "ब्रेक-अप" कब मिला? किस फिल्म में मिला? किसने दिया?
Ans-    पहली फिल्म राजेश सेठ की "यथार्थ" थी और उसके बाद प्रकाश झा की "गंगाजल" .......बस  
            सिलसिला शुरू हो गया !

Q-       सबसे पहली फिल्म में आपका किरदार क्या था और कितनी देर का था?
Ans-   मेरी पहली फिल्म यथार्थ में मेरा रोल एक विलन का था जो हिरोइन श्रद्धा निगम के पीछे पड़ा रहता था
           .......५-६ सीन थे इस फिल्म में....!

Q-        अब तक कितनी फ़िल्में कर चुके हैं? उनके नाम और उनमें आपका क्या रोल है?
Ans-    अब तक कुल २० फिल्मे की है मैंने जिनमें  कुछ इस प्रकार हैं -
            द दर्टी पिक्चर में कास्टिंग डाइरेक्टर
            बिल्लू बार्बर में विलन 
            वंस अपान ए टाइम में  वर्गिश भाई…
            हम तुम और शबाना में मकबूल भाई …
            शैतान में इंस्पेक्टर  पाटिल …
            चिंगारी में दरोगा ….
            वांटेड में पुलिस ऑफिसर…
            फूँक 2.में बालू …
            कांट्रेक्ट में रा -  एजेंट…
            बरहाना में विलन…
            रेड  अलर्ट में नक्सलाईट…
            गंगाजल में विलन …. 
            मनी है तो हनी है में बैड मैन…
            रावन में…राईट मैन अभिषेक के साथ  
            हांटेड में पुलिस ऑफिसर…
            एक्शन रिप्ले में रमन राघवन…

Q-       आपकी नजर में आपका अब तक का सबसे अच्छा रोल कौन सा है?
Ans-   सबसे ज्यादा तारीफ़ तो 'द दर्टी पिक्चर' के लिए ही हो रही है...........कास्टिंग डाइरेक्टर के रोल में....

Q-       खाली समय में क्या करना पसंद करते हैं?
Ans-   मै पूरी दुनिया की फ़िल्में देखता हूँ...जो भी मेरी इनकम होती है उनसे मै फ़िल्में खरीदता हूँ....मेरे पास  
           लगभग ५००० वर्ल्ड क्लास मूवी होंगी...मुझे किताबें भी पसंद हैं खासकर कहानियाँ और गज़लें    
          ........'जिंदगी बहुत छोटी है और दुनिया बहुत बड़ी है ...हर समय ज्ञान ढूँढता रहता हूँ....एक ख्याल    
          आपकी जिंदगी बदल सकता है इसलिए किताबें मेरी सबसे अच्छी दोस्त है.......

Q-        अपने जन्मभूमि के बारे में क्या कहना चाहेंगे और वहाँ की सबसे अच्छी चीज क्या है आपकी
            नजरों में?
Ans-    'जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी...' मेरी जन्मभूमि सुल्तानपुर स्वर्ग तो नही लेकिन उससे
            कम भी नहीं है ....सच्चे लोग...मिट्टी की खुसबू....इमली का खट्टापन....आम का मिठास....शहर में
            कन्धा देने के लिए भी लोग नहीं मिलते....मगर गाँव मै आग लग जाने पर पूरा गाँव एकत्र होकर उसे
            बुझाने का प्रयास करता है...! गाँव की याद दिला दिया आपने मुझे........वो कल्चर, अपनापन, वो भाई
            -चारा ......!


Q-        क्या आप आधुनिक फिल्मो के "Content" and "Presentation" से सहमत है? क्यों?
Ans-     आज का सिनेमा आज की कहानियाँ कह रहा है ...काफी डाइरेक्टर कहानियों पर ध्यान नही दे रहे
            हैं......सुधर जायेंगे....यहाँ हर फ्राईडे तकदीर बदलती है दोस्त.....कुछ लोग कमाल कर रहे हैं...प्रस्तुति
            तो अदभुत है ...मनोरंजक है...!


