Dec 15, 2014

=> पेंसिल से जानिए सुखी जीवन के 7 गुरुमंत्र

दोस्तों, पेंसिल के आविष्कारक ने पैकेट में बंद करने से पहले से पेंसिल से कहा, मैं तुम्हें इस दुनिया में बेहतरीन कार्य करने के लिए भेज रहा हूँ लेकिन उससे पहले तुम्हें ये सात गुरुमंत्र याद करने होंगे तभी तुम इस दुनिया कि सबसे बेहतरीन और सर्वश्रेष्ठ पेंसिल कहलाओगी..
((1.)  इस संसार ,में तुम्हारा रूप-रंग और आकार कैसा भी हो, तुम खुद को हमेशा आगे लाने का प्रयत्न करना, कभी मत समझना कि तुम्हारे चाहने वालों की कमी होगी...
((2.)  तुम इस संसार में एक बेहतर कार्य करने के लिए जा रही हो, दूसरों के हाथों में विश्वास पैदा करने से पहले तुम्हें खुद पर यह भरोसा रखना होगा कि तुम सामने वाले के लिए सही हो...
((3.)  तुम्हारी बीच-बीच में छिलाई की जायेगी, लेकिन उस पीड़ा से मत घबराना, समय के साथ तुम्हारी बेहतरी निखरती जायेगी...
((4.)  तुम अपनी गलतियाँ दूसरों पर मत लादना, खुद की गलती को स्वीकारना और अपनी गलती को सुधारने की योग्यता रखना..
((5.)  तुम्हें कई प्रकार से अपने में मजबूती लानी होगी जिससे तुम हर भावना के प्रति कागज में अपनी छाप छोड़ जाओ...
((6.)  तुम्हारी बाहरी परत से लोग तुम्हें प्यार करें ये जरुरी नहीं क्यूंकि तुम्हारा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा तुम्हारे अंदर है यह हमेशा याद रखना...
((7.)  समय के साथ तुम्हारे अंदर भी कई परिवर्तन किये जायेंगे लेकिन तुम दुनिया के किसी भी कोने में रहो लिखना मत छोडना, कहीं कैसी भी परिस्थितियां हों वहाँ अपने निशान छोड़ जाना...
 
 
दोस्तों पेंसिल ने तो इन सात बातों को बखूबी निभाया और इन्हें अपने लक्ष्य का हिस्सा मानकर वह अपने डिब्बे के अंदर चली आई. आप खुद भी उस पेंसिल के अपने नियमों को देखिये उसके जगह खुद को रखिये और अपने आपको एक श्रेष्ठ व्यक्ति बनाने के लिए आगे आइये..
इसके लिए हम पेंसिल  के सफल मन्त्रों को ही अपना गुरुमंत्र मानते हैं, और एक सफल और कामयाब व्यक्ति बनने  के लिए आइये हमारे इन सात गुरुमंत्रों को देखते हैं:-
गुरुमंत्र(1.) इस संसार में हम सब में भिन्नता है, हमारा रूप-रंग या आकार एक जैसा नहीं है उसी प्रकार भगवान ने भी हम सबके अंदर कई विशेष गुण दिए हैं, गुणों में भी भिन्नता है, सबके अंदर कमाल का Talent मौजूद है लेकिन यदि आप अपने गुणों को दबाए रखेंगे तो यक़ीनन आपकी पहचान दब कर रह जायेगी, इसलिए अपने आपको आगे लाने के लिए प्रयत्न कीजिये, जैसे-जैसे आपके गुणों से लोग प्रभावित होंगे, आपके चाहने वालों की संख्या बढ़ती जायेगी और इससे आपके गुणों में भी वृद्धि होती जाएँगी और यह समय के साथ ही निखरती जाएँगी...
गुरुमंत्र(2.) यह तो सफलता के नजदीक पहुचने का सबसे अच्छा रास्ता है मतलब खुद पर भरोसा, खुद पर विश्वास यानी जीत के करीब आप पहुच गए.. कोई भी कार्य आपके लिए असंभव नहीं है लेकिन यह बहुत जरुरी है कि आप स्वयं पर कितना विश्वास करते हैं.. लोगों का विश्वास आप पर तभी होगा, जब आपका स्वयं के ऊपर अटूट विश्वास होगा, इसलिए अपने और अपनी सफल होने की चाहत के विश्वास को डगमगाने मत दीजिए...
गुरुमंत्र(3.) तुम्हें बार-बार विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा, बार-बार चोंट खाओगे, गिरोगे और ठोंकरे लगेंगी लेकिन यह सिर्फ तुम्हें परखने के लिए सिर्फ तुम्हारी परीक्षा मात्र होगी, इसलिए कभी भी इनसे मत घबराना जो तुम्हें निराश करें, याद रखना तुम अभी चोंट इसलिए खा रहे हो क्यूंकि तुम्हें मजबूत बनना है और कल समय गवाह होगा जब कई मुश्किलों के बाद तुम अपनी जीत का परचम लहराए खड़े रहोगे... समय के साथ तुम्हारी पहचान बढ़ती जायेगी लेकिन हार मत मानना, डटे रहना, लगे रहना क्यूंकि जीत तुम्हारी ही होगी...
गुरुमंत्र(4.) जब तुम अपनी कामयाबी का श्रेय खुद को देते हो तो नाकामयाबी हासिल होने पर गलतियाँ दूसरों पर क्यों निकालते हो, किसी की बर्बादी के लिए दूसरे ज्यादा जिम्मेदार नहीं होते जितना कि वो खुद रहता है.. सफल होने के लिए तुम्हें समझना होगा कि वाकई अपनी गलतियाँ दूर करके तुम कितने आगे जा सकते हो, जितना समय तुम दूसरों की गलतियाँ खोजने में लगाते हो उतना यदि खुद की गलती को खोजकर उसे सही करने का प्रयास करोगे तो तुम बहुत आगे जाओगे.. इसलिए अपनी गलतियों को को स्वीकारना और उन्हें सुधारने की योग्यता रखना और यह काम सिर्फ आप कर सकते हो क्योंकि बदलना आपको है...
गुरुमंत्र(5.) तुम्हें अपने आपको मजबूत करना होगा, परिस्थितियां तुम्हारे अनुकूल नहीं बनाई गयी हैं, सुख-दुःख, हार-जीत के ऐसे पड़ाव में रोकर अपना कीमति आँसू पोंछने के बजाय आखरी दम तक कोशिश करना, विपरीत परिस्थिति में भी अपने जीत के निशान छोड़ जाना...
गुरुमंत्र(6.) तुम जो भी काम करना दिल से करना, अपना फायदा देखने से पहले यह सोचना की सामने वाले को भी इससे बहुत लाभ मिले, लोग आपको इसलिए प्यार नहीं करेंगे कि आपकी सकल सूरत बहुत अच्छी है वो तो इससे प्यार करेंगे कि आपका दिल कितना प्यारा है, आप कितने अच्छे इंसान हैं... याद रखिये तुम्हारा सबसे अनमोल रत्न तुम्हारे अंदर मौजूद है, और इसी से तुम्हारी प्रसंशा होगी और वो ये हैं- तुम्हारी आत्मा, तुम्हारा दिल, तुम्हारा चरित्र और तुम्हारा प्रेम... जो सदैव तुम्हारे जीत का कारण बनेंगे..
गुरुमंत्र(7.) तुम कैसे भी जियो, जहाँ भी रहो, जहाँ भी जाओ वहाँ अपनी छाप छोड़ जाना. पूरी ताकत से अपना कर्तव्य निभाना.. और अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए सब काम करना... ऐसा काम करना कि लोग तुम्हें मरणोपरांत भी याद रखें....
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दोस्तों एक छोटी- सी पेंसिल से हम अपने जीवन की कितनी सार-पूर्ण बातें समझ सकते हैं आप सब भी अपने जीवन में इन सातों गुरुमंत्र को अपनाएं यक़ीनन आपके अंदर एक बहुत बड़ा और सकारात्मक परिवर्तन नजर आएगा... उम्मीद है ये सातों गुरुमंत्र आपके जीवन में एक अच्छा परिवर्तन लायेंगे..                                  from "hamarisafalta.com"

Oct 9, 2014

=> भगवान राम से आज की मीडिया का सवाल

मान लीजिए रामजी ने आज के युग में सीताजी को बचाने संघर्ष किया होता तो उनके साथ क्या होता? आज जहां एक अच्छे इंसान को भलाई के लिए सूली पर चढा देने का रिवाज है क्या वहां रामजी अपना कार्य पूरा कर पाते?

अगर रामजी ने कलयुग में रावण पर आक्रमण किए होते तो उनसे मीडिया किस तरह के सवाल करते:

  • आपने अपनी टीम के महत्वपूर्ण घटक श्री हनुमान को लंका में सीता की खोज करने तथा संदेश देने के उद्देश्य से भेजा था, परन्तु उन्होंने वहां जाकर आग लगा दी… क्या इससे यह साफ नहीं हो जाता कि आपकी टीम में अंदरूनी तौर पर वैचारिक मतभेद हैं…?
  • क्या श्री हनुमान के विरुद्ध अशोक वाटिका उजाड़ने के आरोप में वनविभाग द्वारा मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए…?
  • आपके एक अन्य सहयोगी श्री सुग्रीव पर अपने भाई महाबली बालि का राज्य हड़पने का आरोप है… क्या आपने इसकी जांच करवाई…?
  • क्या यह सच नहीं है कि बालि का राज्य हड़पने की श्री सुग्रीव की साजिश के मास्टरमाइंड आप स्वयं हैं…?
  • आप 14 साल तक वनवास में रहे… क्या आप स्पष्ट रूप से बता सकेंगे कि आपको वहां अपने खर्चे चलाने के लिए फंड कहां से मिलते रहे…?
  • क्या आपने किसी स्वतंत्र एजेंसी से उस फंड का ऑडिट करवाया है…?
  • क्या आप बताएंगे कि आपने सिर्फ रावण पर हमला क्यों किया, जबकि अन्य अनेक देशों में भी राक्षस शासनारूढ़ थे… क्या यह लंका की सरकार को निजी कारणों से अस्थिर करने की साजिश नहीं थी…?
  • क्या यह सच नहीं है कि रावण को परेशान करने के मकसद से आपने उनके परिवार के निर्दोष लोगों, जैसे कुम्भकर्ण, पर हमला किया…?
  • क्या आपकी टीम के श्री हनुमान द्वारा संजीवनी बूटी की जगह पूरा पहाड उखाड़ लेना सरकारी जमीन के साथ छेड़छाड़ नहीं… क्या आप इसे वन संपदा के साथ भी खिलवाड़ नहीं मानेंगे…?
  • क्या यह सच नहीं कि आपने रावण पर आक्रमण करने से पहले समुद्र पर लंका तक बनाए गए पुल का ठेका नल और नील को अपने करीबी होने के कारण दिया…?
  • बताया गया है कि आपने पुल बनाने के लिए छोटी-छोटी गिलहरियों से भी काम करवाया… क्या इसके लिए आपके विरुद्ध वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम तथा बालश्रम कानून के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए…?
  • आपने बिना किसी पद पर रहते हुए युद्ध के समय देवराज इन्द्र से राजकीय सहायताप्राप्त की और उनका रथ लेकर रावण पर हमला किया… क्या इससे आप इन्द्र की ‘टीम ए’ सिद्ध नहीं होते…?
  • क्या इस सहायता के बदले आपने इन्द्र से यह वादा नहीं किया कि अयोध्या का राजा बनने के बाद आप उन्हें अयोध्या के आसपास की जमीन दे देंगे…?
  • स्वर्ग की दूरी अयोध्या की तुलना में कई गुणा अधिक है, परन्तु युद्ध के दौरान आपने अयोध्या से रथ न मंगवाकर इन्द्र से रथ मंगवाया… क्या यह निर्णय इन्द्र की कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया…?
  • जाम्बवंत द्वारा युद्ध में आपको दी गई सहायता और परामर्श के बदले क्या आपने उन्हें राष्ट्रपति बनाने का वादा नहीं किया…?
  • क्या विभीषण को अपनी टीम में शामिल करके आपने दल-बदल कानून का सरासर उल्लंघन नहीं किया…?
  • और आखिरी सवाल, आपने भरत को राजा बनाया… क्या आपको अपनी नेतृत्व क्षमता पर संदेह था…?    (मनोरंजन मात्र अन्यथा न लें)

