Jun 27, 2014

=> धर्म के सहारे अधर्म का स्वागत


एक यात्रा की बात है। कुछ वृद्ध स्त्री-पुरुष तीर्थ जा रहे थे। एक संन्यासी भी उनके साथ थे। मैं उनकी बात सुन रहा था। संन्यासी उन्हें समझा रहे थे, 'मनुष्य अंत समय में जैसे विचार करता है, वैसी ही उसकी गति होती है। जिसने अंत संभाल लिया, उसने सब संभाल लिया। मृत्यु के क्षण में परमात्मा का स्मरण होना चाहिए। ऐसे पापी हुए हैं, जिन्होंने भूल से अंत समय में परमात्मा का नाम ले लिया था और आज वे मोक्ष का आनंद लूट रहे हैं।'
          संन्यासी की बात अपेक्षित प्रभाव पैदा कर रही थी। वे वृद्धजन अपने अंत समय में तीर्थ जा रहे थे और मनचाही बात सुन उनके हृदय फूले नहीं समाते थे। सच ही सवाल जीवन का नहीं, मृत्यु का ही है और जीवन-भर के पापों से छूटने को भूल से ही सही, बस परमात्मा का नाम लेना ही पर्याप्त है। फिर वे भूल से नहीं जान-बूझकर तीर्थ जा रहे थे।
       मैं उनके सामने ही बैठा था। संन्यासी की बात सुनकर हँसने लगा तो संन्यासी ने सक्रोध पूछा, 'क्या आप धर्म पर विश्वास नहीं करते हैं?'
       मैंने कहा, 'धर्म कहाँ है? अधर्म के सिक्के ही धर्म बनकर चल रहे हैं। खोटे सिक्के ही विश्वास माँगते हैं, असली सिक्के तो आँख चाहते हैं। विश्वास की उन्हें आवश्‍यकता ही नहीं। विवेक जहाँ अनुकूल नहीं है, वहीं विश्वास माँगा जाता है। विवेक की हत्या ही तो विश्वास है। लेकिन न तो अंधे मानने को राजी होते हैं कि अंधे हैं और न विश्वासी राजी होते हैं। अंधों ने और अंधों के शोषकों ने मिलकर जो षड्‍यंत्र किया है, उसने करीब-करीब धर्म की जड़ काट डाली है। धर्म की साख है और अधर्म का व्यापार है।
       यह जो आप इन वृद्धों को समझा रहे हैं, क्या उस पर कभी विचार किया है? जीवन कैसा ही हो, बस अंत समय में अच्छे विचार होने चाहिए? क्या इससे भी अधिक बेईमानी की कोई बात हो सकती है। और क्या यह संभव है कि बीज नीम के, वृक्ष नीम का और फल आम के लगा रहे हैं?
       जीवन जैसा है, उसका निचोड़ ही तो मृत्यु के समय चेतना के समक्ष हो सकता है। मृत्यु क्या है? क्या वह जीवन की ही परिपूर्णता नहीं है? वह जीवन के विरोध में कैसे हो सकती है? वह तो उसका ही विकास है। वह तो ‍जीवन का ही फल है। ये कल्पनाएँ काम नहीं देंगी कि पापी अजामिल मरते समय अपने लड़के नारायण को बुला रहा था और इसलिए भूल से भगवान का नाम उच्चारित हो जाने से सब पापों से मुक्त हो मोक्ष को प्राप्त हो गया था।
        मनुष्य का पापी मन क्या-क्या अविष्कार नहीं कर लेता है? और इन भयभीत लोगों का शोषण करने वाले व्यक्ति तो सदा ही मौजूद हैं। फिर भगवान का क्या कोई नाम है? भगवान की स्मृति तो एक भावदशा है। अहंकार-शून्यता की भावदशा ही परमात्मा की स्मृति है। जीवन भर अहंकार की धूल को जो स्वयं से झाड़ता है, वही अंतत: अहं-शून्यता के निर्मल दर्पण को उपलब्ध कर पाता है। यह भूल से किसी नाम के उच्चारण से तो हो नहीं सकता।
         यदि कोई किसी नाम को भगवान मानकर जीवन भर धोखा खाता रहे तो भी उसकी चेतना भगवत-चैतन्य से भरने की बजाय और जड़ता से ही भर जाएगी। किसी भी शब्द की पुनरुक्ति-मात्र, चेतना को जगाती नहीं, और सुलाती है। फिर अजामिल पता नहीं अपने नारायण को किसलिए बुला रहा था। बहुत संभव तो यही है कि अंत समय को निकट जानकर अपने जीवन की कोई अधूरी योजना उसे समझा जाना चाहता हो। अंतिम क्षणों में स्वयं के जीवन का केंद्रीय तत्व ही चेतना के समक्ष आता है और आ सकता है।'
          फिर एक घटना भी मैंने उनसे कही। एक वृद्ध दुकानदार मृत्युशय्या पर पड़ा था। उसकी शय्या के चारों ओर उसके परिवार के शोकग्रस्त व्यक्ति जमा थे। उस वृद्ध ने अचानक आँखें खोलीं और बहुत विकल होकर पूछा, 'क्या मेरी पत्नी यहाँ है?'
          उसकी पत्नी ने कहा, 'हाँ मैं यहाँ हूँ।'
'और मेरे बड़ा लड़का?'
'वह भी है।'
'और बाकी पाँचों लड़के?'
'वे भी हैं।'
'और चारों लड़कियाँ?'
'सभी यहीं हैं। तुम चिंता न करो और आराम से लेट जाओ,' पत्नी ने कहा।
मरणासन्न रोगी ने बैठने की कोशिश करते हुए कहा, 'फिर दुकान पर कौन बैठा है?'