Q-        भविष्य की योजनाओं के बारे में बताइये?
Ans-     मैं दुनिया के सबसे बेहतरीन एक्टर्स मै अपना नाम सबसे ऊपर देखना चाहता हूँ ! एक सपना है खुली
            आँखों से देख रहा हूँ...अपने ख़्वाबों को ताबीर देने की कोशिशें कर रहा हूँ........बस....!

Q-         युवा पढ़ी के लिए क्या सन्देश देंगें?
Ans-     वो करो जो आपका दिल कहता है.....एक जिंदगी मिली है खुलकर जिओ...!

Q-          फिल्मो में काम करने की प्रेरणा किससे मिली?
Ans-      हालीवुड एक्टर "मार्लोन ब्रांडो" मेरी प्रेरणा है.....!

Q-          लाइफ का "Turning-Point" क्या रहा?
Ans-      अभी तक मिला नही.......हा..हा..हा..हा..

Q-           आपकी आगामी फिल्में कौन सी है? और उनमें किन-किन रूपों में दिखेंगे आप दर्शको को?
Ans-       मेरी सबसे बड़ी फिल्म "बीहड़" 2012  मै आ रही है...इसमे मेरा मुख्य किरदार है...डाकू निर्भय
               सिंह गुर्जर के जिंदगी पर आधारित है यह फिल्म .....! आमिर खान के फिल्म मै विलन हूँ....! विक्रम
               भट्ट की अगली फिल्म डैंजरस-इश्क मै करिश्मा कपूर के साथ पुलिस आफिसर हूँ........!

Q-           आपके जीवन का सबसे खुसहाल समय क्या है?
Ans-       जब-जब पापा कहते हैं "गुड वर्क विकास"

Q-           अगर आपको फिल्म बनाना पड़े तो किस बिषय पर आधारित फिल्म बनाने को प्राथमिकता देंगे
               आप?
Ans-       आम आदमी की जिंदगी और उनकी समस्याओं पर आधारित फिल्मे बनाना चाहूँगा...!

Q-           फिल्मो में आने का मकसद क्या है?
Ans-        एक चेहरा जिसे पूरी दुनिया पहचाने....प्यार करे...!  "I am the best let me the prove"


                             आपका बहुत-बहुत धन्यबाद विकाश श्रीवास्तव जी, के आपने हमें अपने बारे में इतना कुछ बताया, हम आशा करते हैं की आने वाले दिनों में  आप लोगों की धडकनों का राज़ बन सको.......आपको इश्वर बहुत-बहुत आशीष प्रदान करे  ! आपके चाहने वालों की तरफ से आपको नमस्कार !




                                                                                                      - त्रिनाथ मिश्रा
                                                                                                     09889651678 