Aug 19, 2014

=> नयी सदी की आधी औरत


  • रुपाश्री शर्मा

आधी औरत होने के कितने मायने है और कितने नहीं, यह सवाल ही अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है। मगर इस नयी सदी की जिस औरत को सम्पूर्ण औरत का दर्जा देकर तमाम तरह के स्लोगन से सुशोभित कर और श्रेष्ठता के तमाम तमगों से नवाज कर तुम्हारा यह मर्यादा पुरुष समाज जिस तरह महिमा मंडित कर रहा है, उससे मैं यानि की आधी औरत केवल इन स्लोगन से तो पूर्ण होने से रही।
              तुम मेरे इस आधी होने के पर्याय भर को ही पूर्ण मान कर अपने सम्तुल्य होने का दम्भ भर रहे हो .....जानते हो न मैं यानी की एक आधी औरत और तुम इस नयी सदी के जन नायक , मर्यादित गाथाओ से लवरेज ,उन वीर सूरमाओं के अग्रणी जिनमे न जाने कितने ही इतिहास दफ़न हुए यह तुम हो .......

Jul 29, 2014

=> भारत में नहीं है राष्ट्रभाषा

गुजरात उच्च न्यायालय ने जब 2009 में अपना निर्णय सुनाया कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, तब हम चौंके अवश्य थे, पर किया कुछ नहीं। न्यायालय ने माना कि देश में बहुतायत लोगों ने हिंदी को अपनी राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया है, अधिकतर लोग हिंदी समझते और बोलते हैं और देवनागरी लिपि में लिखते भी हैं, पर संविधान के अनुसार हिंदी राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं। 
प्रेम लता

गुजरात उच्च न्यायालय ने जब 2009 में अपना निर्णय सुनाया कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है तब हम चौंके अवश्य थे, पर किया कुछ नहीं। न्यायालय ने माना कि देश में बहुतायत लोगों ने हिंदी को अपनी राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया है, अधिकतर लोग हिंदी समझते और बोलते हैं और देवनागरी लिपि में लिखते भी हैं, पर संविधान के अनुसार हिंदी राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं।
एक जनहित याचिका में अनुरोध किया गया था कि उपभोक्ता को अधिकार है कि वह डिब्बाबंद वस्तुओं में शामिल तत्त्वों का विवरण जाने। चंूकि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, इसलिए उत्पादकों को हिंदी में विवरण छापने के निर्देश दिए जाएं। वकील ने अपनी बहस में विधानसभा में इस विषय में हुई चर्चा का भी उल्लेख किया। यही नहीं, केंद्र की तरफ से उपस्थित वकील ने यह भी बताया कि माप-तौल विभाग के नियमों के अनुसार सभी पैकेटों पर विवरण हिंदी या अंगरेजी में लिखे और छापे जाने चाहिए। पर न्यायालय का सीधा प्रश्न था- क्या कभी कोई ऐसी अधिसूचना जारी हुई है कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा है?
             यहां एक चूक वकीलों से भी हुई। वे यह नहीं बता पाए कि राजभाषा अधिनियम की धारा 3 (3) के तहत कुछ दस्तावेजों का द्विभाषी किया जाना अनिवार्य है। उनका हिंदी को राष्ट्रभाषा कह देना ही बड़ा प्रश्न बन गया। अधिक झकझोरने वाला यह सत्य था कि देश की कोई राष्ट्रभाषा है ही नहीं!

=> लंबे सफर में रिलैक्स रहने के लिए कुछ ऐसा करें


लंबी फ्लाइट्स अक्सर थका देती हैं। इस दौरान क्या खाएं, कैसे बैठें जैसी चीजों पर ध्यान दिया जाए, तो आप काफी हद तक रिलैक्स रहेंगे। जानते हैं इस बारे में कुछ टिप्स: ट्रैवल करना किसी को भी अच्छा लग सकता है, लेकिन लंबे सफर में आपको थकान महसूस होने के साथ ही बोरियत भी हो सकती है। यह बात एयर ट्रैवल पर भी लागू होती है। साथ ही, मैटर यह भी करता है कि 10 या 12 घंटे की लंबी फ्लाइट में आप क्या खाते हैं और कैसे रिलैक्स रहते हैं। वैसे, कुछ बातों को ध्यान में रखकर आप अच्छा फील कर सकते हैं।              

Jul 16, 2014

=> नई पीढ़ी के कार्यक्रम में पत्रकारों ने की शिरकत

            पत्रकारिता की वर्तमान दशा एवं दिशा विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें मेरठ के सभी पत्रकार बन्धुओं को अपनी-अपनी व्यथाएं व्यक्त करने का मौका मिला। कार्यक्रम का संचालन बंशीधर चतुर्वेदी ने किया तथा संयोजन सत्यप्रकाश मिश्र ने किया। इस अवसर पर नई पीढ़ी के कार्यकारी सम्पादक त्रिनाथ मिश्र ने सभी पत्रकारों को धन्यवाद ज्ञापित किया और उन्हें एकजुट होकर देश की अखंडता व विरासत के लिए लड़ाई जारी रखने की विनती की।
            इसके बाद आइआइएमटी कॉलेज के लेक्चरर विशाल शर्मा ने अपना वक्तव्य रखते हुए मीडिया की वर्तमान परिस्थिति से अवगत कराते हुए शब्दों व मात्राओं की कमियों की तरफ भी सबका ध्यान आकर्षित कराया और बताया कि हिन्दी पत्रकारिता को अपने वर्चस्व की जंग छोड़कर सहयोगात्मक रवैया अपनाना चाहिए।  डॉ0 ललित भारद्वाज ने अपने वक्तव्य में पत्रकारों की दिशा पर खास चर्चा की और बताया कि हमें अपने लिए अच्छे मानसिकता का होना जरूरी है तभी कोई आगे बढ़ सकता है।  दैनिक जागरण से  सन्तोष शुक्ल ने अपने उद्बोधन में अच्छी समझ और सकारात्मक रवैया पर बल देते हुए बताया कि पत्रकारिता को एक तहज़ीब व जम़ीर की जरूररत है जिसे दुनिया की कोई ताकत न हिला सके, इसके लिए जानकारियों का होना, विभिन्न विषयों पर पकड़ होना बेहद जरूरी है। समाज में पत्रकारिता और कार्यकुशलता दोनों उच्च दर्जे की होनी चाहिए उसके लिए हम सब का एकत्र होना बेहद जरूरी है और मिलकर ही किसी कार्य को अन्जाम तक पहुंचाया जा सकता है। भाजपा महिला प्रकोष्ठ की मीडिया प्रभारी सीमा श्रीवास्तव ने भी अपना वक्तव्य रखा और कहा की आज हम जो भी देख रहे हैं सुन रहे हैं सब कुछ मीडिया की देन है अगर हम सुरक्षित हैं तो मीडिया की ही वजह से और कुछ नया सीखते हैं तो मीडिया की वजह से।
इस अवसर पर डॉ0 ललित भारद्वाज, सम्पादक न्यूज़ फस्र्ट टीवी, दैनिक जागरण से सन्तोष शुक्ला, एनडीटीवी से शरत चन्द्रा, भाष्कर न्यूज के पश्चिमी उप्र प्रभारी मुनव्वर चौहान, भाष्कर न्यूज से ही शादिक खान, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र प्रताप चौहान, टोटल टीवी से पंकज कुमार मंगल, दैनिक प्रभात से लियाकत मंसूरी, मेरठ मंगल के सम्पादक आदेश जैन, पत्रकार अनुरोध चौहान, पब्लिक जजमेंट की सम्पादक पूजा रावत शर्मा, राष्ट्रीय मानवाधिकार के सम्पादक अखिल कृपाशंकर आदि के अतिरिक्त नेशनल दुनिया, शाह टाइम्स, हिन्दुस्तान, जागरण, अमर उजाला के कई बुद्धिजीवी पत्रकार व फोटोग्राफर उपस्थित रहे। कार्यक्रम में नई पीढ़ी के ब्यूरो ची$फ पनीत शर्मा, रिपोर्टर अमित कनौजिया, सम्पादकीय सहयोगी विजय मिश्र, आयाुतोष मिश्र, विट्टू सैनी आदि का सम्पाूर्ण सहयोग रहा।



Jul 6, 2014

=> हर लडकी के लिए प्रेरक कहानी...

लड़कों के लिए अनुकरणीय शिक्षा..., कोई भी लडकी की सुदंरता उसके चेहरे से ज्यादा दिल की होती है।

  •  प्रिया मिश्रा 
अशोक भाई ने घर मेँ पैर रखा....‘अरी सुनतीे हो !'
आवाज सुनते ही अशोक भाई की पत्नी हाथ मेँ पानी का गिलास लेकर बाहर आयी और बोली
"अपनी सोनल का रिश्ता आया है,
अच्छा भला इज्जतदार सुखी परिवार है,
लडके का नाम युवराज है ।
बैँक मे काम करता है।
बस सोनल हाँ कह दे तो सगाई कर देते है."
सोनल उनकी एकमात्र लडकी थी..
घर मेँ हमेशा आनंद का वातावरण रहता था ।
कभी कभार अशोक भाई सिगरेट व पान मसाले के कारण उनकी पत्नी और सोनल के साथ कहा सुनी हो जाती लेकिन
अशोक भाई मजाक मेँ निकाल देते ।
सोनल खूब समझदार और संस्कारी थी ।
S.S.C पास करके टयुशन, सिलाई काम करके पिता की मदद करने की कोशिश करती ।
अब तो सोनल ग्रज्येएट हो गई थी और नोकरी भी करती थी
लेकिन अशोक भाई उसकी पगार मेँ से एक रुपया भी नही लेते थे...
और रोज कहते ‘बेटी यह पगार तेरे पास रख तेरे भविष्य मेँ तेरे काम आयेगी ।'
दोनो घरो की सहमति से सोनल और
युवराज की सगाई कर दी गई और शादी का मुहूर्त भी निकलवा दिया.
अब शादी के 15 दिन और बाकी थे.
अशोक भाई ने सोनल को पास मेँ बिठाया और कहा-
" बेटा तेरे ससुर से मेरी बात हुई...उन्होने कहा दहेज मेँ कुछ नही लेँगे, ना रुपये, ना गहने और ना ही कोई चीज ।
तो बेटा तेरे शादी के लिए मेँने कुछ रुपये जमा किए है।
यह दो लाख रुपये मैँ तुझे देता हूँ।.. तेरे भविष्य मेँ काम आयेगे, तू तेरे खाते मे जमा करवा देना.'
"OK PAPA" - सोनल ने छोटा सा जवाब देकर अपने रुम मेँ चली गई.
समय को जाते कहाँ देर लगती है ?
शुभ दिन बारात आंगन में आयी,
पंडितजी ने चंवरी मेँ विवाह विधि शुरु की।
फेरे फिरने का समय आया....
कोयल जैसे कुहुकी हो ऐसे सोनल दो शब्दो मेँ बोली
"रुको पडिण्त जी ।
मुझे आप सब की उपस्तिथि मेँ मेरे पापा के साथ बात करनी है,"
“पापा आप ने मुझे लाड प्यार से बडा किया, पढाया, लिखाया खूब प्रेम दिया इसका कर्ज तो चुका सकती नही...
लेकिन युवराज और मेरे ससुर जी की सहमति से आपने दिया दो लाख रुपये का चेक मैँ वापस देती हूँ।
इन रुपयों से मेरी शादी के लिए लिये हुए उधार वापस दे देना
और दूसरा चेक तीन लाख जो मेने अपनी पगार मेँ से बचत की है...
जब आप रिटायर होगेँ तब आपके काम आयेगेँ,
मैँ नही चाहती कि आप को बुढापे मेँ आपको किसी के आगे हाथ फैलाना पडे !
अगर मैँ आपका लडका होता तब भी इतना तो करता ना ? !!! "
वहाँ पर सभी की नजर सोनल पर थी...
“पापा अब मैं आपसे जो दहेज मेँ मांगू वो दोगे ?"
अशोक भाई भारी आवाज मेँ -"हां बेटा", इतना ही बोल सके ।
"तो पापा मुझे वचन दो"
आज के बाद सिगरेट के हाथ नही लगाओगे....
तबांकु, पान-मसाले का व्यसन आज से छोड दोगे।
सब की मोजुदगी मेँ दहेज मेँ बस इतना ही मांगती हूँ ।."
लडकी का बाप मना कैसे करता ?
शादी मे लडकी की विदाई समय कन्या पक्ष को रोते देखा होगा लेकिन
आज तो बारातियो कि आँखो मेँ आँसुओ कि धारा निकल चुकी थी।
मैँ दूर से सोनल को लक्ष्मी रुप मे देख रहा था....
501 रुपये का लिफाफा मैं अपनी जेब से नही निकाल पा रहा था....
साक्षात लक्ष्मी को मैं कैसे लक्ष्मी दूं ??
लेकिन एक सवाल मेरे मन मेँ जरुर उठा,
“भ्रूण हत्या करने वाले लोगो को सोनल जैसी लक्ष्मी मिलेगी क्या"