=> नई पीढ़ी के पैगम्बर, दबंगों के भरोसे हैं

  • अशोक रावत
न भूखों के भरोसे हैं, न नंगों के भरोसे हैं, 
सियासत के खिलाड़ी आज दंगों के भरोसे हैं। 

भरोसा बाजपेयी, लोहिया,गाँधी पे किसको है,
नई पीढ़ी के पैगम्बर, दबंगों के भरोसे हैं। 

बदलते क्यों नहीं हैं लोग इस गंदी सियासत को, 
जो पैंसठ साल से लुच्चे-लफ़ंगों के भरोसे हैं। 

भरोसा मत करो इन बेइमानों की नसीहत पर,
हमारे ख़्वाब आज़ादी के रंगों के भरोसे हैं।

उधर बेशर्म लोगों की फरेबों से भरी दुनिया,
इधर ये नौजवाँ हैं जो उमंगों के भरोसे हैं। 

=> कहीं ज़ुल्मो-सितम सहने के हम आदी न हो जायें

  • अशोक रावत
हमारी चेतना पर आँधियाँ हाबी न हो जायें,
कहीं ज़ुल्मो-सितम सहने के हम आदी न हो जायें।
         कहीं ऐसा न हो जाये भुला ही दें परिंदों को,
         कहीं ये पेड़ कटने के लिये राज़ी न हो जायें।
डुबो दें बीच दरिया में हमारी नाव ले जा कर,
तमाशा देखनेवाले कहीं माँझी न हो जायें।
          हमें डर है अहिंसा, प्रेम, करुणा, दोस्ती, ईमान,
         बदलते दौर में अलफ़ाज़ ये गाली न हो जायें।
कहीं ये गौडसे इतिहास का नायक न हो जाये,
कहीं मायूस इस इतिहास से गाँधी न हो जायें।

=> ये कारोबार में उलझे हुए लोगों की दुनिया है


  • अशोक रावत
मदद के वास्ते खुलकर मना कोई नहीं करता,
हलफ़ तो सब उठाते हैं वफ़ा कोई नहीं करता।

उसे आकाश में उड़ने के सपने तो दिखाते हैं,
मगर पिंजरे से पंछी को रिहा कोई नहीं करता।

दुआ में हाथ तो अब भी उठाते हैं मेरे अपने,
मेरे हक़ में मगर दिल से दुआ कोई नहीं करता।

ये कारोबार में उलझे हुए लोगों की दुनिया है,
निगाहें फेर लेते है, दया कोई नहीं करता।

ज़रा सी बात हो सब दिल में लेके बैठ जाते हैं,
किसी से अब यहाँ शिकवा-गिला कोईनहीं करता।

सभी को एक जन्नत चाहिए अपने लिए लेकिन,
ज़रूरी फर्ज़ हैं उनको अदा कोई नहीं करता।

Jun 24, 2014

=> घरवाली और कामवाली की सन्दर्भ सहित व्याख्या

 
वैसे तो उपरोक्त दोनों वालियां एक ही जेंडर की होती हैं तथापि गूढ़ अध्ययन करें तो मालुम होगा कि इनमें विपरीत जेंडर का भी समावेश अलग-अलग प्रतिशत में व्याप्त रहता है। जैसे घरवाली शादी के एक-दो साल तक तो हंड्रेड परसेंट फीमेल रहती है। घरवाली रहती है।