Apr 13, 2012

=> या तो शून्य या फिर शौ फ़ीसदी

            अगर आपके पास किसी कार्य को करने के लिए ज्यादा लोग नहीं है तो घबड़ाने की कोई बात नही है ! ज्यादा लोग यानि ज्याद विनाश ? स्पेशिंग जितनी ज्यादा होगी उतना ही अच्छा होगा आपके लिए , उतना ही खिल कर / खुल कर काम कर पायेंगे आप! भीरू लोगों की आवश्यकता नही है, कायर लोगो की  आवश्यकता  नही है क्योंकि वो हमारे लिए ही घातक होंगे ? दूसरी बात हमें ऐसे लोगो की भी  आवश्यकता नही है जो खुद को साहसी और बलवान मानते है ? हमें उन ब्यक्तियों से संपर्क रखना चाहिए जो बागी हैं , दिलेर हैं जिनके रगों में संकट से उलझकर फतह पाने का तीक्ष्ण अनुभव है , जो वास्तविक तौर पर निर्भीक हैं ?
            हमें बीती तस्बीर दिखाने वालों की भी आवश्यकता नहीं है , हमें भविष्य वक्ताओं की भी जरूरत नहीं है? हमें सिर्फ वर्तमान उपभोक्ताओं की जरूरत है , जो Prasent  में जीते हैं जो सोच को कार्य रूप देते हैं ? जरा गहराई से समझें इसे  -    कृष्ण पक्ष की अर्ध-रात्रि का समय है गाँव का एक व्यक्ति घर से बाहर निकलता है और अचानक उसे कुछ दिखाई पड़ता है जिससे वो चीखने लगता है, पल भर में सैकड़ों की भीड़ जमा हो गयी लोग समझते है की ये तो शेर है जो गाँव की तरफ ही आ रहा है ............
           भीड़ का कुछ हिस्सा जो खुद को बलवान मानता था, रौब में बोला चलो इसे मार देते हैं ..........
           भीड़ का कुछ हिस्सा जो भीरु और डरपोक है वो कहता है की जान बचाओ यहाँ से भाग निकालो...........
           लेकिन समस्या का हल न तो शेर मारने से होगा और न ही भागने से ?
तो आप सोच रहे होंगे की क्या करना चाहिए ? क्या कोई भीच का रास्ता है ?
           अरे नहीं नहीं ...........मुझे बीच के रस्ते यानी शोर्टकट से सख्त नफरत है ? मै या तो शून्य यानि जीरो या फिर शौ फ़ीसदी यानि 100 % पर यकीन करता हूँ .......या तो भाग जाओ तब बचोगे या फिर जूझ जाओ तब जीतोगे...........
            सही मायने में हम सब ये सोच कर गलतफहमी में हैं ........
            हमें सिर्फ धैर्य रखना होगा ...Patienc only  मन में फौलादी इरादा और आत्मा में साहस और धैर्य रखकर उसे परखना होगा... उसकी तरफ जाना होगा ... उसे समझाना होगा ......
           भीड़ का कुछ हिस्सा इसी प्रकृति की थी जिसने सिर्फ धैर्य रखा ...दिल को मजबूत बनाकर .....और पाया की अरे ये तो शेर नहीं खेत में फसल की रखवाली के खड़ा किया किया गया एक "पुतला" है ?
           मामला साफ़ हो गया ..........कायरों अब न तो तुम्हे भागने की जरूरत है और न ही बलवानों को इससे भिड़ने की जरूरत है ...........
           आप की राय क्या है? हमें जरूर बताएं...............

                                                                                                   e-mail me at- tnraj007@gmail.com 

Apr 7, 2012

=> पहले 'खुद' तब "खुदा"

                                     भय से ही लोग मंदिर में जाते हैं , की कहीं हमारे साथ गड़बड़ न हो जाये !   हे भगवान, मुझे और मेरे परिवार वालों को दुखों से बचाना, कष्टों से उबरना तथा सुख की बारिश करना..........है न बुद्धूपन .......अरे यह तो किसी अजनवी से रूपये माँगने के जैसा है!  पहले  ईश्वर  को जानो- पहचानो, ज़रा मेल-जोल करो ठीक से समझो ...तब तो वह तुम्हे "लिफ्ट" देगा ! हमने 'उसे' पहचाना नहीं और चल दिए सुख माँगने, चल दिए भक्त बनने....कोई फायदा नहीं है ऐसे फरियाद से .......नहीं सुनेगा 'वो' तुम्हे इस तरह........
                                       सवाल है की पाया कैसे जय ईश्वर को? पाना है तो खोना पड़ेगा ! समय देना पड़ेगा , और हा पोंगा पंडित, ढोंगी बाबा और झूठे मौलानाओं से तौबा करना पड़ेगा ! पत्थर के सामने न झुककर, मजार के सामने मत्था न टेक कर हमें  'खुद'  के सामने झुकना पड़ेगा ! पहले 'खुद' तब "खुदा" ! अल्लाह, भगवान, ईश्वर, खुदा ने हमें जिस मिट्टी से बनाया है उसकी कीमत समझनी होगी......मगर हम तो इतने अभिमानी हैं की खुद मिट्टी से मूर्तियों का निर्माण करते हैं और खुद उसके सामने घंटों बैठ कर ये फरियाद करते हैं की - हे भगवान मेरे दुखों को दूर कर दे ! खुदा भी हँसता होगा हमारी नासमझी पर , की कैसे मुर्ख हैं ये सारे मनुष्य? एक शेर याद आ रहा है -

                                   किसकी कीमत समझूं ऐ खुदा तेरे इस जहां में 
                             "तू" मिट्टी से इंसान बनता हैं और वो मिट्टी से "तुझे"