Jun 27, 2014

=> धर्म के सहारे अधर्म का स्वागत


एक यात्रा की बात है। कुछ वृद्ध स्त्री-पुरुष तीर्थ जा रहे थे। एक संन्यासी भी उनके साथ थे। मैं उनकी बात सुन रहा था। संन्यासी उन्हें समझा रहे थे, 'मनुष्य अंत समय में जैसे विचार करता है, वैसी ही उसकी गति होती है। जिसने अंत संभाल लिया, उसने सब संभाल लिया। मृत्यु के क्षण में परमात्मा का स्मरण होना चाहिए। ऐसे पापी हुए हैं, जिन्होंने भूल से अंत समय में परमात्मा का नाम ले लिया था और आज वे मोक्ष का आनंद लूट रहे हैं।'
          संन्यासी की बात अपेक्षित प्रभाव पैदा कर रही थी। वे वृद्धजन अपने अंत समय में तीर्थ जा रहे थे और मनचाही बात सुन उनके हृदय फूले नहीं समाते थे। सच ही सवाल जीवन का नहीं, मृत्यु का ही है और जीवन-भर के पापों से छूटने को भूल से ही सही, बस परमात्मा का नाम लेना ही पर्याप्त है। फिर वे भूल से नहीं जान-बूझकर तीर्थ जा रहे थे।
       मैं उनके सामने ही बैठा था। संन्यासी की बात सुनकर हँसने लगा तो संन्यासी ने सक्रोध पूछा, 'क्या आप धर्म पर विश्वास नहीं करते हैं?'
       मैंने कहा, 'धर्म कहाँ है? अधर्म के सिक्के ही धर्म बनकर चल रहे हैं। खोटे सिक्के ही विश्वास माँगते हैं, असली सिक्के तो आँख चाहते हैं। विश्वास की उन्हें आवश्‍यकता ही नहीं। विवेक जहाँ अनुकूल नहीं है, वहीं विश्वास माँगा जाता है। विवेक की हत्या ही तो विश्वास है। लेकिन न तो अंधे मानने को राजी होते हैं कि अंधे हैं और न विश्वासी राजी होते हैं। अंधों ने और अंधों के शोषकों ने मिलकर जो षड्‍यंत्र किया है, उसने करीब-करीब धर्म की जड़ काट डाली है। धर्म की साख है और अधर्म का व्यापार है।
       यह जो आप इन वृद्धों को समझा रहे हैं, क्या उस पर कभी विचार किया है? जीवन कैसा ही हो, बस अंत समय में अच्छे विचार होने चाहिए? क्या इससे भी अधिक बेईमानी की कोई बात हो सकती है। और क्या यह संभव है कि बीज नीम के, वृक्ष नीम का और फल आम के लगा रहे हैं?
       जीवन जैसा है, उसका निचोड़ ही तो मृत्यु के समय चेतना के समक्ष हो सकता है। मृत्यु क्या है? क्या वह जीवन की ही परिपूर्णता नहीं है? वह जीवन के विरोध में कैसे हो सकती है? वह तो उसका ही विकास है। वह तो ‍जीवन का ही फल है। ये कल्पनाएँ काम नहीं देंगी कि पापी अजामिल मरते समय अपने लड़के नारायण को बुला रहा था और इसलिए भूल से भगवान का नाम उच्चारित हो जाने से सब पापों से मुक्त हो मोक्ष को प्राप्त हो गया था।
        मनुष्य का पापी मन क्या-क्या अविष्कार नहीं कर लेता है? और इन भयभीत लोगों का शोषण करने वाले व्यक्ति तो सदा ही मौजूद हैं। फिर भगवान का क्या कोई नाम है? भगवान की स्मृति तो एक भावदशा है। अहंकार-शून्यता की भावदशा ही परमात्मा की स्मृति है। जीवन भर अहंकार की धूल को जो स्वयं से झाड़ता है, वही अंतत: अहं-शून्यता के निर्मल दर्पण को उपलब्ध कर पाता है। यह भूल से किसी नाम के उच्चारण से तो हो नहीं सकता।
         यदि कोई किसी नाम को भगवान मानकर जीवन भर धोखा खाता रहे तो भी उसकी चेतना भगवत-चैतन्य से भरने की बजाय और जड़ता से ही भर जाएगी। किसी भी शब्द की पुनरुक्ति-मात्र, चेतना को जगाती नहीं, और सुलाती है। फिर अजामिल पता नहीं अपने नारायण को किसलिए बुला रहा था। बहुत संभव तो यही है कि अंत समय को निकट जानकर अपने जीवन की कोई अधूरी योजना उसे समझा जाना चाहता हो। अंतिम क्षणों में स्वयं के जीवन का केंद्रीय तत्व ही चेतना के समक्ष आता है और आ सकता है।'
          फिर एक घटना भी मैंने उनसे कही। एक वृद्ध दुकानदार मृत्युशय्या पर पड़ा था। उसकी शय्या के चारों ओर उसके परिवार के शोकग्रस्त व्यक्ति जमा थे। उस वृद्ध ने अचानक आँखें खोलीं और बहुत विकल होकर पूछा, 'क्या मेरी पत्नी यहाँ है?'
          उसकी पत्नी ने कहा, 'हाँ मैं यहाँ हूँ।'
'और मेरे बड़ा लड़का?'
'वह भी है।'
'और बाकी पाँचों लड़के?'
'वे भी हैं।'
'और चारों लड़कियाँ?'
'सभी यहीं हैं। तुम चिंता न करो और आराम से लेट जाओ,' पत्नी ने कहा।
मरणासन्न रोगी ने बैठने की कोशिश करते हुए कहा, 'फिर दुकान पर कौन बैठा है?'

=> नई पीढ़ी के पैगम्बर, दबंगों के भरोसे हैं

  • अशोक रावत
न भूखों के भरोसे हैं, न नंगों के भरोसे हैं, 
सियासत के खिलाड़ी आज दंगों के भरोसे हैं। 

भरोसा बाजपेयी, लोहिया,गाँधी पे किसको है,
नई पीढ़ी के पैगम्बर, दबंगों के भरोसे हैं। 

बदलते क्यों नहीं हैं लोग इस गंदी सियासत को, 
जो पैंसठ साल से लुच्चे-लफ़ंगों के भरोसे हैं। 

भरोसा मत करो इन बेइमानों की नसीहत पर,
हमारे ख़्वाब आज़ादी के रंगों के भरोसे हैं।

उधर बेशर्म लोगों की फरेबों से भरी दुनिया,
इधर ये नौजवाँ हैं जो उमंगों के भरोसे हैं। 

=> कहीं ज़ुल्मो-सितम सहने के हम आदी न हो जायें

  • अशोक रावत
हमारी चेतना पर आँधियाँ हाबी न हो जायें,
कहीं ज़ुल्मो-सितम सहने के हम आदी न हो जायें।
         कहीं ऐसा न हो जाये भुला ही दें परिंदों को,
         कहीं ये पेड़ कटने के लिये राज़ी न हो जायें।
डुबो दें बीच दरिया में हमारी नाव ले जा कर,
तमाशा देखनेवाले कहीं माँझी न हो जायें।
          हमें डर है अहिंसा, प्रेम, करुणा, दोस्ती, ईमान,
         बदलते दौर में अलफ़ाज़ ये गाली न हो जायें।
कहीं ये गौडसे इतिहास का नायक न हो जाये,
कहीं मायूस इस इतिहास से गाँधी न हो जायें।

=> ये कारोबार में उलझे हुए लोगों की दुनिया है


  • अशोक रावत
मदद के वास्ते खुलकर मना कोई नहीं करता,
हलफ़ तो सब उठाते हैं वफ़ा कोई नहीं करता।

उसे आकाश में उड़ने के सपने तो दिखाते हैं,
मगर पिंजरे से पंछी को रिहा कोई नहीं करता।

दुआ में हाथ तो अब भी उठाते हैं मेरे अपने,
मेरे हक़ में मगर दिल से दुआ कोई नहीं करता।

ये कारोबार में उलझे हुए लोगों की दुनिया है,
निगाहें फेर लेते है, दया कोई नहीं करता।

ज़रा सी बात हो सब दिल में लेके बैठ जाते हैं,
किसी से अब यहाँ शिकवा-गिला कोईनहीं करता।

सभी को एक जन्नत चाहिए अपने लिए लेकिन,
ज़रूरी फर्ज़ हैं उनको अदा कोई नहीं करता।

Jun 24, 2014

=> घरवाली और कामवाली की सन्दर्भ सहित व्याख्या

 
वैसे तो उपरोक्त दोनों वालियां एक ही जेंडर की होती हैं तथापि गूढ़ अध्ययन करें तो मालुम होगा कि इनमें विपरीत जेंडर का भी समावेश अलग-अलग प्रतिशत में व्याप्त रहता है। जैसे घरवाली शादी के एक-दो साल तक तो हंड्रेड परसेंट फीमेल रहती है। घरवाली रहती है।