  • प्रमोद यादव। 


वैसे तो उपरोक्त दोनों वालियां एक ही जेंडर की होती हैं तथापि गूढ़ अध्ययन करें तो मालुम होगा कि इनमें विपरीत जेंडर का भी समावेश अलग-अलग प्रतिशत में व्याप्त रहता है। जैसे घरवाली शादी के एक-दो साल तक तो हंड्रेड परसेंट फीमेल रहती है। घरवाली रहती है। फिर धीरे-धीरे उसमे मेल के गुण (और अवगुण) परिलक्षित होने लगते है। एक-दो बच्चों के बाद वह जननी से जेलर हो जाती है। घर की रानी से-रानी लक्ष्मीबाई बन जाती है। मर्दानी हो जाती है। पूरे एट्टी परसेंट।
          अब दूसरे क्रम पर चले- कामवाली। ये होती तो घरवाली की तरह फीमेल ही है पर इ
नमें भी मेलवाला गुण कूट-कूट कर भरा होता है। जैसे भंवरा किसी एक फूल पर नहीं टिकता वैसे ही कामवाली भी एक घर में कभी नहीं टिकती इन्हें कितना भी कुछ लो-दो, खिलाओ-पिलाओ, पुचकारो इन्हें तो बस छोड़ बाबुल का घर की तरह घर छोड़ना है यानी छोड़ना है। हाथ जोड़ो, विनती करो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे मर्दों को इधर-उधर मुंह मारने की आदत होती है वैसे ही इन्हें नए-नए ठिकानों में बर्तन मांजने की हसरत होती है। लेकिन शाश्वत सत्य यह है की जैसे घरवाली के बिना घर,घर नहीं होता है, वैसे ही कामवाली के बिना घरवाली,घरवाली नहीं होती बल्कि झाड़ू-पोंछा, चौका-बर्तन करते खप्परवाली हो जाती है। 'न मांगू सोना-चांदी, न मांगू हीरे-मोती' की तर्ज पर उसे किसी दिल की नहीं अपितु एक अदद कामवाली की ही दरकार रहती है। जिस घर में ये दोनों होते हैं, उसे ही एक आदर्श घर कहा जाता है। घर में घरवाली न हो और सुबह-शाम कामवाली दिखाई दे तो हंगामा घर में घरवाली हो और कामवाली न हो तो भी हंगामा कुल मिलाकर दोनों हंगामा ही हंगामा अब इन दोनों के स्टेटस. आचार-व्यवहार, चाल-चलन, क्षमता-अक्षमता, गुण-अवगुण, समानता-असमानता पर भी चर्चा करते हैं।
            सबसे पहले घरवाली की:- क्योंकि सबसे पहले यही आती है घर में। घरवाली का चुनाव घर के बड़े बुजुर्ग और नाते रिश्तेदार करते हैं यह काफी देख-परख कर वर के मैचिंग की लाई जाती है।अमूमन देखने में देखने लायक होती है। घरवाली का स्टेटस सबसे ऊपर और वैध होता है। संवैधानिक तौर पर वह घरवाली ही नहीं वरन गृहस्वामिनी भी होती है। पूरे नाते-रिश्तेदारों का उस पर वरदहस्त रहता है। उसके सुख-दुःख, आशा-निराशा, जय-पराजय आदि पूरे परिवार और समाज से जुड़े होते है इसलिए वह पूरी तरह सेक्योर रहती है. बड़ी ही संस्कारिक होती है। पति की प्रापर्टी- जमीन दृजायदाद, का हिस्सेदार होती है। घर की लक्ष्मी होती है। पर बेचारी बहुत बेचारी भी होती है। अमूमन सब घरवालियां एक जैसी ही होती हैं सीधी-सरल, निष्कपट और निपट बेवकूफ। पति के वचनों को प्रवचन मान चलती है वह फ्लर्ट भी करे तो बर्दाश्त कर लेती है।पति के सारे अशिष्ट कारनामों को शिष्टता से सह लेती है। उसे हमेशा इस बात का संतोष रहता है कि वह परिवार में नंबर वन है और रहेगी और इसी गलतफहमी में जिंदगी गुजार देती है
अब बात करते है- कामवाली की -
            इनकी उत्त्पति, आदत, हैसियत, जरुरत, चाल-चलन, गुण-अवगुण और कार्य-शैली की--.पुराने ज़माने में यह केवल धनकुबेरों के घरो में पाई जाती थी जहां घर की आबादी अक्सर तीस-चालीस से ऊपर की होती ऐसे घरों में कभी कोई चीज अपने ठिकाने पर नहीं पाई जाती। जैसे बबलू का टेनिसबाल, कालू का कम्पास, टिंकू की टाई, हेमा का हेयरबैंड, चाचा का चश्मा, पायल का पर्स, सोनम की शू आदि आदि इन सबको ढूंढकर सौपना ही इनका पहला काम होता .इसमें जो प्रवीण होती, वही सालों साल टिकती यह सर्विस वो फ्री देती पोंछा लगाने या बर्तन-चौका का ही पैसा लेती और इतना लेती जितना कि एक स्कूल मास्टर का वेतन तीज-त्यौहार में बोनस के तौर पर अच्छे और मंहगे गिफ्ट अलग से बिलकुल फ्री पैसेवाले लोग ही इन्हें एफोर्ड कर पाते।
         आम घरो में तो घर की मां -बेटियां ही बर्तन-चौंका, झाड़ू-पोंछा कर लेती हैं। इन्हें इनकी कतई दरकार नहीं होती यहां शादी कर स्थाई कामवाली ले आने का चलन होता है। धीरे-धीरे यह बिमारी उन परिवारों को लगी जहां पति-पत्नी दोनों नौकरीशुदा होते यहां कामवाली एक साथ कई रोल निभाती दंपत्ति के आफिस जाने के बाद अंशकालिक गृहस्वामिनी छोटे बच्चों की पार्ट-टाईम मम्मी और सबसे आखिर में कामवाली कभी-कभी ऐसे घरों में कामवाली घरवाली का फर्ज भी निभाने लगती है। लेकिन भांडा फूटते ही घरवाली द्वारा तुरंत टर्मिनेट कर दी जाती हैं फिर वह बिना कोई शर्मों-हया के दूसरे ही दिन मोहल्ले के किसी और घर में सेट हो जाती हैं नौकरी छूटते ही दूसरी नौकरी हाजिर ये कभी बेरोजगार नहीं रहतीं।
          आज की तारीख में हर परिवार में इनकी दरकार है। क्या अमीर और क्या आम घरवाली के बिना घर चल सकता है पर कामवाली बिना एक दिन भी भारी पड़ता है, इन्हें ढूंढना दुनिया का सबसे ज्यादा टफ काम है।घरवाली तो थोड़े से प्रयास से मिल जाती है पर कामवाली तौबा-तौबा। इन्हें खोजने में जान निकल जाती है।गांव के लोग बड़े सुखी होते हैं ये घर में बहु लाकर टू इन वन काम करते हैं. बेटे के लिए घरवाली और घर के लिए-कामवाली ये दोनों भूमिकाएं गांव की बहुएं बखूबी सीता और गीता की तरह निभाती हैं इसलिए गावों में कामवाली की कोई क़द्र नहीं होती पर शहरों में यह अनमोल होती हैं जाने जां ढूंढता हूं तुम्हें तुम कहां जैसी स्थिति रहती है हर घर और घर वाले की
            तरह-तरह की होती हैं ये कामवालियां- कोई काली तो कोई गोरी, कोई सुन्दर तो कोई डायन,कोई भद्र तो कोई अभद्र, कोई साफ़-सुथरी तो कोई गन्दी, कोई कानी तो कोई खोरी(लंगड़ी) .हर पति की ख्वाहिश होती है कि कामवाली सुन्दर, गोरी, और अच्छे नाक-नक्शवाली हो पर पत्नियां हमेशा उनके साथ अन्याय कर भद्दी-कानी,कुरूप ही रखती हैं इसके पीछे उद्देश्य होता है कि पति सेफ रहे दरअसल ऐसा कर ये बड़ी बेफिक्री से बाकी कामों को अंजाम दे पाती हैं बड़े घरो की कामवालियां सुन्दर,गोरी और सुशील होती हैं ऊंचे लोग-ऊंची पसंद .यहां चयन करने का अधिकार पतियों के पास होता हैं इन घरों की घरवाली ही अधिकतर कामवाली की तरह दिखती हैं इन घरो में कभी जाएं तो निश्चित ही कामवाली को भाभी और भाभी को कामवाली समझेंगे .पर घर मालिक ऐसा कतई नहीं समझते बड़े लोग घरवाली और कामवाली को समान दर्जा देते हैं बल्कि कामवाली को घरवाली से भी ज्यादा महत्व देते हैं .इसलिए कभी कामवाली काकाजी के साथ सिनेमाहाल में दिख जाती है तो कभी भतीजे के साथ माल में .ऐसे घरों में कामवाली कई-कई साल टिक जाती है वरना हर किसी को शिकायत रहती है कि ये मछली की तरह होती हैं कब हाथ से फिसल जाए पता नहीं चलता फिर ढूंढते रहो
            कुल मिलाकर कहें तो घरवाली-कामवाली एक दूसरे की पूरक होती हैं दोनों मिलकर ही परिवार को ठेलती हैं लेकिन कभी-कभी इन दोनों का स्थानापन्न एक और निरीह प्राणी भी होता है।जैसे फिलहाल मैं घरवाली तो सुबह से दो-तीन उल्टियां कर बिस्तर में कैरी के मजे ले रही है। और अभी-अभी का ब्रेकिंग न्यूज है कि कामवाली आज नहीं आने वाली। वह भी अपने घर में उल्टियों का मजा ले रही अब ऐसी स्थिति में घर का चौका-बर्तन मुझे ही करना है। तो चलता हूं दोस्तों। फिर मिलेंगे।

Jun 23, 2014

=> देव भूमि में तांडव क्यों ?