Mar 29, 2012

बदहाल "चौथा स्तम्भ"

Option Instead of GUN
                            सबसे ज्यादा बिश्वास पत्र का तमगा लिए हुए लोकतंत्र का "चौथा स्तम्भ" बदहाल स्थिति में पंहुचने के कगार पर है, समाज को आइना दिखाने वाले पत्रकार को अब खुद आइना देखने की जरूरत महसूस हो रही है! एक तरफ अन्ना का जनांदोलन चल रहा है तो दूसरी तरफ मीडिया का लोंगो को हाई-लाइट और बदहाल करने की कोशिस ! ब्यवसाय  में परिवर्तित मीडिया का चेहरा अब कुरूप हो रहा है, सत्यता लगभग अंत की ओर है ! मीडिया की चमक - धमक से प्रभावित होकर इशमे कैरियर बनाने को उत्सुक युवा गुमराह किये जा रहे हैं, जब कोई लड़का किसी संस्था में नौकरी लेने जाता है तो उसे मीडिया की पावर बताकर  इसकी चमक-धमक से प्रभावित करके अधिकारियों से सम्बन्ध बनाने का स्वप्न दिखाकर फ्री में काम कराने की चेष्टा की जाती है , उसे पैसा कमाने के अबैध तरीकों को झरोंखों से दिखाया जाता है और इन्ही तमाम गलत औधाराड़ाओ के बीच "नन्हा पत्रकार" अपने मिशन से भटककर ब्यवसायिक  पत्रकारिता की राह पकड़ लेता है !  और अब ऐसी स्थिति आ जाती की उसकी काबिलियत डगमगा जाती है और वो इधर से उधर पैसा कमाऊ उलझन में डूबता तैरता है !
                             अभी-अभी चुनाव खत्म हुआ है इसमें तमाम पत्र - पत्रिकाएँ पक्षपाती रूख अख्तियार किये हुए थी वहीँ पर टी.वी. चैनल्स के पत्रकार "टुकड़ों" पर घूमते नजर आये ! कोई भी Byte  या विसुअल टी.वी. पर चलाने से पहले समाज के सफेद्पोस ठेकेदारों को इस लालच में दिखाया जाता था की कुछ पैसे मिल जाये, जहां से पैसे मिलते थे उनकी न्यूज़ चलती थी , छपती थी वहीं दूसरी तरफ चुनाव में खड़े ऐसे प्रत्यासी जो इमानदार, बेदाग और शिक्षित हैं उनका जिक्र करना  अपराध मानते थे ये सब ! ज्यादातर बेईमान आदमी पत्रकारिता में पाँव पसार रहा है जो इस बात का सुबूत है की यह "मिशन" रुपी समाजसेवा अब पिछलग्गू  बनकर चलने को मजबूर है और दोयम दर्जे के व्यक्ति जो पत्रकारिता की आड़ लिए हुवे हैं वो "नन्हे पत्रकारों" को मानसिक और शारीरिक स्तर पर बखूबी परेशान कर रहे हैं!
                              नेता, गुंडा, बदमाश के हांथो मीडिया की "पावर" लगभग जा चुकी है या फिर बड़े पोस्ट पर भी यही ब्लैकमेलर काबिज़ हुए जा रहे हैं! मीडिया हमेशा पुलिस बिभाग पर अंगुली उठती है मगर अब तो ऐसा लगने लगा है की पुलिस की पहचान तो बनी हुयी है मगर मीडिया की पहचान धूमिल; हो रही है!    
                              कुछ व्यक्ति समर्पित दिखते हैं मगर उनके साथ समस्या है, उनकी उम्र इस अवस्था में आ गयी है की सीखना अब  बेइज्जती लगता है और आगे इसलिए नही जा पाते क्योंकि तकनीकी जानकारी के साथ सामायिक जानकारी का अभाव है, इस तरह अब सिखने में बेइज्जती होगी और आगे इसलिए नही जा पाते क्योंकि समय के साथ इन्होने कुछ सीखा ही नहीं अब बस एक ही रास्ता है की आड़े तिरछे चलते रहो क्योंकि छोड़ दिए तो भी  बेइज्जती , और ऐसे ही लोग उगाही के चक्कर में पड़ते हैं !
                              "मिशन" से भटकने की एक वजह मीडिया की टॉप-पोस्ट पर बैठा भ्रष्ट ब्यक्ति भी है क्योंकि जब कोई खबर मेहनत कर के लायी जाती है तो संपादक का सम्मान लिए हुए ये अशिक्षित और भ्रष्ट एक्सपेरिएंस  वाले पत्रकार इन खबरों पर बिजिनेस करते हैं और खबर न तो पेपर में छप पाती है और न ही टी.वी. पर दिख पाता है और तो और इस खबर का क्रेडिट भी रिपोर्टर को नही जाता, इस वजह से व्यक्ति के काम करने की इक्षा समाप्त हो जाती है और वो नीरस तरीके से न्यूज़ बटोरता है!
                               