  • प्रमोद यादव। 


वैसे तो उपरोक्त दोनों वालियां एक ही जेंडर की होती हैं तथापि गूढ़ अध्ययन करें तो मालुम होगा कि इनमें विपरीत जेंडर का भी समावेश अलग-अलग प्रतिशत में व्याप्त रहता है। जैसे घरवाली शादी के एक-दो साल तक तो हंड्रेड परसेंट फीमेल रहती है। घरवाली रहती है। फिर धीरे-धीरे उसमे मेल के गुण (और अवगुण) परिलक्षित होने लगते है। एक-दो बच्चों के बाद वह जननी से जेलर हो जाती है। घर की रानी से-रानी लक्ष्मीबाई बन जाती है। मर्दानी हो जाती है। पूरे एट्टी परसेंट।
          अब दूसरे क्रम पर चले- कामवाली। ये होती तो घरवाली की तरह फीमेल ही है पर इ
नमें भी मेलवाला गुण कूट-कूट कर भरा होता है। जैसे भंवरा किसी एक फूल पर नहीं टिकता वैसे ही कामवाली भी एक घर में कभी नहीं टिकती इन्हें कितना भी कुछ लो-दो, खिलाओ-पिलाओ, पुचकारो इन्हें तो बस छोड़ बाबुल का घर की तरह घर छोड़ना है यानी छोड़ना है। हाथ जोड़ो, विनती करो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे मर्दों को इधर-उधर मुंह मारने की आदत होती है वैसे ही इन्हें नए-नए ठिकानों में बर्तन मांजने की हसरत होती है। लेकिन शाश्वत सत्य यह है की जैसे घरवाली के बिना घर,घर नहीं होता है, वैसे ही कामवाली के बिना घरवाली,घरवाली नहीं होती बल्कि झाड़ू-पोंछा, चौका-बर्तन करते खप्परवाली हो जाती है। 'न मांगू सोना-चांदी, न मांगू हीरे-मोती' की तर्ज पर उसे किसी दिल की नहीं अपितु एक अदद कामवाली की ही दरकार रहती है। जिस घर में ये दोनों होते हैं, उसे ही एक आदर्श घर कहा जाता है। घर में घरवाली न हो और सुबह-शाम कामवाली दिखाई दे तो हंगामा घर में घरवाली हो और कामवाली न हो तो भी हंगामा कुल मिलाकर दोनों हंगामा ही हंगामा अब इन दोनों के स्टेटस. आचार-व्यवहार, चाल-चलन, क्षमता-अक्षमता, गुण-अवगुण, समानता-असमानता पर भी चर्चा करते हैं।
            सबसे पहले घरवाली की:- क्योंकि सबसे पहले यही आती है घर में। घरवाली का चुनाव घर के बड़े बुजुर्ग और नाते रिश्तेदार करते हैं यह काफी देख-परख कर वर के मैचिंग की लाई जाती है।अमूमन देखने में देखने लायक होती है। घरवाली का स्टेटस सबसे ऊपर और वैध होता है। संवैधानिक तौर पर वह घरवाली ही नहीं वरन गृहस्वामिनी भी होती है। पूरे नाते-रिश्तेदारों का उस पर वरदहस्त रहता है। उसके सुख-दुःख, आशा-निराशा, जय-पराजय आदि पूरे परिवार और समाज से जुड़े होते है इसलिए वह पूरी तरह सेक्योर रहती है. बड़ी ही संस्कारिक होती है। पति की प्रापर्टी- जमीन दृजायदाद, का हिस्सेदार होती है। घर की लक्ष्मी होती है। पर बेचारी बहुत बेचारी भी होती है। अमूमन सब घरवालियां एक जैसी ही होती हैं सीधी-सरल, निष्कपट और निपट बेवकूफ। पति के वचनों को प्रवचन मान चलती है वह फ्लर्ट भी करे तो बर्दाश्त कर लेती है।पति के सारे अशिष्ट कारनामों को शिष्टता से सह लेती है। उसे हमेशा इस बात का संतोष रहता है कि वह परिवार में नंबर वन है और रहेगी और इसी गलतफहमी में जिंदगी गुजार देती है
अब बात करते है- कामवाली की -
            इनकी उत्त्पति, आदत, हैसियत, जरुरत, चाल-चलन, गुण-अवगुण और कार्य-शैली की--.पुराने ज़माने में यह केवल धनकुबेरों के घरो में पाई जाती थी जहां घर की आबादी अक्सर तीस-चालीस से ऊपर की होती ऐसे घरों में कभी कोई चीज अपने ठिकाने पर नहीं पाई जाती। जैसे बबलू का टेनिसबाल, कालू का कम्पास, टिंकू की टाई, हेमा का हेयरबैंड, चाचा का चश्मा, पायल का पर्स, सोनम की शू आदि आदि इन सबको ढूंढकर सौपना ही इनका पहला काम होता .इसमें जो प्रवीण होती, वही सालों साल टिकती यह सर्विस वो फ्री देती पोंछा लगाने या बर्तन-चौका का ही पैसा लेती और इतना लेती जितना कि एक स्कूल मास्टर का वेतन तीज-त्यौहार में बोनस के तौर पर अच्छे और मंहगे गिफ्ट अलग से बिलकुल फ्री पैसेवाले लोग ही इन्हें एफोर्ड कर पाते।
         आम घरो में तो घर की मां -बेटियां ही बर्तन-चौंका, झाड़ू-पोंछा कर लेती हैं। इन्हें इनकी कतई दरकार नहीं होती यहां शादी कर स्थाई कामवाली ले आने का चलन होता है। धीरे-धीरे यह बिमारी उन परिवारों को लगी जहां पति-पत्नी दोनों नौकरीशुदा होते यहां कामवाली एक साथ कई रोल निभाती दंपत्ति के आफिस जाने के बाद अंशकालिक गृहस्वामिनी छोटे बच्चों की पार्ट-टाईम मम्मी और सबसे आखिर में कामवाली कभी-कभी ऐसे घरों में कामवाली घरवाली का फर्ज भी निभाने लगती है। लेकिन भांडा फूटते ही घरवाली द्वारा तुरंत टर्मिनेट कर दी जाती हैं फिर वह बिना कोई शर्मों-हया के दूसरे ही दिन मोहल्ले के किसी और घर में सेट हो जाती हैं नौकरी छूटते ही दूसरी नौकरी हाजिर ये कभी बेरोजगार नहीं रहतीं।
          आज की तारीख में हर परिवार में इनकी दरकार है। क्या अमीर और क्या आम घरवाली के बिना घर चल सकता है पर कामवाली बिना एक दिन भी भारी पड़ता है, इन्हें ढूंढना दुनिया का सबसे ज्यादा टफ काम है।घरवाली तो थोड़े से प्रयास से मिल जाती है पर कामवाली तौबा-तौबा। इन्हें खोजने में जान निकल जाती है।गांव के लोग बड़े सुखी होते हैं ये घर में बहु लाकर टू इन वन काम करते हैं. बेटे के लिए घरवाली और घर के लिए-कामवाली ये दोनों भूमिकाएं गांव की बहुएं बखूबी सीता और गीता की तरह निभाती हैं इसलिए गावों में कामवाली की कोई क़द्र नहीं होती पर शहरों में यह अनमोल होती हैं जाने जां ढूंढता हूं तुम्हें तुम कहां जैसी स्थिति रहती है हर घर और घर वाले की
            तरह-तरह की होती हैं ये कामवालियां- कोई काली तो कोई गोरी, कोई सुन्दर तो कोई डायन,कोई भद्र तो कोई अभद्र, कोई साफ़-सुथरी तो कोई गन्दी, कोई कानी तो कोई खोरी(लंगड़ी) .हर पति की ख्वाहिश होती है कि कामवाली सुन्दर, गोरी, और अच्छे नाक-नक्शवाली हो पर पत्नियां हमेशा उनके साथ अन्याय कर भद्दी-कानी,कुरूप ही रखती हैं इसके पीछे उद्देश्य होता है कि पति सेफ रहे दरअसल ऐसा कर ये बड़ी बेफिक्री से बाकी कामों को अंजाम दे पाती हैं बड़े घरो की कामवालियां सुन्दर,गोरी और सुशील होती हैं ऊंचे लोग-ऊंची पसंद .यहां चयन करने का अधिकार पतियों के पास होता हैं इन घरों की घरवाली ही अधिकतर कामवाली की तरह दिखती हैं इन घरो में कभी जाएं तो निश्चित ही कामवाली को भाभी और भाभी को कामवाली समझेंगे .पर घर मालिक ऐसा कतई नहीं समझते बड़े लोग घरवाली और कामवाली को समान दर्जा देते हैं बल्कि कामवाली को घरवाली से भी ज्यादा महत्व देते हैं .इसलिए कभी कामवाली काकाजी के साथ सिनेमाहाल में दिख जाती है तो कभी भतीजे के साथ माल में .ऐसे घरों में कामवाली कई-कई साल टिक जाती है वरना हर किसी को शिकायत रहती है कि ये मछली की तरह होती हैं कब हाथ से फिसल जाए पता नहीं चलता फिर ढूंढते रहो
            कुल मिलाकर कहें तो घरवाली-कामवाली एक दूसरे की पूरक होती हैं दोनों मिलकर ही परिवार को ठेलती हैं लेकिन कभी-कभी इन दोनों का स्थानापन्न एक और निरीह प्राणी भी होता है।जैसे फिलहाल मैं घरवाली तो सुबह से दो-तीन उल्टियां कर बिस्तर में कैरी के मजे ले रही है। और अभी-अभी का ब्रेकिंग न्यूज है कि कामवाली आज नहीं आने वाली। वह भी अपने घर में उल्टियों का मजा ले रही अब ऐसी स्थिति में घर का चौका-बर्तन मुझे ही करना है। तो चलता हूं दोस्तों। फिर मिलेंगे।

Jun 23, 2014

=> देव भूमि में तांडव क्यों ?

  • रुपाश्री शर्मा, गुमला, झारखण्ड 

माँ गंगा की कहानी, माँ गंगा की जुबानी ..............
मुझको विधवंसिनी बता रहा है
देखो मनुस्य आज कितना चिल्ला रहा है
कह रहा मैं कर रही मनमानी
काल बन बैठा मेरा ये पानी
सारे ही तट -बंध टूट गए
प्रसाशन के पशीने छूट गए
कह रहा मनुष्य
पानी नही है ये तबाही है तबाही
प्रकृति को सुनाई नहीं देती मासूमो की दुहाई
नदियों के इस बर्ताव से मानवता घायल हो जाती है
देखो नदियां बरसात के मौसम में पागल हो जाती है
ये सुन मैं मुस्कुरा रही और मांग रही आपसे जवाब आप बताओ ऐसा जुल्म क्यों ??
मुझे क्या मेरी जमीन छीनने का डर सालता नही ?
क्या मनुष्य मेरी निर्मल धारा में कूड़ा -करकट डालता नही ?
धार्मिक आस्थाओं का कचरा मुझे झेलना पड़ता नहीं ?
जिन्दा से लेकर मुर्दों का अवशेष अपने भीतर ठेलना पड़ता नही ?
जब मेरी धाराओं में आकर मिलता है शहरी नालों का बदबूदार पानी
तब किसी को दिखाई ना देता है मनुष्य की घृणित मनमानी
तुम निरंतर डाले जा रहे हो मुझमे औद्योगिक विकाश की कबाड़
और फिर पूछते हो जाने कैसे आ जाती है बाढ़
मानव की मनमानी जब अपनी हदें देती हैं
तो प्रकृति भी अपनी शीलता को खुंटी पर टाँग देती है
मेरी ये निर्मल धारा जीवनदायी है
मैंने युगों से खेतों को सींच कर मानव की भूख मिटाई है
और मानव स्वभाव से ही आज आततायी है
मनुष्य ने निरंतर प्रकृति का शोषण किया
अपने ओझे स्वार्थों का पोषण किया
मेरी धाराओं को संकुचित कर शहर बसाया
धयान से देखिये नदी शहर में घुशी या शहर नदी में घुश आया
जिसे बाढ़ का नाम दे कर मनुष्य हैरान परेशान है
दरअसल वो मेरा (गंगा ) नेचुरल सफाई अभियान है
ये तो गंगा का नेचुरल सफाई अभियान है
ये तो गंगा का नेचुरल सफाई अभियान है। 