  • रुपाश्री शर्मा, गुमला, झारखण्ड 

माँ गंगा की कहानी, माँ गंगा की जुबानी ..............
मुझको विधवंसिनी बता रहा है
देखो मनुस्य आज कितना चिल्ला रहा है
कह रहा मैं कर रही मनमानी
काल बन बैठा मेरा ये पानी
सारे ही तट -बंध टूट गए
प्रसाशन के पशीने छूट गए
कह रहा मनुष्य
पानी नही है ये तबाही है तबाही
प्रकृति को सुनाई नहीं देती मासूमो की दुहाई
नदियों के इस बर्ताव से मानवता घायल हो जाती है
देखो नदियां बरसात के मौसम में पागल हो जाती है
ये सुन मैं मुस्कुरा रही और मांग रही आपसे जवाब आप बताओ ऐसा जुल्म क्यों ??
मुझे क्या मेरी जमीन छीनने का डर सालता नही ?
क्या मनुष्य मेरी निर्मल धारा में कूड़ा -करकट डालता नही ?
धार्मिक आस्थाओं का कचरा मुझे झेलना पड़ता नहीं ?
जिन्दा से लेकर मुर्दों का अवशेष अपने भीतर ठेलना पड़ता नही ?
जब मेरी धाराओं में आकर मिलता है शहरी नालों का बदबूदार पानी
तब किसी को दिखाई ना देता है मनुष्य की घृणित मनमानी
तुम निरंतर डाले जा रहे हो मुझमे औद्योगिक विकाश की कबाड़
और फिर पूछते हो जाने कैसे आ जाती है बाढ़
मानव की मनमानी जब अपनी हदें देती हैं
तो प्रकृति भी अपनी शीलता को खुंटी पर टाँग देती है
मेरी ये निर्मल धारा जीवनदायी है
मैंने युगों से खेतों को सींच कर मानव की भूख मिटाई है
और मानव स्वभाव से ही आज आततायी है
मनुष्य ने निरंतर प्रकृति का शोषण किया
अपने ओझे स्वार्थों का पोषण किया
मेरी धाराओं को संकुचित कर शहर बसाया
धयान से देखिये नदी शहर में घुशी या शहर नदी में घुश आया
जिसे बाढ़ का नाम दे कर मनुष्य हैरान परेशान है
दरअसल वो मेरा (गंगा ) नेचुरल सफाई अभियान है
ये तो गंगा का नेचुरल सफाई अभियान है
ये तो गंगा का नेचुरल सफाई अभियान है। 

Jun 17, 2014

=> बच्चों की छुट्टियां और नानी का घर

 
राहुल की मां उसे नानी के घर चलने के लिए मना रही थी। मगर राहुल जाना नहीं चाहता था। उसे अपने दोस्त, कम्प्यूटर और मोबाइल की दुनिया ज्यादा पसंद थी। गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे अब मौज-मस्ती करना ज्यादा पसंद करते हैं। उन्हें न दादी के घर जाना अच्छा लगता है और न नानी के घर। 
             राहुल की मां उसे नानी के घर चलने के लिए मना रही थी। मगर राहुल जाना नहीं चाहता था। उसे अपने दोस्त, कम्प्यूटर और मोबाइल की दुनिया ज्यादा पसंद थी। गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे अब मौज-मस्ती करना ज्यादा पसंद करते हैं। उन्हें न दादी के घर जाना अच्छा लगता है और न नानी के घर। माता-पिता बच्चों को सही शिक्षा नहीं दे पाते इसलिए वे परिवार का महत्व और जीवन मूल्य के बारे में बताने के लिए दादी या नानी के घर ले जाना बेहतर समझते हैं।
          आधुनिक जीवनशैली ने माता-पिता को इतना व्यस्त बना दिया है कि उनके पास बच्चों के लिए समय ही नहीं। इसलिए गर्मियों में घर में हुड़दंग मचाने वाले बच्चों से निजात पाने के लिए कई मां-बाप उन्हें हॉबी क्लासेज में डाल देते हैं। नतीजा बच्चे छुट्टियों का मजा नहीं ले पाते। वैसे भी महीने भर की क्लास में ढंग से कुछ सीख भी नहीं पाते। पैसे की बर्बादी अलग होती है।
याद कीजिए अपनी गर्मी की छुट्टियों के दिन। नानी के घर जाने के लिए किस तरह ट्रेन में खिड़की वाली सीट पर पहले जाकर बैठ जाते थे ताकि रास्ते भर बाहर का नजारा देख सकें। चलती पटरियों को देखकर खुश हो जाते थे कि अब मजे के दिन शुरू होने वाले हैं। जी भर के सोएंगे। नानी का प्यार मिलेगा। मनपसंद खाने-पीने की चीजें मिलेंगी। साथ ही बाग-बगीचे में होगी दिन भर की धमा चौकड़ी। न धूप का डर न लू की चिंता। साथ में यह भी समझते थे कि परिवार क्या होता है। इस तरह बच्चों को अच्छे संस्कार मिलते थे। आपको यह भी याद हो कि रात में थक-हार कर जब सोने जाते तो नानी सिर को सहलाते हुए कहानियां सुनाती और तब कुछ ही देर में मीठी नींद आ जाती।

गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को अपने मन की करने का पूरा हक है। इसलिए उन्हें थोड़ी मस्ती करने दें। छुट्टियों में बच्चों के साथ कहीं घूमने निकल जाएं ताकि वे देश की संस्कृति और सभ्यता के बारे में जान सकें और उससे जुड़ सकें।

             गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को अपने मन की करने का पूरा हक है। इसलिए उन्हें थोड़ी मस्ती करने दें। छुट्टियों में बच्चों के साथ कहीं घूमने निकल जाएं ताकि वे देश की संस्कृति और सभ्यता के बारे में जान सकें और उससे जुड़ सकें। उनके साथ ज्यादा से ज्यादा लाभ समय बिताने की कोशिश करें क्योंकि यही समय होता है जब आप बच्चों से खुल कर और आराम से बात कर सकते हैं। वरना भागदौड़ की जिंदगी में बच्चों से मिलने का समय नहीं बचता।
कुछ दिन के लिए उन्हें नानी-दादी के पास घुमाने के लिए ले जाएं ताकि उन्हें अपने रिश्ते का महत्व भी समझते का मौका मिले। उनके साथ रह कर वह काफी कुछ सीख सकते हैं।
              छुट्टियों के चार-पांच दिन उन्हें ऐसी जगह ले जाएं, जहां वह कुछ सीख सकें। जैसे चिड़ियाघर, विज्ञान केंद्र, संग्रहालय, तारामंडल या कोई ऐतिहासिक धरोहर वाली जगह। मगर इन सबसे बड़ी बात गर्मियों में बच्चों का ख्याल रखना जरूरी है। उनके मोबाइल का डेटा, फेसबुक पर क्या चल रहा है और उसके कौन-कौन दोस्त है, सबकी जानकारी रखें। नेट पर बैठते समय बच्चों के साथ जरूर रहें और बातें शेयर करें।
                   इसके साथ ही गर्मी की छुट्टियों में बच्चों की सेहत का ध्यान रखना जरूरी है ताकि वे बीमार न पड़ें। इन दिनों की मौज-मस्ती के दौरान खाने-पीने में लापरवाही भारी पड़ती है। घर में बने शर्बत, ठंडाई, लस्सी दें। बाहर से शीतल पेय मंगाने पर रोक लगाएं और उसमें हानिकारक तत्वों के बारे में बच्चों को बताए। बाहर के गोल गप्पे और चाट खाने के बजाए बच्चों के लिए ये चीजें घर पर ही बनाएं। फ्रूट जूस और हरी सब्जियों पर इन दिनों जोर दें। बच्चों को गर्मियों में ज्यादा से ज्यादा पानी पीने के लिए कहें। जब बच्चे धीरे-धीरे बात मानने लगें तो बाहर से टैक्सी बुलाइए और अपने शहर की ही सैर पर निकल जाइए। ख्याल रहे कि कड़ी धूप में बच्चे न रहें।