                              बड़ी पोस्ट पर बैठे हमारे सम्मानित - अशिक्षित - अनुभवी पत्रकार-गण जो स्वयं को माइक और कैमरे के सामने ब्यक्त नहीं कर सकते वो काबिल युवायों को इस वजह से आगे नही जाने देते क्योंकि उन्हें खुद पीछे छूटने का भय सताता है, खुद को अधूरा होने के बावजूद बड़े बने रहने के संघर्ष में नयी प्रतिभाएं कुचली जा रही हैं, क्योंकि कालेज से पढाई कर के निकलने वाला युवक पैसों की वजह से मात खा जाता है, और मीडिया में पहले से काबिज़ असभ्य पत्रकार भाई इन्हें आश्वासन देते हैं की "त्रिनाथ जी मीडिया में पैसे मिलते नहीं कमाए जाते हैं "
                             
                                जो ब्यक्ति यह समझते हैं की मीडिया में "अनुभव" मायने रखता है उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए की पत्रकारिता का आधार पढाई और बर्तमान परिस्थियों से खुद को अपडेट रखने से ज्याद मजबूत होता है! अपनी काबिलियत का ढिंढोरा पीटने वाले "कटु-पत्रकार" जब सभी जगह फेल होते नजर आते हैं तो खुद का अखबार, मैगज़ीन या टी.वी.चैनल खोल लेते हैं, मगर समय की डोर सबकी पोल खोल देती है और सबको बेनकाब कर ही देती है! कुछ ऐसे ही संपादक रुपी मायाबी परिंदे तो ऐसे हैं जो ठगने की नयी नयी तरकीबें सोच लेते हैं! बिज्ञापन प्रकाशित करते हैं की आवश्यकता है जुनूनी और सामाजिकता में रूचि रखने वाले तथा अनुभवी पत्रकारों की बेतन योग्यतानुसार !  मगर आश्चर्य तो तब होता है जब सालों तक हजारों लोंगो के आने बाद भी उन्हें कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिलता , अब वो नौकरी देने के एवज में सबसे मोटी रकम वसूलते हैं और इस तरह उन्हें अपने अखबार / मैगज़ीन के लिए एक और "जबरदस्ती वाला " ग्राहक मिल जाता है ! उनके मैगज़ीन पर किसी मामले में सवाल उठाने पर उन्हें अपनी संपादन की झूठी कुशलता की तवहीनी दिखाई पड़ती है और वो सवाल उठाने वाले को किसी भी स्तर पर ठेंस पहुचाने की ठान लेते हैं! और जहां पर जिद आ जाती है वहाँ पर quality  को बनाए रखना असंभव कार्य हो जाता है! 
                               मेरा अनुभव बहुत छोटा है मगर जो कुछ भी है मैंने इस लेख में वही लिखा है! इसके बारे में हमें अपनी राय अवश्य बताएं , यदि इस लेख को पढ़ रहे किसी पत्रकार भाई को गुस्सा आ रहा है तो इसका मतलब की यह लेख बिलकुल सही आदमी के पास पहुंचा है !
- त्रिनाथ मिश्र 
tnraj007@gmail.com