Jun 17, 2014

=> बच्चों की छुट्टियां और नानी का घर

 
राहुल की मां उसे नानी के घर चलने के लिए मना रही थी। मगर राहुल जाना नहीं चाहता था। उसे अपने दोस्त, कम्प्यूटर और मोबाइल की दुनिया ज्यादा पसंद थी। गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे अब मौज-मस्ती करना ज्यादा पसंद करते हैं। उन्हें न दादी के घर जाना अच्छा लगता है और न नानी के घर। 
             राहुल की मां उसे नानी के घर चलने के लिए मना रही थी। मगर राहुल जाना नहीं चाहता था। उसे अपने दोस्त, कम्प्यूटर और मोबाइल की दुनिया ज्यादा पसंद थी। गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे अब मौज-मस्ती करना ज्यादा पसंद करते हैं। उन्हें न दादी के घर जाना अच्छा लगता है और न नानी के घर। माता-पिता बच्चों को सही शिक्षा नहीं दे पाते इसलिए वे परिवार का महत्व और जीवन मूल्य के बारे में बताने के लिए दादी या नानी के घर ले जाना बेहतर समझते हैं।
          आधुनिक जीवनशैली ने माता-पिता को इतना व्यस्त बना दिया है कि उनके पास बच्चों के लिए समय ही नहीं। इसलिए गर्मियों में घर में हुड़दंग मचाने वाले बच्चों से निजात पाने के लिए कई मां-बाप उन्हें हॉबी क्लासेज में डाल देते हैं। नतीजा बच्चे छुट्टियों का मजा नहीं ले पाते। वैसे भी महीने भर की क्लास में ढंग से कुछ सीख भी नहीं पाते। पैसे की बर्बादी अलग होती है।
याद कीजिए अपनी गर्मी की छुट्टियों के दिन। नानी के घर जाने के लिए किस तरह ट्रेन में खिड़की वाली सीट पर पहले जाकर बैठ जाते थे ताकि रास्ते भर बाहर का नजारा देख सकें। चलती पटरियों को देखकर खुश हो जाते थे कि अब मजे के दिन शुरू होने वाले हैं। जी भर के सोएंगे। नानी का प्यार मिलेगा। मनपसंद खाने-पीने की चीजें मिलेंगी। साथ ही बाग-बगीचे में होगी दिन भर की धमा चौकड़ी। न धूप का डर न लू की चिंता। साथ में यह भी समझते थे कि परिवार क्या होता है। इस तरह बच्चों को अच्छे संस्कार मिलते थे। आपको यह भी याद हो कि रात में थक-हार कर जब सोने जाते तो नानी सिर को सहलाते हुए कहानियां सुनाती और तब कुछ ही देर में मीठी नींद आ जाती।

गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को अपने मन की करने का पूरा हक है। इसलिए उन्हें थोड़ी मस्ती करने दें। छुट्टियों में बच्चों के साथ कहीं घूमने निकल जाएं ताकि वे देश की संस्कृति और सभ्यता के बारे में जान सकें और उससे जुड़ सकें।

             गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को अपने मन की करने का पूरा हक है। इसलिए उन्हें थोड़ी मस्ती करने दें। छुट्टियों में बच्चों के साथ कहीं घूमने निकल जाएं ताकि वे देश की संस्कृति और सभ्यता के बारे में जान सकें और उससे जुड़ सकें। उनके साथ ज्यादा से ज्यादा लाभ समय बिताने की कोशिश करें क्योंकि यही समय होता है जब आप बच्चों से खुल कर और आराम से बात कर सकते हैं। वरना भागदौड़ की जिंदगी में बच्चों से मिलने का समय नहीं बचता।
कुछ दिन के लिए उन्हें नानी-दादी के पास घुमाने के लिए ले जाएं ताकि उन्हें अपने रिश्ते का महत्व भी समझते का मौका मिले। उनके साथ रह कर वह काफी कुछ सीख सकते हैं।
              छुट्टियों के चार-पांच दिन उन्हें ऐसी जगह ले जाएं, जहां वह कुछ सीख सकें। जैसे चिड़ियाघर, विज्ञान केंद्र, संग्रहालय, तारामंडल या कोई ऐतिहासिक धरोहर वाली जगह। मगर इन सबसे बड़ी बात गर्मियों में बच्चों का ख्याल रखना जरूरी है। उनके मोबाइल का डेटा, फेसबुक पर क्या चल रहा है और उसके कौन-कौन दोस्त है, सबकी जानकारी रखें। नेट पर बैठते समय बच्चों के साथ जरूर रहें और बातें शेयर करें।
                   इसके साथ ही गर्मी की छुट्टियों में बच्चों की सेहत का ध्यान रखना जरूरी है ताकि वे बीमार न पड़ें। इन दिनों की मौज-मस्ती के दौरान खाने-पीने में लापरवाही भारी पड़ती है। घर में बने शर्बत, ठंडाई, लस्सी दें। बाहर से शीतल पेय मंगाने पर रोक लगाएं और उसमें हानिकारक तत्वों के बारे में बच्चों को बताए। बाहर के गोल गप्पे और चाट खाने के बजाए बच्चों के लिए ये चीजें घर पर ही बनाएं। फ्रूट जूस और हरी सब्जियों पर इन दिनों जोर दें। बच्चों को गर्मियों में ज्यादा से ज्यादा पानी पीने के लिए कहें। जब बच्चे धीरे-धीरे बात मानने लगें तो बाहर से टैक्सी बुलाइए और अपने शहर की ही सैर पर निकल जाइए। ख्याल रहे कि कड़ी धूप में बच्चे न रहें।

Jun 14, 2014

=> सर्कस के शेर और पार्लियामेंट

        दफा दिल्‍ली में सर्कस के दो शेर छूट कर शहर में भाग गये। भागे तो दोनों साथ-साथ पर रास्‍ते में दोनों अगल-अलग हो गये। दिल्‍ली जैसे मायावी शहर में मनुष्‍य खो जाये ये तो बेचारे जानवर थे। सात दिनों तक भटकते रहे। एक शेर तो बहुत भूखा था। आंखों में उसके प्राण आये हुए थे। एक नाले कि पुलिया के नीचे किसी तरह से छुप-छुपा कर उसने दिन काटे। खाने को वहां कुछ नहीं था। परेशान और लाचार उस शेर को सर्कस की बहुत याद आ रही थी। की चलो कैद ही सही समय पर खाने को कुछ मिल ही जाता था। अब यहां किसी से पूछ कर दिल्‍ली चिडिया घर में ही चला जाये तो जान बचे। अचानक सातवें दिन उसका वह बिछुड़ा
साथी आ गया। उसे देख कर उसे कुछ राहत हुई,पर उसे देख कर भरोसा नहीं आया की वह तो बहुत हृष्ट पुष्ट है। और उसके चेहरे पर खुशी है। बहुत गड़ा भी खूब था, पहले शेर से तो चला ही नहीं जा रहा था। किसी तरह अपनी जान बचाये हुआ था।
       पहले ने दूसरे से पूछा यार तू कहां चला गया था। मेरे दिन तो बहुत मुसीबत में गूजरें न जाने किस घड़ी में मैंने तेरी बात मान कर सर्कस से भागने की योजना बनाई। मैं तो बहुत पछता रहा हूं। कई बार मैने वहां जाने की कोशिश भी की पर रास्‍ते का पता नहीं चला। किसी से पूछ भी नहीं सकता। हम तो यहां दोस्‍त पानी को भी तरस गये। तुम्‍हारे चेहरे पर तो बड़ी । कहां पर दाव चलाया। कहां छिपे रहे इतने दिन?
दूसरे शेर ने कहां—‘’मैं तो पार्लियामेंट हाउस में छिपा था।‘’
पहले ने कहां—बड़ी ही खतरनाक जगह चुनी तुमने,वहां पर तो इतनी सुरक्षा है , पुलिस है, मीडिया वाले है। तुम गये कैसे, क्‍या तुम्‍हें जरा भी डर नहीं लगा। बहुत बहादूर हो यार तुम तो। गजब का साहस है तुम्‍हारी।‘’
दूसरे ने कहा—यार वहां सब दिखावा है, कोई किसी को नहीं चेक करता। तू जानता ही है। भारत की सुरक्षा व्‍यवस्‍था। जब भी कोई हादसा होता है तो दो चार दिन के लिए…फिर टाये-टाये फीस। तूने पढ़ा नहीं अभी तो कुछ साल पहले पाकिस्‍तानी आतंकवादियों ने उस पर हमला भी कर दिया था। तू नाहक डरता है। मेरे साथ चल। मैं तो वहां रोज मिनिस्‍टर को प्राप्‍त कर लेता था। और पूरा दिन पेड़ की छाव में मजे से सोता था। आज तो तेरी याद आयी। की चलो देखू तू कहा हे।
पहले ने कहा—यह तो बहुत डेंजर काम है। ना भाई यह सुन कर तो मेरे पैर कांप रहे है। फंस जायेंगे। चलो किसी तरह से अपने सर्कस ही वापस लोट चलते है।‘’
दूसरे ने कहां—यार तू चल कर तो देख। कितना मजा आयेगा। वहां एम. पी मिनिस्टरों का लजीज मांस तू सब स्वाद भूल जायेगा। जब भी वहाँ से कोई मिनिस्‍टर नदारद होता है। एवरी वन इज़ कंपलीटली सैटिस्‍फाइड।‘’ कोई झंझट नहीं होती है। नौ वन लिसिन्‍स हिम। काई कभी भी अनुभव नहीं करता। वह जगह इतनी बढ़िया है कि वहां जितने लोग है किसी को भी प्राप्‍त कर जाओ। बाकी लोग प्रसन्‍न होते है। तुम भी वहीं चले चलो। वहां आपने दो क्‍या पूरे सर्कस के सब शेर भी आ जाये तो भी भोजन की कोई कमी नहीं होगी। साल भर का तो भोजन बड़े मौज से है। क्‍योंकि जैसे ही जगह खाली होगी। भोजन खुद ही पार्लियामेंट में आने को बेताब इंतजार कर रहा होगा। पूरे मुल्क से भोजन आता ही रहेगा। हमारे कम करने से कम हो ही नहीं सकता। वहां प्राविधान ही ऐसा किया हुआ है। अब तू समझ भोजन खुद ही अपने पैसे खर्च कर बहा आने को तैयार है। ऐसा तूने कभी सूना है। और कितनों की तो वहां फोटो लगी है। अब तू चल…..
                                                              पर बेचारा कमजोर शेर हिम्‍मत नहीं कर सका वहां जाने की….
                                                                                                                                                  (osho)

Jun 11, 2014

=> मैं फूलों कि डाली भी और, मैं ही तेज़ कटारी हूँ ' मैं नारी हूँ '


  • रूपाश्री शर्मा,गुमला झारखण्ड 


मैं ही दुर्गा, मैं ही चंडी, मैं ही बनी कपाली भी
मैं मन को वश में कर लेती, बन शराब कि प्याली भी
मैं फूलों कि डाली भी और, मैं ही तेज़ कटारी हूँ

' मैं नारी हूँ '.................

सृष्टि को पल्लू में बांधे, घूम रही मैं नारी हूँ !
मन के आसमानों पर तारे, मेरी चूनर से ही टंगे
मैं ही अमावस काली भी, मैं ही पूनम उजियारी हूँ !

मैं ही हकीकत मैं ही फ़साना, झूठ सांच सब मुझमें भरे
मैं ही कवियों कि भी कल्पना, मैं ही स्वपन सकारी हूँ !

मेरी ही जागीर जहाँ हो, मैं मजदूरी वहाँ करूँ
मैं ही हुकूमत घर की हूँ, और मैं ही पहरेदारी हूँ !