Jun 14, 2014

=> सर्कस के शेर और पार्लियामेंट

        दफा दिल्‍ली में सर्कस के दो शेर छूट कर शहर में भाग गये। भागे तो दोनों साथ-साथ पर रास्‍ते में दोनों अगल-अलग हो गये। दिल्‍ली जैसे मायावी शहर में मनुष्‍य खो जाये ये तो बेचारे जानवर थे। सात दिनों तक भटकते रहे। एक शेर तो बहुत भूखा था। आंखों में उसके प्राण आये हुए थे। एक नाले कि पुलिया के नीचे किसी तरह से छुप-छुपा कर उसने दिन काटे। खाने को वहां कुछ नहीं था। परेशान और लाचार उस शेर को सर्कस की बहुत याद आ रही थी। की चलो कैद ही सही समय पर खाने को कुछ मिल ही जाता था। अब यहां किसी से पूछ कर दिल्‍ली चिडिया घर में ही चला जाये तो जान बचे। अचानक सातवें दिन उसका वह बिछुड़ा
साथी आ गया। उसे देख कर उसे कुछ राहत हुई,पर उसे देख कर भरोसा नहीं आया की वह तो बहुत हृष्ट पुष्ट है। और उसके चेहरे पर खुशी है। बहुत गड़ा भी खूब था, पहले शेर से तो चला ही नहीं जा रहा था। किसी तरह अपनी जान बचाये हुआ था।
       पहले ने दूसरे से पूछा यार तू कहां चला गया था। मेरे दिन तो बहुत मुसीबत में गूजरें न जाने किस घड़ी में मैंने तेरी बात मान कर सर्कस से भागने की योजना बनाई। मैं तो बहुत पछता रहा हूं। कई बार मैने वहां जाने की कोशिश भी की पर रास्‍ते का पता नहीं चला। किसी से पूछ भी नहीं सकता। हम तो यहां दोस्‍त पानी को भी तरस गये। तुम्‍हारे चेहरे पर तो बड़ी । कहां पर दाव चलाया। कहां छिपे रहे इतने दिन?
दूसरे शेर ने कहां—‘’मैं तो पार्लियामेंट हाउस में छिपा था।‘’
पहले ने कहां—बड़ी ही खतरनाक जगह चुनी तुमने,वहां पर तो इतनी सुरक्षा है , पुलिस है, मीडिया वाले है। तुम गये कैसे, क्‍या तुम्‍हें जरा भी डर नहीं लगा। बहुत बहादूर हो यार तुम तो। गजब का साहस है तुम्‍हारी।‘’
दूसरे ने कहा—यार वहां सब दिखावा है, कोई किसी को नहीं चेक करता। तू जानता ही है। भारत की सुरक्षा व्‍यवस्‍था। जब भी कोई हादसा होता है तो दो चार दिन के लिए…फिर टाये-टाये फीस। तूने पढ़ा नहीं अभी तो कुछ साल पहले पाकिस्‍तानी आतंकवादियों ने उस पर हमला भी कर दिया था। तू नाहक डरता है। मेरे साथ चल। मैं तो वहां रोज मिनिस्‍टर को प्राप्‍त कर लेता था। और पूरा दिन पेड़ की छाव में मजे से सोता था। आज तो तेरी याद आयी। की चलो देखू तू कहा हे।
पहले ने कहा—यह तो बहुत डेंजर काम है। ना भाई यह सुन कर तो मेरे पैर कांप रहे है। फंस जायेंगे। चलो किसी तरह से अपने सर्कस ही वापस लोट चलते है।‘’
दूसरे ने कहां—यार तू चल कर तो देख। कितना मजा आयेगा। वहां एम. पी मिनिस्टरों का लजीज मांस तू सब स्वाद भूल जायेगा। जब भी वहाँ से कोई मिनिस्‍टर नदारद होता है। एवरी वन इज़ कंपलीटली सैटिस्‍फाइड।‘’ कोई झंझट नहीं होती है। नौ वन लिसिन्‍स हिम। काई कभी भी अनुभव नहीं करता। वह जगह इतनी बढ़िया है कि वहां जितने लोग है किसी को भी प्राप्‍त कर जाओ। बाकी लोग प्रसन्‍न होते है। तुम भी वहीं चले चलो। वहां आपने दो क्‍या पूरे सर्कस के सब शेर भी आ जाये तो भी भोजन की कोई कमी नहीं होगी। साल भर का तो भोजन बड़े मौज से है। क्‍योंकि जैसे ही जगह खाली होगी। भोजन खुद ही पार्लियामेंट में आने को बेताब इंतजार कर रहा होगा। पूरे मुल्क से भोजन आता ही रहेगा। हमारे कम करने से कम हो ही नहीं सकता। वहां प्राविधान ही ऐसा किया हुआ है। अब तू समझ भोजन खुद ही अपने पैसे खर्च कर बहा आने को तैयार है। ऐसा तूने कभी सूना है। और कितनों की तो वहां फोटो लगी है। अब तू चल…..
                                                              पर बेचारा कमजोर शेर हिम्‍मत नहीं कर सका वहां जाने की….
                                                                                                                                                  (osho)

Jun 11, 2014

=> मैं फूलों कि डाली भी और, मैं ही तेज़ कटारी हूँ ' मैं नारी हूँ '


  • रूपाश्री शर्मा,गुमला झारखण्ड 


मैं ही दुर्गा, मैं ही चंडी, मैं ही बनी कपाली भी
मैं मन को वश में कर लेती, बन शराब कि प्याली भी
मैं फूलों कि डाली भी और, मैं ही तेज़ कटारी हूँ

' मैं नारी हूँ '.................