Jan 7, 2012

=> शिक्षक विद्रोह सिखाते हैं


                   मेरी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति ठीक अर्थों में शिक्षक तभी हो सकता है जब उसमें विद्रोह की एक अत्यंत ज्वलंत अग्नि हो। जिस शिक्षक के भीतर विद्रोह की अग्नि नहीं है वह केवल किसी न किसी निहित, स्वार्थ का, चाहे समाज, चाहे धर्म, चाहे राजनीति, उसका एजेंट होगा। शिक्षक के भीतर एक ज्वलंत अग्नि होनी चाहिए विद्रोह की, चिंतन की, सोचने की। लेकिन क्या हममें सोचने की अग्नि है और अगर नहीं है तो आप भी एक दुकानदार हैं। शिक्षक होना बड़ी और बात है। शिक्षक होने का मतलब क्या है? क्या हम सोचते हैं-आप बच्चों को सिखाते होंगे, सारी दुनिया में सिखाया जाता है बच्चों को, बच्चों को सिखाया जाता है, प्रेम करो! लेकिन कभी आपने विचार किया है कि आपकी पूरी शिक्षा की व्यवस्था प्रेम पर नहीं, प्रतियोगिता पर आधारित है। किताब में सिखाते हैं प्रेम करो और आप की पूरी व्यवस्था, पूरा इंतजाम प्रतियोगिता का है।
                   जहां प्रतियोगिता है वहां प्रेम कैसे हो सकता है। जहां काम्पिटीशन है, प्रतिस्पर्धा है, वहां प्रेम कैसे हो सकता है। प्रतिस्पर्धा तो ईर्ष्या का रूप है, जलन का रूप है। पूरी व्यवस्था तो जलन सिखाती है। एक बच्चा प्रथम आ जाता है तो दूसरे बच्चों से कहते हैं कि देखो तुम पीछे रह गए और यह पहले आ गया। आप क्या सिखा रहे हैं? आप सिखा रहे हैं कि इससे ईर्ष्या करो, प्रतिस्पर्धा करो, इसको पीछे करो, तुम आगे आओ। आप क्या सिखा रहे हैं? आप अहंकार सिखा रहे हैं कि जो आगे है वह बड़ा है जो पीछे है वह छोटा है। लेकिन किताबों में आप कह रहे हैं कि विनीत बनो और किताबों में आप समझा रहे हैं कि प्रेम करो; और आपकी पूरी व्यवस्था सिखा रही है कि घृणा करो, ईर्ष्या करो, आगे निकलो, दूसरे को पीछे हटाओ और आपकी पूरी व्यवस्था उनको पुरस्कृत कर रही है। जो आगे आ रहे हैं उनको गोल्ड मेडल दे रही है, उनको सर्टिफिकेट दे रही है, उनके गलों में मालाएं पहना रही है, उनके फोटो छाप रही है; और जो पीछे खड़े हैं उनको अपमानित कर रही है। तो जब आप पीछे खड़े आदमी को अपमानित करते हैं तो क्या आप उसके अहंकार को चोट नहीं पहुंचाते कि वह आगे हो जाए? और जब आगे खड़े आदमी को आप सम्मानित करते हैं तो क्या आप उसके अहंकार को प्रबल नहीं करते हैं? क्या आप उसके अहंकार को नहीं फुसलाते और बड़ा करते हैं? और जब ये बच्चे इस भांति अहंकार में, ईर्ष्या में, प्रतिस्पर्धा में पाले जाते हैं तो यह कैसे प्रेम कर सकते हैं। प्रेम का हमेशा मतलब होता है कि जिसे हम प्रेम करते हैं उसे आगे जाने दें। प्रेम का हमेशा मतलब है, पीछे खड़े हो जाना।
                    एक छोटी सी कहानी कहूं, उससे खयाल में आए। तीन सूफी फकीरों को फांसी दी जा रही थी और दुनिया में हमेशा धार्मिक आदमी संतों के खिलाफ रहे हैं। तो धार्मिक लोग उन फकीरों को फांसी दे रहे थे। तीन फकीर बैठे हुए थे कतार में। जल्लाद एक-एक का नाम बुलाएगा और उनको काट देगा। उसने चिल्लाया कि नूरी कौन है, उठ कर आ जाए। लेकिन नूरी नाम का आदमी तो नहीं उठा, एक दूसरा युवक उठा और वह बोला कि मैं तैयार हूं, मुझे काट देंगे। उसने कहा: लेकिन तेरा तो नाम यह नहीं है। इतनी मरने की क्या जल्दी है? उसने कहा: मैंने प्रेम किया और जाना कि जब मरना हो तो आगे हो जाओ और जब जीना हो तो पीछे हो जाओ। मेरा मित्र मरे, उसके पहले मुझे मर जाना चाहिए। और अगर जीने का सवाल हो तो मेरा मित्र जीए, उसके पीछे मुझे जीना चाहिए।