मुझमें ब्रम्हा विष्णु शिव हैं, मैं कण कण से पूजित भी
क्यूंकि प्रसव से जन्म भी दे दूँ, और मैं ही संहारी हूँ !

मैं मर्यादा बिस्तर की भी, मैं ही कन्या पूजन में
मैं ही अंकशायिनी भी, मैं ही पूजन अधिकारी हूँ !

मैं वीरों की मयान में, शमशीर बनी पीती भी लहू
और कमाल है ये मेरा, मैं रात पड़े श्रृंगारी हूँ !

जान लुटा कर जिम्मेदारी, पूरी करनी हो तो करूँ
जितनी बड़ी ताकत हूँ पुरुष की, उतनी बड़ी लाचारी हूँ !

मैं ही खट्टा-खारा-कड़वा, मैं जीवन का हर अनुभव
मैं ही मीठी स्वाद की रानी, मैं तीखी तर्रारी हूँ !

Jun 10, 2014

=> चंडीगढ़ में पत्रकार पर कमांडो का हमाल


इसे अंग्रेजों की गुलाम मानसिकता कहें या बदला लेने की भावना या फिर तानाशाही दीवारों को फाँदती हुयी मरणासन्न हो रही दिमागी उपज। चौथे स्तम्भ का दर्जा प्राप्त मीडिया पर हमला बोलने के तो कई मामले आते रहते हैं मगर चंडीगढ़ में पत्रकारों पर हुये हमले का यह मामला एकदम अलग है। अपनी काली करतूतों को छिपाने और कमियों को बाहर न होने देने का दिमागी विकृत रूप उस समय देखने को मिला जब भवन में लगी आग पर कवरेज करने गए पत्रकार को वहाँ के कमांडों ने दौड़ा दौड़ा कर पीटा और वहा मौजूद्द पुलिसकर्मी मूकदर्शक बने देखते रहे, यही नहीं वहा खड़े पुलिस कर्मी भी इस घटना पर बीच-बचाव करने की जहमत तक नहीं उठाया। 


चंडीगढ़, 9 जून : चंडीगढ़ में सेक्टर 17 स्थित एक भवन में आग लगने पर कवरेज करने गए पत्रकार पर कमांडो और पुलिस का चौतरफा हमला, पीड़ित
पत्रकार के ही खिलाफ पुलिस ने लिख दी एफआईआर।                
                आपरेशन सैल में तैनात एक कमांडो ने अपनी गुंडागर्दी की हदें पार करते हुए सैक्टर 17 में रविवार हुई आगजनी की घटना की कवरेज करने गए एक पत्रकार पर बुरी तरह हमला बोल दिया। हमला एक दैनिक अखबार के पत्रकार अविनाश पर हुआ। यही नहीं, उल्टा सैक्टर 17 थाना पुलिस ने कांस्टेबल की ही शिकायत पर अविनाश के खिलाफ पुलिसकर्मी को चोट पहुंचाने(आई.पी.सी. 323) व सरकारी कर्मी की ड्यूटी में आपराधिक तरीके से बाधा पहुंचाने (353) की धाराओं के तहत केस दर्ज कर दिया। वहीं मौके की तस्वीरों में साफ दिख रहा था कि शिकायतकत्र्ता आपरेशन सैल का कमांडो दीपक खुद घटनास्थल पर अपनी वर्दी का रौब दिखाता हुआ पत्रकार पर हावी हो रहा था। जिस समय यह घटना घटी उस समय चंडीगढ़ पुलिस के कुछ इंस्पैक्टर्स एवं डी.एस.पी. समेत एस.डी.एम.(सेंट्रल) व मीडियाकर्मी मौजूद थे। घटना दोहपर करीब साढ़े बारह बजे घटी। पत्रकार अविनाश के मुताबिक वह मौके पर इंस्पैक्टर जसविद्र सिंह से मिलने गया था। यहां मौके पर जैसे ही वह घटनास्थल की ओर जाने लगा, आपरेशन सैल में तैनात कांस्टेबल दीपक ने पीछे से आकर उसका कॉलर पकड़ उसे धक्का मारा। कांस्टेबल की इस अभद्रता का विरोध करने पर उल्टा कांस्टेबल ने गाली गलौच करते हुए अविनाश पर कार्बाइन के बट से हमला बोल दिया। उसके साथी कमांडोज ने उसे रोकने का प्रयास भी किया। घटना के बाद मौके पर आई.जी. आर.पी. उपाध्याय समेत एस.एस.पी. सुखचैन सिंह गिल एंव गृह सचिव भी पहुंचे। यहां मीडियाकíमयों द्वारा घटना की जानकारी इन वरिष्ठ अफसरों को देने के बाद उन्होंने उचित्त कार्रवाई की बात कही। इसके बाद मीडियाकíमयों ने घटना की तस्वीरें पुलिस हैडक्वार्टर जाकर एस.एस.पी. को दिखाई जिसके बावजूद पुलिस ने अविनाश पर आपराधिक धाराओं में यह केस दर्ज कर दिया। एस.एस.पी. ने मामले की जांच एस.पी.(सिटी) परमिंद्र सिंह को मार्क कर दी है।
प्रैस क्लब की तरफ से दैनिक अखबार के पत्रकार अविनाश पर हुए हमले की निंदा की हैं। इसके साथ ही मांग की गई है कि इस मामलें की आईजी द्वारा निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। दोषी को सजा मिलनी चाहिए।

=> रूसी और भारतीय नागरिकों की आनुवंशिक जड़ें एक

 जय प्रकाश त्रिपाठी 

       रूसी और भारतीय नागरिकों की आनुवंशिक जड़ें एक ही हैं| 8-9 हजार साल पहले दोनों देशों के लोगों के जीनोटाइप पूरी तरह से मेल खाते थे| यह परिणाम हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के जैव रसायन, जैव भौतिकी और चिकित्सा केन्द्र के अनुसंधान कार्यों से प्राप्त हुए हैं|अगर इन परिणामों की पुष्टि अन्य शोधकर्ताओं द्वारा भी हो जाएगी तो इसका मतलब यह होगा कि कभी तो रूसी और भारतीय एक ही जाति का हिस्सा थे| रूसी इतिहासकार और प्राच्यविद् इवान इवान्त्स्की ने रेडियो रूस को दिए अपने एक साक्षात्कार में बताया कि इस जाति का पैतृक घर रूस के एकदम उत्तर में था| वह आगे कहते हैं: 4000 साल पहले प्राचीन स्लाव दक्षिण उराळ की तरफ आये थे और उसके चार सौ साल बाद वह भारत की तरफ रवाना हुए थे, जहां आज भी उसी आनुवंशिक गुणों के लगभग 10 करोड़ उनके वंशज रह रहे हैं| स्लाव जाति के जीनोटाइप का किसी भी प्रकार का स्वांगीकरण नहीं हुआ है| और अभी तक स्लाव जीन से पूरी तरह से मेल खाने वाले जीन वहाँ पाए जाते हैं| आर्यों की एक और लहर ई.पू. तीसरी सहस्राब्दी में मध्य एशिया से पूर्वी ईरान को रवाना हुयी थी और वह ‘ईरानी आर्य’ कहलाए थे|"ऋग्वेद" के एक श्लोक में कहा गया है कि सप्तऋषि नक्षत्र बिलकुल भारतीयों के सिर के ऊपर है| काफी समय बाद यूरोप वासियों ने इस नक्षत्र को ‘बिग डिपर’ का नाम दिया| यहाँ पर दिलचस्प बात यह है कि अगर खगोल विज्ञान की दृष्टि से भारत में रह कर इस नक्षत्र को देखने की कोशिश की जाए तो यह क्षितिज के कहीं ऊपर दिखाई देता है या कुछ जगहों से बिलकुल भी दिखाई नहीं देता है| आर्कटिक सर्कल के पार वह जगह है जहां से सप्तऋषि नक्षत्र सीधे भूमि के ऊपर दिखाई देता है| इसका अर्थ यह हुआ कि वेद ग्रंथों के मंचन के समय भारतीय उत्तरी ध्रुव के पास कहीं रहते थे|
         इस सिद्धांत की पुष्टि कुछ अन्य तथ्य भी करते हैं| कई भारतीय लोकगीत यह दावे करते हैं कि देवताओं के दिन और रात छह महीने लंबे होते हैं| इसे अक्सर एक रंगीन अतिशयोक्ति माना जाता है| लेकिन यह पूरी तरह से भौगोलिक वास्तविकताओं पर आधारित हो सकता है| रूस के एकदम उत्तर में ध्रुवीय दिन और रात होते हैं, जो छह महीने लंबे होते हैं| संस्कृत से उद्धरित रूस की नदियों के नाम भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि कभी तो रूस में भारतीय रहते थे| रूस के कीरव इलाके में नदी सूर्या है और रूस की नदी वोल्गा की सबसे बड़ी उपनदी का नाम कामा है जो प्रेम के देवता कामदेव को समर्पित है|इस सिद्धांत के विरोधी स्लाव और भारतीयों के बीच दिखाई देने वाले मानवविज्ञान मतभेदों की तरफ इशारा करते हैं| लेकिन हिंदुस्तान में रहने वाले लोगों में अभी भी ऐसे लोग हैं जिनके रूसी होने का भ्रम होता है| वर्तमान पाकिस्तान में स्थित दक्षिणी हिंदूकुश के पहाड़ों में रहने वाली कलश जनजाति के लोगों और रूसियों में अंतर करना लगभग असंभव है| इस जनजाति के लोगों की त्वचा गोरी, बाल हलके भूरे तथा अधिकतर की आंखों का रंग हल्का हरा होता है| यह उन्हीं आर्यों के वंशज हो सकते हैं जो कभी तो रूस से भारत आये थे|आनुवंशिक वैज्ञानिकों के शोधकार्यों से पता चलता है कि आधुनिक भारतीयों के पूर्वज आर्य थे| यह वही आर्य थे जो अपने अर्जन को रथों पर लाद कर उत्तरी रूस से दक्षिण की तरफ नए घर की तलाश में रवाना हुए थे| अभी तक केवल इस नए घर की तलाश के लिये निकलने का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है| 

-('रेडियो रूस' से साभार)

Jun 3, 2014

=> केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुण्डे की सड़क हादसे में मौत

 "मुझे बहुत दुःख है की गोपीनाथ मुण्डे जैसा
ससक्त नेता हमारे बीच से चला गया।
भारत के लिए यह बहुत ही अपूर्णीय छति है।
- नरेन्द्र मोदी, प्रधानमन्त्री"
नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे की मंगलवार सुबह दिल्ली में हुए एक सड़क हादसे के बाद हार्ट अटैक आने से  ६.३० बजे  के करीब मौत हो गई। मुंडे को हादसे के बाद एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया था, जहां सुबह इलाज के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हादसे के बाद एम्स पहुंचे स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मीडिया को मुंडे के निधन की खबर दी।
        बताया जा रहा है की गोपीनाथ मुण्डे सुबह अपनी कार से अपने लोक सभा क्षेत्र बीड में विजय सभा को सम्बोधित करने जाने के लिए एयरपोर्ट की तरफ जा रहे थे की पृथ्वीराज रोड पर अरविंदो चौक के पास सामने से आ रही इण्डिका कार ने टक्कर मार दी उसके तुरंत बाद उनके साथ कार में बैठे ड्राइवर और सहायक ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। एक डॉक्टर के मुताबित अस्पताल पहुँचने पर उनकी सांसे रुकी हुयी थी और हार्ट भी काम नहीं कर रहा था। गौरतलब है की मुण्डे को डाइबिटीज और उच्च रक्तचाप की समस्या पहले से ही थी।  