सृष्टि को पल्लू में बांधे, घूम रही मैं नारी हूँ !
मन के आसमानों पर तारे, मेरी चूनर से ही टंगे
मैं ही अमावस काली भी, मैं ही पूनम उजियारी हूँ !

मैं ही हकीकत मैं ही फ़साना, झूठ सांच सब मुझमें भरे
मैं ही कवियों कि भी कल्पना, मैं ही स्वपन सकारी हूँ !

मेरी ही जागीर जहाँ हो, मैं मजदूरी वहाँ करूँ
मैं ही हुकूमत घर की हूँ, और मैं ही पहरेदारी हूँ !

मुझमें ब्रम्हा विष्णु शिव हैं, मैं कण कण से पूजित भी
क्यूंकि प्रसव से जन्म भी दे दूँ, और मैं ही संहारी हूँ !

मैं मर्यादा बिस्तर की भी, मैं ही कन्या पूजन में
मैं ही अंकशायिनी भी, मैं ही पूजन अधिकारी हूँ !

मैं वीरों की मयान में, शमशीर बनी पीती भी लहू
और कमाल है ये मेरा, मैं रात पड़े श्रृंगारी हूँ !

जान लुटा कर जिम्मेदारी, पूरी करनी हो तो करूँ
जितनी बड़ी ताकत हूँ पुरुष की, उतनी बड़ी लाचारी हूँ !

मैं ही खट्टा-खारा-कड़वा, मैं जीवन का हर अनुभव
मैं ही मीठी स्वाद की रानी, मैं तीखी तर्रारी हूँ !

Jun 10, 2014

=> चंडीगढ़ में पत्रकार पर कमांडो का हमाल


इसे अंग्रेजों की गुलाम मानसिकता कहें या बदला लेने की भावना या फिर तानाशाही दीवारों को फाँदती हुयी मरणासन्न हो रही दिमागी उपज। चौथे स्तम्भ का दर्जा प्राप्त मीडिया पर हमला बोलने के तो कई मामले आते रहते हैं मगर चंडीगढ़ में पत्रकारों पर हुये हमले का यह मामला एकदम अलग है। अपनी काली करतूतों को छिपाने और कमियों को बाहर न होने देने का दिमागी विकृत रूप उस समय देखने को मिला जब भवन में लगी आग पर कवरेज करने गए पत्रकार को वहाँ के कमांडों ने दौड़ा दौड़ा कर पीटा और वहा मौजूद्द पुलिसकर्मी मूकदर्शक बने देखते रहे, यही नहीं वहा खड़े पुलिस कर्मी भी इस घटना पर बीच-बचाव करने की जहमत तक नहीं उठाया। 


चंडीगढ़, 9 जून : चंडीगढ़ में सेक्टर 17 स्थित एक भवन में आग लगने पर कवरेज करने गए पत्रकार पर कमांडो और पुलिस का चौतरफा हमला, पीड़ित
पत्रकार के ही खिलाफ पुलिस ने लिख दी एफआईआर।                
                आपरेशन सैल में तैनात एक कमांडो ने अपनी गुंडागर्दी की हदें पार करते हुए सैक्टर 17 में रविवार हुई आगजनी की घटना की कवरेज करने गए एक पत्रकार पर बुरी तरह हमला बोल दिया। हमला एक दैनिक अखबार के पत्रकार अविनाश पर हुआ। यही नहीं, उल्टा सैक्टर 17 थाना पुलिस ने कांस्टेबल की ही शिकायत पर अविनाश के खिलाफ पुलिसकर्मी को चोट पहुंचाने(आई.पी.सी. 323) व सरकारी कर्मी की ड्यूटी में आपराधिक तरीके से बाधा पहुंचाने (353) की धाराओं के तहत केस दर्ज कर दिया। वहीं मौके की तस्वीरों में साफ दिख रहा था कि शिकायतकत्र्ता आपरेशन सैल का कमांडो दीपक खुद घटनास्थल पर अपनी वर्दी का रौब दिखाता हुआ पत्रकार पर हावी हो रहा था। जिस समय यह घटना घटी उस समय चंडीगढ़ पुलिस के कुछ इंस्पैक्टर्स एवं डी.एस.पी. समेत एस.डी.एम.(सेंट्रल) व मीडियाकर्मी मौजूद थे। घटना दोहपर करीब साढ़े बारह बजे घटी। पत्रकार अविनाश के मुताबिक वह मौके पर इंस्पैक्टर जसविद्र सिंह से मिलने गया था। यहां मौके पर जैसे ही वह घटनास्थल की ओर जाने लगा, आपरेशन सैल में तैनात कांस्टेबल दीपक ने पीछे से आकर उसका कॉलर पकड़ उसे धक्का मारा। कांस्टेबल की इस अभद्रता का विरोध करने पर उल्टा कांस्टेबल ने गाली गलौच करते हुए अविनाश पर कार्बाइन के बट से हमला बोल दिया। उसके साथी कमांडोज ने उसे रोकने का प्रयास भी किया। घटना के बाद मौके पर आई.जी. आर.पी. उपाध्याय समेत एस.एस.पी. सुखचैन सिंह गिल एंव गृह सचिव भी पहुंचे। यहां मीडियाकíमयों द्वारा घटना की जानकारी इन वरिष्ठ अफसरों को देने के बाद उन्होंने उचित्त कार्रवाई की बात कही। इसके बाद मीडियाकíमयों ने घटना की तस्वीरें पुलिस हैडक्वार्टर जाकर एस.एस.पी. को दिखाई जिसके बावजूद पुलिस ने अविनाश पर आपराधिक धाराओं में यह केस दर्ज कर दिया। एस.एस.पी. ने मामले की जांच एस.पी.(सिटी) परमिंद्र सिंह को मार्क कर दी है।
प्रैस क्लब की तरफ से दैनिक अखबार के पत्रकार अविनाश पर हुए हमले की निंदा की हैं। इसके साथ ही मांग की गई है कि इस मामलें की आईजी द्वारा निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। दोषी को सजा मिलनी चाहिए।