                     प्रेम तो यही कहता है, लेकिन प्रतियोगिता क्या कहती है? प्रतियोगिता कहती है, मरने वाले के पीछे हो जाना और जीने वाले के आगे हो जाना। और हमारी शिक्षा क्या सिखाती है? प्रेम सिखाती है या प्रतियोगिता सिखाती है? और जब सारी दुनिया में प्रतियोगिता सिखाई जाती हो और बच्चों के दिमाग में काम्पिटीशन और एंबीशन का जहर भरा जाता हो तो क्या दुनिया अच्छी हो सकती है? जब हर बच्चा हर दूसरे बच्चे से आगे निकलने के लिए प्रयत्नशील हो, और जब हर बच्चा हर बच्चे को पीछे छोड़ने के लिए उत्सुक हो, बीस साल की शिक्षा के बाद जिंदगी में वह क्या करेगा? यही करेगा, जो सीखेगा वही करेगा। हर आदमी हर दूसरे आदमी को खींच रहा है कि पीछे आ जाओ। नीचे के चपरासी से लेकर ऊपर के राष्ट्रपति तक हर आदमी एक-दूसरे को खींच रहा है कि पीछे आ जाओ। और जब कोई खींचते-खींचते चपरासी राष्ट्रपति हो जाता है तो हम कहते हैं, बड़ी गौरव की बात हो गई। हालांकि किसी को पीछे करके आगे होने से बड़ा हीनता का, हिंसा का कोई काम नहीं है। लेकिन यह वायलेंस हम सिखा रहे हैं, यह हिंसा हम सिखा रहे हैं और इसको हम कहते हैं, यह शिक्षा है। अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में युद्ध होते हों तो आश्चर्य कैसा! अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में रोज लड़ाई होती हो, रोज हत्या होती हो तो आश्चर्य कैसा! अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में झोपड़ों के करीब बड़े महल खड़े होते हों और उन झोपड़ों में मरते लोगों के करीब भी लोग अपने महलों में खुश रहते हों तो आश्चर्य कैसा! इस दुनिया में भूखे लोग हों और ऐसे लोग हों जिनके पास इतना है कि क्या करें, उनकी समझ में नहीं आता। यह इस शिक्षा की बदौलत है, यह इस शिक्षा का परिणाम है। यह दुनिया इस शिक्षा से पैदा हो रही है और शिक्षक इसके लिए जिम्मेवार है, और शिक्षक की नासमझी इसके लिए जिम्मेवार है। वह शोषण का हथियार बना हुआ है। वह हजार तरह के स्वार्थों का हथियार बना हुआ है, इस नाम पर कि वह शिक्षा दे रहा है, बच्चों को शिक्षा दे रहा है!
अगर यही शिक्षा है तो भगवान करे कि सारी शिक्षा बंद हो जाए तो भी आदमी इससे बेहतर हो सकता है। जंगली आदमी शिक्षित आदमी से बेहतर है। उसमें ज्यादा प्रेम है और कम प्रतिस्पर्धा है, उसमें ज्यादा हृदय है और कम मस्तिष्क है; लेकिन इससे बेहतर वह आदमी है। लेकिन हम इसको शिक्षा कह रहे हैं! और हम करीब-करीब जिन-जिन बातों को कहते हैं कि तुम यह करना, उनसे उलटी बातें हम, पूरा सरंजाम हमारा, उलटी बातें सिखाता है!              
                                                                     ………….Osho

=> हिसाब

सिखाये गुर निशाने बाजी के, मुझपे साधेगा निशाना कितना
तुमने ढाये हैं सितम हमपे , हमने कयामत किया है जितना
                               आओ कर लें हिसाब बैठ के मयखाने में