एक परिचय:
गोपीनाथ मुंडे (१९४९-२०१४) एक भारतीय राजनेता है और महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री थे। १९९५ में हुये विधानसभा के चुनावों में उन्होंने सफलता पाई और महाराष्ट्र राज्य के उपमुख्यमंत्री बने। उन्होंने अपनी पहचान ज़मीन से जुड़े एक कार्यकर्ता के तौर पर बनाई और वे एक राजनेता के साथ-साथ एक कृषक भी थे । मई-२०१४ में वह नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे, लेकिन उस के कुछ दिनों बाद ही दिल्ली में एक कार दुर्घटना में उनका देहान्त हुआ |
गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र राज्य में भारतीय जनता पार्टी का चेहरा हैं। लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी के सबसे चमकदार चेहरे है। मुंडे को महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी की ओर से एकमात्र भीड़ जुटाने वाले नेता के तौर पर जाना जाता है। महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी को खड़ा करने वालों में उनका नाम लिया जाता है। गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र के कद्दावर ओबीसी नेता हैं। गोपीनाथ मुंडे पिछड़े वर्गों में अच्छा प्रभाव रखने वाले महत्पूर्ण ओबीसी नेता हैं। महाराष्ट्र प्रदेश में उन्हें भारतीय जनता पार्टी का अकेला जननेता माना जाता है। वे महाराष्ट्र भारती जनता पार्टी में अपना अलग महत्व है। महाराष्ट्र में एकमात्र जमीनी नेता मुंडे को नाराज करने से वहां भारतीय जनता पार्टी को भारी क्षति पहुंचेगी। महाराष्ट्र में उनके वर्चस्व के सामने कोई चुनौती खड़ी नहीं होगी। मायनस मुंडे महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी की स्थिति बिना नमक समुद्र जैसी होने की आशंका है। 
        वे ४० साल से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े है। ३७ साल से चुनकर आ रहे है। गोपीनाथ मुंडे के शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से, शिवसेना से गठबंधन के संबंध २२ साल पुराने है।

Jun 1, 2014

=> महंगाई के कारण लोगों ने खरीदारी का विचार त्याग दिया

संवाददाता।

महंगाई के कारण लोगों ने खरीदारी का विचार त्याग दिया है या उचित समय का इंतजार कर रहे हैं। इससे खासकर शहरों में उत्पादों की बिक्री प्रभावित हुई है। वास्तव में इस समस्या का समाधान हमारे देश के ग्रामीण इलाकों या शहरों में तब्दील होते कस्बों या गांवों में निहित है। इनकी संख्या देशभर में 5000 के लगभग है। यहां के लोग बड़े शहरों में खरीदारी के लिए आते हैं। इसे देखते हुए पैराशूट ब्रांड तेल बनाने वाली मैरिको लिमिटेड की सीईओ सौगता गुप्ता की बात विचारणीय हो जाती है। उनका मानना है कि उभरते शहरों की आबादी खर्च करने को तैयार है, लेकिन एफएमसीजी उत्पाद बनाने वाली कंपनियां उन तक पहुंच नहीं पा रही हैं। इसे समझते हुए ही कंपनी ने खास रणनीति बनाई है।
       भारत के ग्रामीण इलाकों के अलावा दुनिया के कुछ ऐसे देश भी हैं, जो उचित उत्पादों पर पैसा खर्चने के लिए तैयार हैं। सब-सहारा देश, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीकी महाद्वीप इत्यादि कुछ ऐसे केंद्र हैं, जहां लोग मध्य कीमतों के कंज्यूमर उत्पादों की राह देख रहे हैं। अब जरा एक नजर डालिए त्वरित सेवा देने वाले रेस्त्रां व्यवसाय पर। इनके लिए छोटे का मतलब ही बड़ा है। इसी सिद्धांत पर वे व्यवसाय में छाई मंदी को छांटने का प्रयास कर रहे हैं। इन्होंने समोसों को ऐसा आकार दिया, जो पांच रुपए के लिहाज से मुफीद हो। इसी तरह पिज्जा, कचौरी, सैंडविच, बर्गर को भी दस रुपए के खांचे में फिट करने वाला आकार दिया गया। भले ही इनका आकार छोटा हो, लेकिन लोगों की तेज भूख शांत करने में यह अब भी सफल हैं। इसी तर्ज पर पूरी थाली के सत्तर रुपए कीमत वाले लघु संस्करण की बिक्री में सत्तर फीसदी का इजाफा देखा गया है।
        डोमिनोज और मैक्डोनल्ड भी खाद्य उत्पादों के लघु संस्करण पेश कर रहे हैं, जो लोगों की जेब में समा सकें। यद्यपि इन शृंखलाओं में खाने को शेयर करने की प्रवृत्ति कम हुई है, लेकिन वैयक्तिक तौर पर खरीदारों की संख्या बढ़ी है। इसकी वजह यह है कि इन्होंने तुरंत खाने की इच्छा रखने वालों के लिए कम कीमत में उत्पाद पेश किए हैं। भारत में मैक्डोनल्ड के 257 रेस्त्रां में से दस फीसदी हाईवे पर स्थित हैं। कंपनी के प्रबंधकों ने अपने ब्रांड को इन जगहों पर नए सिरे से स्थापित करने की रणनीति बनाई है। हाईवे पर ग्रामीण इलाकों में रहने वाली आबादी की शिरकत बढ़ी है। अब इन हाईवे आउटलेट से कंपनी को बीस फीसदी तक आय हो रही है।
        डोमिनोज और मैक्डोनल्ड सरीखे ब्रांड के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी छवि को बदलना है। अभी तक इसके खाद्य उत्पादों को कुलीन तबके से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन अब यह ब्रांड इन्हें आमजन तक पहुंचाना चाहते हैं। गौरतलब है कि 87 फीसदी भारतीय सड़क मार्ग से यात्रा करते हंै। ऐसे में इन जैसे ब्रांड के लिए जरूरी हो गया है कि वे त्वरित खाद्य पदार्थ देने वाले उत्पाद के तौर पर सड़क किनारे अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएं। इससे ही मध्य वर्ग कहीं आसानी के साथ इनसे जुड़ाव स्थापित कर पाएगा। इसी रणनीति पर देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे वैश्विक ब्रांड भी अमल कर रहे हैं। कॉफी वल्र्ड, पिज्जा कॉर्नर, क्रीम एंड फज ने इस रणनीति पर अमल करते हुए ही अपनी बिक्री में 15 फीसदी का इजाफा किया है। यानी आकार में छोटा और कीमत में सर्वसुलभ उत्पाद लोगों तक तेजी से पहुंच बना रहा है। 

May 29, 2014

=> हाँ मैं कश्मीर हूँ

रूपाश्री शर्मा, गुमला, झारखण्ड

आप अपनी भी रचननायें भेज सकते हैं इस आईडी पर - tnraj007@gmail.com













ना बुजुर्गों के ख्वाबों की ताबीर हूँ, ना मैं जन्नत सी अब कोई तस्वीर हूँ ,
जिसको मिलकर के सदियों से लूटा गया, मैं वो उजड़ी हुई एक जागीर हूँ ,
हाँ मैं कश्मीर हूँ ,……… हाँ मैं कश्मीर हूँ,.......... हाँ मैं कश्मीर हूँ..........

मेरे बच्चे बिलखते रहे भूख से, ये हुआ है खिलाफत की एक चूक से,
रोटियां मांगने पर मिली गोलियां, चुप कराया गया उनको बन्दूक से,
ना कहानी हूँ ना कोई किस्सा हूँ मैं, मेरे भारत तेरा इक हिस्सा हूँ मैं
जिसको बाट नहीं जा सका आज तक, ऐसी एक टीस हूँ ऐसी एक तीर हूँ
हाँ मैं कश्मीर हूँ ,……… हाँ मैं कश्मीर हूँ,..........हाँ मैं कश्मीर हूँ..........

यूँ मेरे हौसले आजमाए गये, मेरी सांसों पे पहरे बिठाये गए
पूरे भारत में कुछ भी कहीं भी हुआ, मेरे मासूम बच्चे उठाये गए
यूँ उजड़े मेरे सारे घर रौंदे गये, मेरे जज्बात बूटों से रौंदे गए,
जिसका हर लफ्ज आंसू से लिख्खा गया, खून में डूबी हुई ऐसी तहरीर हूँ
हाँ मैं कश्मीर हूँ ,……… हाँ मैं कश्मीर हूँ,.......... हाँ मैं कश्मीर हूँ..........

मैं सुबह हूँ मगर शाम बन जाउंगी, मैं बगावत की पैगाम बन जाऊंगी
गर सम्भाला गया ना मुझे प्यार से , एक दिन मै वियतनाम बन जाऊंगी
मुझको एक पल सकूँ है ना आराम है, मेरे सर पर बगावत का इल्जाम है
जो उठाई न जायेगी हर हाँथ से, ऐ हुकूमत मैं इक ऐसी शमसीर हूँ
हाँ मैं कश्मीर हूँ ,……… हाँ मैं कश्मीर हूँ,.......... हाँ मैं कश्मीर हूँ..........

=> क्रोध को खत्म करने की सिर्फ एक संभावना है

ओशो डॉट कॉम   

जब तुम किसी के लिए क्रोधित हो और तुम अपना क्रोध उस पर डालते हो, तुम प्रतिक्रिया की चेन पैदा करते हो। अब वह क्रोधित होगा। यह हो सकता है कि जन्मों तक चलता रहे और तुम दुश्मन बने रह सकते हो। तुम इसका अंत कैसे कर सकते हो? यहां सिर्फ एक ही संभावना है। तुम इसका सिर्फ ध्यान में अंत कर सकते हो, और कहीं नहीं, क्योंकि ध्यान में तुम किसी पर क्रोधित नहीं हो । तुम बस क्रोधित हो।
              भेद बुनियादी है। तुम किसी के ऊपर क्रोधित नहीं हो। तुम बस क्रोधित हो और क्रोध ब्रह्मांड में मुक्त होता है। तुम किसी के लिए नफरत से नहीं भरे हो, तुम बस नफरत से भरे हो और वह बाहर फेंक रहे हो। ध्यान में, भावनाएं किसी के लिए नहीं है। वे किसी के लिए नहीं है। वे ब्रह्मांड में चली जाती है, और ब्रह्मांड हर चीज को शुद्ध कर देता है।
                 यह ऐसे ही जैसे कि गंदी नदी समुद्र में गिरती है : समुद्र उसे शुद्ध कर देगा। जब कभी तुम्हारा क्रोध, तुम्हारी नफरत, तुम्हारी कामुकता, ब्रह्मांड में जाती है, समुद्र में जाती है--यह शुद्ध हो जाती है। यदि गंदी नदी किसी दूसरी नदी में गिरती है, तब दूसरी नदी भी गंदी हो जाती है। जब तुम किसी के ऊपर क्रोधित हो, तुम अपने कचरे को उस पर फेंक रहे हो। तब वह अपना कचरा तुम्हारे ऊपर फेंकेगा और तुम कचरा फेंकने की संयुक्त प्रक्रिया हो जाओगे ।
                 ध्यान तुम स्वयं को ब्रह्मांड में शुद्ध होने के लिए फेंक रहे हो। सारी ऊर्जा जो तुम ब्रह्मांड में फेंकते हो वह शुद्ध हो जाती है। ब्रह्मांड बहुत विशाल है महान समुद्र, तुम उसे गंदा नहीं कर सकते। ध्यान में हम किसी व्यक्ति से नहीं जुड़े हैं। ध्यान में हम सीधे ब्रह्मांड से जुड़ते हैं। 