=> रूसी और भारतीय नागरिकों की आनुवंशिक जड़ें एक

 जय प्रकाश त्रिपाठी 

       रूसी और भारतीय नागरिकों की आनुवंशिक जड़ें एक ही हैं| 8-9 हजार साल पहले दोनों देशों के लोगों के जीनोटाइप पूरी तरह से मेल खाते थे| यह परिणाम हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के जैव रसायन, जैव भौतिकी और चिकित्सा केन्द्र के अनुसंधान कार्यों से प्राप्त हुए हैं|अगर इन परिणामों की पुष्टि अन्य शोधकर्ताओं द्वारा भी हो जाएगी तो इसका मतलब यह होगा कि कभी तो रूसी और भारतीय एक ही जाति का हिस्सा थे| रूसी इतिहासकार और प्राच्यविद् इवान इवान्त्स्की ने रेडियो रूस को दिए अपने एक साक्षात्कार में बताया कि इस जाति का पैतृक घर रूस के एकदम उत्तर में था| वह आगे कहते हैं: 4000 साल पहले प्राचीन स्लाव दक्षिण उराळ की तरफ आये थे और उसके चार सौ साल बाद वह भारत की तरफ रवाना हुए थे, जहां आज भी उसी आनुवंशिक गुणों के लगभग 10 करोड़ उनके वंशज रह रहे हैं| स्लाव जाति के जीनोटाइप का किसी भी प्रकार का स्वांगीकरण नहीं हुआ है| और अभी तक स्लाव जीन से पूरी तरह से मेल खाने वाले जीन वहाँ पाए जाते हैं| आर्यों की एक और लहर ई.पू. तीसरी सहस्राब्दी में मध्य एशिया से पूर्वी ईरान को रवाना हुयी थी और वह ‘ईरानी आर्य’ कहलाए थे|"ऋग्वेद" के एक श्लोक में कहा गया है कि सप्तऋषि नक्षत्र बिलकुल भारतीयों के सिर के ऊपर है| काफी समय बाद यूरोप वासियों ने इस नक्षत्र को ‘बिग डिपर’ का नाम दिया| यहाँ पर दिलचस्प बात यह है कि अगर खगोल विज्ञान की दृष्टि से भारत में रह कर इस नक्षत्र को देखने की कोशिश की जाए तो यह क्षितिज के कहीं ऊपर दिखाई देता है या कुछ जगहों से बिलकुल भी दिखाई नहीं देता है| आर्कटिक सर्कल के पार वह जगह है जहां से सप्तऋषि नक्षत्र सीधे भूमि के ऊपर दिखाई देता है| इसका अर्थ यह हुआ कि वेद ग्रंथों के मंचन के समय भारतीय उत्तरी ध्रुव के पास कहीं रहते थे|
         इस सिद्धांत की पुष्टि कुछ अन्य तथ्य भी करते हैं| कई भारतीय लोकगीत यह दावे करते हैं कि देवताओं के दिन और रात छह महीने लंबे होते हैं| इसे अक्सर एक रंगीन अतिशयोक्ति माना जाता है| लेकिन यह पूरी तरह से भौगोलिक वास्तविकताओं पर आधारित हो सकता है| रूस के एकदम उत्तर में ध्रुवीय दिन और रात होते हैं, जो छह महीने लंबे होते हैं| संस्कृत से उद्धरित रूस की नदियों के नाम भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि कभी तो रूस में भारतीय रहते थे| रूस के कीरव इलाके में नदी सूर्या है और रूस की नदी वोल्गा की सबसे बड़ी उपनदी का नाम कामा है जो प्रेम के देवता कामदेव को समर्पित है|इस सिद्धांत के विरोधी स्लाव और भारतीयों के बीच दिखाई देने वाले मानवविज्ञान मतभेदों की तरफ इशारा करते हैं| लेकिन हिंदुस्तान में रहने वाले लोगों में अभी भी ऐसे लोग हैं जिनके रूसी होने का भ्रम होता है| वर्तमान पाकिस्तान में स्थित दक्षिणी हिंदूकुश के पहाड़ों में रहने वाली कलश जनजाति के लोगों और रूसियों में अंतर करना लगभग असंभव है| इस जनजाति के लोगों की त्वचा गोरी, बाल हलके भूरे तथा अधिकतर की आंखों का रंग हल्का हरा होता है| यह उन्हीं आर्यों के वंशज हो सकते हैं जो कभी तो रूस से भारत आये थे|आनुवंशिक वैज्ञानिकों के शोधकार्यों से पता चलता है कि आधुनिक भारतीयों के पूर्वज आर्य थे| यह वही आर्य थे जो अपने अर्जन को रथों पर लाद कर उत्तरी रूस से दक्षिण की तरफ नए घर की तलाश में रवाना हुए थे| अभी तक केवल इस नए घर की तलाश के लिये निकलने का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है| 

-('रेडियो रूस' से साभार)

Jun 3, 2014

=> केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुण्डे की सड़क हादसे में मौत

 "मुझे बहुत दुःख है की गोपीनाथ मुण्डे जैसा
ससक्त नेता हमारे बीच से चला गया।
भारत के लिए यह बहुत ही अपूर्णीय छति है।
- नरेन्द्र मोदी, प्रधानमन्त्री"
नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे की मंगलवार सुबह दिल्ली में हुए एक सड़क हादसे के बाद हार्ट अटैक आने से  ६.३० बजे  के करीब मौत हो गई। मुंडे को हादसे के बाद एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया था, जहां सुबह इलाज के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हादसे के बाद एम्स पहुंचे स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मीडिया को मुंडे के निधन की खबर दी।
        बताया जा रहा है की गोपीनाथ मुण्डे सुबह अपनी कार से अपने लोक सभा क्षेत्र बीड में विजय सभा को सम्बोधित करने जाने के लिए एयरपोर्ट की तरफ जा रहे थे की पृथ्वीराज रोड पर अरविंदो चौक के पास सामने से आ रही इण्डिका कार ने टक्कर मार दी उसके तुरंत बाद उनके साथ कार में बैठे ड्राइवर और सहायक ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। एक डॉक्टर के मुताबित अस्पताल पहुँचने पर उनकी सांसे रुकी हुयी थी और हार्ट भी काम नहीं कर रहा था। गौरतलब है की मुण्डे को डाइबिटीज और उच्च रक्तचाप की समस्या पहले से ही थी।  

एक परिचय:
गोपीनाथ मुंडे (१९४९-२०१४) एक भारतीय राजनेता है और महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री थे। १९९५ में हुये विधानसभा के चुनावों में उन्होंने सफलता पाई और महाराष्ट्र राज्य के उपमुख्यमंत्री बने। उन्होंने अपनी पहचान ज़मीन से जुड़े एक कार्यकर्ता के तौर पर बनाई और वे एक राजनेता के साथ-साथ एक कृषक भी थे । मई-२०१४ में वह नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे, लेकिन उस के कुछ दिनों बाद ही दिल्ली में एक कार दुर्घटना में उनका देहान्त हुआ |
गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र राज्य में भारतीय जनता पार्टी का चेहरा हैं। लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी के सबसे चमकदार चेहरे है। मुंडे को महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी की ओर से एकमात्र भीड़ जुटाने वाले नेता के तौर पर जाना जाता है। महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी को खड़ा करने वालों में उनका नाम लिया जाता है। गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र के कद्दावर ओबीसी नेता हैं। गोपीनाथ मुंडे पिछड़े वर्गों में अच्छा प्रभाव रखने वाले महत्पूर्ण ओबीसी नेता हैं। महाराष्ट्र प्रदेश में उन्हें भारतीय जनता पार्टी का अकेला जननेता माना जाता है। वे महाराष्ट्र भारती जनता पार्टी में अपना अलग महत्व है। महाराष्ट्र में एकमात्र जमीनी नेता मुंडे को नाराज करने से वहां भारतीय जनता पार्टी को भारी क्षति पहुंचेगी। महाराष्ट्र में उनके वर्चस्व के सामने कोई चुनौती खड़ी नहीं होगी। मायनस मुंडे महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी की स्थिति बिना नमक समुद्र जैसी होने की आशंका है। 
        वे ४० साल से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े है। ३७ साल से चुनकर आ रहे है। गोपीनाथ मुंडे के शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से, शिवसेना से गठबंधन के संबंध २२ साल पुराने है।

Jun 1, 2014

=> महंगाई के कारण लोगों ने खरीदारी का विचार त्याग दिया

संवाददाता।

महंगाई के कारण लोगों ने खरीदारी का विचार त्याग दिया है या उचित समय का इंतजार कर रहे हैं। इससे खासकर शहरों में उत्पादों की बिक्री प्रभावित हुई है। वास्तव में इस समस्या का समाधान हमारे देश के ग्रामीण इलाकों या शहरों में तब्दील होते कस्बों या गांवों में निहित है। इनकी संख्या देशभर में 5000 के लगभग है। यहां के लोग बड़े शहरों में खरीदारी के लिए आते हैं। इसे देखते हुए पैराशूट ब्रांड तेल बनाने वाली मैरिको लिमिटेड की सीईओ सौगता गुप्ता की बात विचारणीय हो जाती है। उनका मानना है कि उभरते शहरों की आबादी खर्च करने को तैयार है, लेकिन एफएमसीजी उत्पाद बनाने वाली कंपनियां उन तक पहुंच नहीं पा रही हैं। इसे समझते हुए ही कंपनी ने खास रणनीति बनाई है।
       भारत के ग्रामीण इलाकों के अलावा दुनिया के कुछ ऐसे देश भी हैं, जो उचित उत्पादों पर पैसा खर्चने के लिए तैयार हैं। सब-सहारा देश, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीकी महाद्वीप इत्यादि कुछ ऐसे केंद्र हैं, जहां लोग मध्य कीमतों के कंज्यूमर उत्पादों की राह देख रहे हैं। अब जरा एक नजर डालिए त्वरित सेवा देने वाले रेस्त्रां व्यवसाय पर। इनके लिए छोटे का मतलब ही बड़ा है। इसी सिद्धांत पर वे व्यवसाय में छाई मंदी को छांटने का प्रयास कर रहे हैं। इन्होंने समोसों को ऐसा आकार दिया, जो पांच रुपए के लिहाज से मुफीद हो। इसी तरह पिज्जा, कचौरी, सैंडविच, बर्गर को भी दस रुपए के खांचे में फिट करने वाला आकार दिया गया। भले ही इनका आकार छोटा हो, लेकिन लोगों की तेज भूख शांत करने में यह अब भी सफल हैं। इसी तर्ज पर पूरी थाली के सत्तर रुपए कीमत वाले लघु संस्करण की बिक्री में सत्तर फीसदी का इजाफा देखा गया है।
        डोमिनोज और मैक्डोनल्ड भी खाद्य उत्पादों के लघु संस्करण पेश कर रहे हैं, जो लोगों की जेब में समा सकें। यद्यपि इन शृंखलाओं में खाने को शेयर करने की प्रवृत्ति कम हुई है, लेकिन वैयक्तिक तौर पर खरीदारों की संख्या बढ़ी है। इसकी वजह यह है कि इन्होंने तुरंत खाने की इच्छा रखने वालों के लिए कम कीमत में उत्पाद पेश किए हैं। भारत में मैक्डोनल्ड के 257 रेस्त्रां में से दस फीसदी हाईवे पर स्थित हैं। कंपनी के प्रबंधकों ने अपने ब्रांड को इन जगहों पर नए सिरे से स्थापित करने की रणनीति बनाई है। हाईवे पर ग्रामीण इलाकों में रहने वाली आबादी की शिरकत बढ़ी है। अब इन हाईवे आउटलेट से कंपनी को बीस फीसदी तक आय हो रही है।
        डोमिनोज और मैक्डोनल्ड सरीखे ब्रांड के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी छवि को बदलना है। अभी तक इसके खाद्य उत्पादों को कुलीन तबके से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन अब यह ब्रांड इन्हें आमजन तक पहुंचाना चाहते हैं। गौरतलब है कि 87 फीसदी भारतीय सड़क मार्ग से यात्रा करते हंै। ऐसे में इन जैसे ब्रांड के लिए जरूरी हो गया है कि वे त्वरित खाद्य पदार्थ देने वाले उत्पाद के तौर पर सड़क किनारे अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएं। इससे ही मध्य वर्ग कहीं आसानी के साथ इनसे जुड़ाव स्थापित कर पाएगा। इसी रणनीति पर देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे वैश्विक ब्रांड भी अमल कर रहे हैं। कॉफी वल्र्ड, पिज्जा कॉर्नर, क्रीम एंड फज ने इस रणनीति पर अमल करते हुए ही अपनी बिक्री में 15 फीसदी का इजाफा किया है। यानी आकार में छोटा और कीमत में सर्वसुलभ उत्पाद लोगों तक तेजी से पहुंच बना रहा है।