=> मार्ग पर गुरु आखिरी बाधा होती है

ओशो डॉट कॉम   

                               मार्ग पर गुरु आखिरी बाधा होती है। गुरु के प्रति प्रेम को गिराना बहुत मुश्किल है। तुम सब कुछ गिरा सकते हो--तुम सारी दुनिया का त्याग कर सकते हो, तुम स्वयं का त्याग कर सकते हो--लेकिन जब तक कि आखिरी चीज भी गिरा नहीं दी जाए, गुरु के प्रति लगाव की छोटी सी बात तुम्हारे अहंकार का मूल बन जाता है।
                          गौतम बुद्ध ने कहा, "यदि तुम मार्ग में मुझसे मिलो, तत्काल मेरा सिर काट देना।' वे लाक्षणिक बात कर रहे हैं। क्योंकि जब तुम ध्यान करते हो हर चीज विदा हो जाएगी, लेकिन अंततः, तुम देखोगे कि गुरु वहां है। जब सारी दुनिया विदा हो गई तब गुरु मौजूद होगा। यह तुम्हारा अखिरी प्रेम है, और यह इतना तृप्तिदायी है, इतना शांतिदायी है कि तुम उस दशा में हमेशा के लिए बने रहना चाहते हो। सिर्फ गुरु कह सकता है कि "यह लक्ष्य नहीं है। एक कदम और : गुरु के इस मोह को भी जाने दो ताकि तुम पूरी तरह से मोह से मुक्त हो जाओ।' पूरी तरह से मोह से मुक्त होने पर अहंकार विदा हो जाता है। अहंकार का विदा हो जाना तुम्हारा विदा हो जाना नहीं है। अहंकार का विदा हो जाना पहली बार तुम्हारा होना होता है; झूठ विदा हो जाता है और सत्य प्रकाशित होता है। यह कठिन है, लेकिन इसे संभव करना होगा। 
                                  यह असंभव नहीं है क्योंकि बहुतों ने यह किया है। और यह तुम गुरु के खिलाफ नहीं कर रहे हो; तुम गुरु के संदेश को पूरा कर रहे हो। अहंकार को विदा हो जाने दो। लेकिन यह तब ही विदा होता है जब वहां कोई मोह नहीं बचता। और जिस क्षण जरा भी अहंकार नहीं बचता, पहली बार तुम होते हो। तब तुम गुरु के प्रति हमेशा के लिए अनुग्रह से भरते हो क्योंकि यदि उन्होंने जोर नहीं दिया होता, तुम सुंदर अवस्था में बने रहते। लेकिन वहां इसके पार भी कुछ है; और गुरु नहीं चाहता कि तुम मार्ग पर अटक जाओ। गुरु चाहता है कि तुम पूरी तरह से मुक्त हो जाओ, हर चीज से मुक्त हो जाओ; हर चीज में वह स्वयं को भी शामिल कर रहा है। 

=> वेदना कि सिहरन



  • रूपा श्री शर्मा, झारखण्ड 
वेदना कि सिहरन से जब सिसकियाँ पनपती होंगीं
अनगिनत इक्छाओं कि आंधियां झुलसती होंगीं
सह तो जाती होंगीं हर सितम हर वेदना पर
क्या बेटीयों कि आत्मा नही कलपती होंगी
जन्म ले कर जहाँ पलती है बढती है छोड़
उस घरको साजन का घर सहेजती होंगीं
कभी दहेज़ कि खातिर जब कुचला जाता होगा इन्हे
क्या ऐसे में भी जीवन कि बगिया महकती होंगीं
एक हक़ीक़त ये भी होती है बेटिया चुप -चाप रोती हैं
पर कैसा लगता होगा इन्हे जब दहेज़ के लिए ये झुलसती होंगी ??????
व दहेज़ के लिए ये झुलसती होंगी ??????

May 17, 2014

=> भारत की विजय, कांग्रेस का बंटाधार

  • navbharattimes
लोकसभा चुनावों में मोदी की 'सूनामी' पर सवार बीजेपी ने 30 साल का रेकॉर्ड तोड़ते हुए अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया है। बीजेपी गठबंधन 337 सीटों पर जीत हासिल कर चुकी है। इसमें 283 सीटें अकेले बीजेपी की हैं। 1984 के बाद बीजेपी पहली पार्टी है, जिसने अपने दम पर सरकार बनाने लायक सीटें हासिल की हैं। जहां सुदूर उत्तर के जम्मू-कश्मीर की लद्दाख सीट पर बीजेपी ने जीत दर्ज की, वहीं सुदूर दक्षिण की कन्याकुमारी सीट भी बीजेपी की झोली में आ गई है।
                1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को भारी बहुमत मिला था। कांग्रेस को उस वक्त 404 सीटें मिली थीं। तब कांग्रेस को 49.01 फीसदी वोट मिले थे।
                उधर, एग्जिट पोल्स के अनुमानों के मुताबिक ही कांग्रेस का बंटाधार हुआ है। सात राज्यों उत्तराखंड, तमिलनाडु, हिमाचल, दिल्ली, राजस्थान, गोवा, और गुजरात में खाता तक नहीं खोल पाई कांग्रेस 43 से सीटों पर सिमट गई है। कांग्रेस के इतिहास में उसका यह सबसे खराब प्रदर्शन है। इतनी कम सीटों के साथ वह लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल तक नहीं रह पाएगी। कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए को महज 58 सीटें मिली हैं।
                'अच्छे दिन आने वाले हैं': लोकसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत से गदगद मोदी की खुशी गुरुवार को ट्विटर पर छलक पड़ी। उन्होंने अपनी चिर परिचित लाइन अच्छे दिन आने वाले हैं ट्वीट कर अपनी खुशी का इजहार किया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, 'India has won! भारत की विजय। अच्छे दिन आने वाले हैं।'
                 मां ने मोदी का किया तिलकः नरेंद्र मोदी ने चुनाव रुझानों में बीजेपी की जीत तय होने के बाद शुक्रवार दोपहर सबसे पहले अपनी मां हीरा बेन से मुलाकात की। मां हीरा बेन ने मोदी का तिलक लगाकर स्वागत किया। इसके बाद मोदी काफी देर तक मां के साथ बैठे रहे। इस दौरान वह अपने भाई के बच्चों से भी हंसी-ठिठोली करते देखे गए। (खबर पढ़ें: मोदी की मां बोलीं, बेटा देश को आगे बढ़ाएगा)
                 मोदी को बधाइयों का सिलसिलाः लोकसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत के सूत्रधार रहे मोदी को बधाइयों का सिलसिला भी शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बीजेपी की जीत पर मोदी को बधाई दी है। इससे पहले सुबह पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मोदी को बधाई दी, तो दोपहर को लालकृष्ण आडवाणी ने भी उन्हें फोन किया। वहीं देश के अगले प्रधानमंत्री बनने के मद्देनजर सुरक्षा एजेंसियां भी उनकी सुरक्षा को लेकर सक्रिय हो गई हैं। एसपीजी की टीमें मोदी को अपने सुरक्षा घेरे में लेने के लिए दिल्ली से गांधीनगर के लिए रवाना हुईं।
                  मोदी वडोदरा, वाराणसी से चुनाव जीतेः रुझानों के मुताबिक ही नतीजे भी बीजेपी के पक्ष में आ रहे हैं। नरेंद्र मोदी वडोदरा और वाराणसी से चुनाव जीत गए हैं। मोदी को वडोदरा में 5 लाख 72 हजार 8 सौ 80 वोट मिले, जबकि दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस उम्मीदवार मधुसूदन मिस्त्री को 1 लाख 86 हजार 4 सौ 51 वोट मिले। 12 हजार एक सौ 10 लोगों ने नोटा बटन दबाया। वहीं वाराणसी में मोदी ने केजरीवाल को हराया। मोदी को वाराणसी में 3 लाख 84 हजार 515 वोट मिले, जबकि केजरीवाल 1 लाख 20 हजरा 637 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय 45 हजार 990 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

सभी 543 सीटों का राज्यवार रुझान
अरुण जेटली, अजीत सिंह चुनाव हारेः लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त जीत से उत्साहित बीजेपी को अमृतसर में झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और मोदी सरकार में वित्त मंत्री के दावेदार माने जा रहे अरुण जेटली अमृतसर से चुनाव हार गए हैं। उन्हें कांग्रेस के अमरिंदर सिंह ने हराया। राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अजीत सिंह भी बागपत से चुनाव हार गए। उन्हें बीजेपी उम्मीदवार मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त सत्यपाल सिंह ने हराया। चुनाव जीतने वाली बीजेपी के अन्य प्रमुख नेताओं में गांधीनगर से लालकृष्ण आडवाणी, विदिशा से सुषमा स्वराज, उन्नाव से साक्षी महाराज, सुल्तानपुर से वरुण गांधी, चंडीगढ़ से किरण खेर और येदियुरप्पा प्रमुख है। वहीं चुनाव हारने वाले प्रमुख कांग्रेसी नेताओं में संजय निरुपम, प्रिया दत्त, सलमान खुर्शीद, अजय राय, मिलिंद देवड़ा प्रमुख हैं। 
राहुल, मुलायम जीते: अमेठी में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने शुरुआती राउंड में पिछड़ने के बाद आखिरकार जीत हासिल कर ली। बीजेपी की स्मृति ईरानी दूसरे नंबर पर रहीं। रायबरेली से सोनिया गांधी चुनाव जीत गई हैं। मैनपुरी सीट से जीत दर्ज कर चुके मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ में शुरुआत में पिछड़ने के बाद जीत गए।
उत्तर प्रदेशः 2009 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में 10 सीटों पर सिमटी बीजेपी इस बार सत्तारूढ़ एसपी और बीएसपी को रौंदते हुए बंपर प्रदर्शन की ओर बढ़ रही है। यूपी की 80 सीटों में से बीजेपी को 71 सीटें मिली हैं। दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी है, जिसे 5 सीटें मिली हैं। यूपी में बीएसपी का पत्ता साफ हो गया है। उसे एक भी सीट नहीं मिली। उधर, उत्तराखंड में बीजेपी ने सभी पांच सीटों पर जीत दर्ज की है। टिहरी गढ़वाल, गढ़वाल, हरिद्वार, अल्मोड़ा और नैनीताल में बीजेपी के उम्मीदवार विजयी रहे।
दिल्लीः लोकसभा चुनाव में बीजेपी को दिल्ली में भी बड़ी सफलता मिली और उसने दिल्ली की सभी सात सीटों पर कब्जा किया। चांदनी चौक सीट से हर्षवर्धन, वेस्ट दिल्ली से प्रवेश वर्मा, नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली से मनोज तिवारी, नई दिल्ली से मीनाक्षी लेखी विजयी रहे। विधानसभा चुनाव में उभरी आम आदमी पार्टी को करारा झटका लगा और वह खाता तक नहीं खोल पाई।
आप ने खोला खाताः दिल्ली विधानसभा चुनावों में जबर्दस्त प्रदर्शन के बाद लोकसभा चुनावों में पहली बार उतरी आम आदमी पार्टी अपना खाता खोलने में सफल रही। उसके उम्मीदवार पंजाब में संगरूर और फरीदकोट सीटों पर विजयी रहे, जबकि पंजाब की दो अन्य सीटों फतेहगढ़ साहिब और पटियाला में भी आप कैंडिडेट को जीत मिली।
डीएमके कैंडिडेट की पत्नी को हार्ट अटैकः रामनाथपुरम लोकसभा क्षेत्र में डीएमके उम्मीदवार मोहम्मद जलील अपनी पत्नी के निधन की वजह से काउंटिंग से कुछ ही घंटों पहले शोक में डूब गए। परिवार के सदस्यों ने बताया कि उनकी पत्नी शमसू निशा (60) का आज सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।